जैन धर्म और उसका लौकिक दृष्टिकोण

जैन धर्म और उसका लौकिक दृष्टिकोण

हम कौन हैं, हम कहां से आए हैं और ब्रह्माण्ड में हमारा क्या स्थान है? ये वो सवाल हैं जो मानव जाति को हज़ारों सालों से हैरान किये हुए हैं और सभी धर्मों ने इन अस्तित्व संबंधी चुनौतियों का उत्तर खोजने की कोशिश की है।

ईसाई और इस्लाम तथा यहूदी जैसे एकेश्वरवादी धर्म जहां एक सर्वोत्कृष्ठ तथा श्रेष्ठ ईश्वर को मानते हैं जिसने ब्रह्माण्ड की रचना की और जो इसके अस्तित्व की लगातार देखरेख करता है वहीं हिंदू धर्म ग्रंथों का मानना है कि ब्रह्णाण्ड का निर्माण और विनाश एक चक्र है जो जारी रहता है।

वहीं दूसरी तरफ़ जैन धर्म का मानना है कि ब्रह्माण्ड का अस्तित्व अनंतकाल से रहा है। इसे बनाया नहीं गया है और इसका न तो आरंभ है और न ही अंत है। जैन धर्म के अनुयायी चित्रकारी के द्वारा लौकिक विश्व के बारे में अपना ज्ञान दर्शाते हैं। ये चित्र धार्मिक पुस्तकों और धार्मिक ग्रंथों के ज़रिये पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं।

17 वीं शताब्दी की ईस्वी सन् पांडुलिपि जिसमें जैन ग्रंथ के अनुसार सांख्य संकल्प से एक मानचित्र दिखाया गया है

चलिये अब हम जैन ब्रह्माण्ड में कई ऐसे क्षेत्रों की यात्रा पर निकलते हैं जहां हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि जैन धर्म लौकिक विश्व के बारे क्या सोचता है। तीसरी और पांचवी शताब्दी में आचार्य उमास्वामी द्वारा लिखित तत्त्वार्थ सूत्र को जैन ब्रह्माण्ड विज्ञान की सबसे प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है। तत्त्वार्थ सूत्र के अनुसार ब्रह्माण्ड तीन हिस्सों में बटा हुआ है- ये ऊपर से चौड़ा, बीच में संकरा और नीचे से फिर चौड़ा है। ये एक ऐसे मानव की तरह है जो अपने पांव खोले कमर पर हाथ रखे खड़ा है।

लोकपुरुष के विभिन्न चित्र या ‘लौकिक पुरुष’

कई जैन ग्रंथों में इस लोकपुरुष को देखा जा सकता है। दिलचस्प बात ये है कि ब्रह्णाण्ड के ये तीन हिस्से तीन संसारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। धड़ जहां विभिन्न स्वर्गों को दर्शाता है जहां सुख ही सुख है वहीं पांव नर्क को दर्शाते हैं जहां दुख और यातना हैं। सबसे महत्वपूर्ण है कमर का हिस्सा जो हालंकि छोटा है लेकिन यही वह स्थान है जहां मानव रह सकता है

इन तीन संसारों में आत्माएं अपने कर्मों के अनुसार पुनर्जन्म के निरंतर चक्र के द्वारा अपनी आध्यात्मिक यात्रा करती हैं। ये यात्रा तब समाप्त होती है जब वे (आत्माएं) पूरी तरह निपुणता और निर्वाण प्राप्त कर लेती हैं। ये होने पर आत्मा ब्रह्माण्ड के शीर्ष पर स्वर्ग के ऊपर अर्धचंद्राकार क्षेत्र में सदा के लिये वास करने लगती हैं। ये क्षेत्र लोकपुरुष के माथे पर बना हुआ है।

आकाश के ऊपर अर्धचंद्र के आकार का क्षेत्र

सबसे पहले शुरुआत करते हैं मध्य संसार से जहां मानव वास करता है। अढ़ाई (ढाई) द्वीप कहते हैं जिसमें 90 महाद्वीप और समुद्र हैं। महाद्वीपों को संकेंद्रित चक्र के रुप में दर्शाया गया है जो तैराक और मछलियां से भरे गोलाकार समुद्र, नदियों और जलाशय के जटिल नेटवर्क और पर्वत श्रंखलाओं से घिरा हुआ हैं।

गुजरात से 1810 CE कपड़ा चित्रकला Adhaidvipa (ढाई महाद्वीपों) का चित्रण

पहले या मध्य क्षेत्र (गुलाब-सेब क्षेत्र) जंबू द्वीप है। ये नीले गोलाकार से घिरा हुआ है जो लवण समुद्र (नमकीन समुद्र) का प्रतिनिधित्व करता है। अगला गोला धातकी खंड है जो कालोदधि (काले पानी का समुद्र) से परिबद्ध। सबसे बाहरी गोला तीसरे क्षेत्र पुष्करद्वीप (कमल द्वीप) का प्रतिनिधित्व करता है। अंतिम गोला पर्वत श्रंखला की बहुरंगी चोटियों से घिरा हुआ है। ये पर्वत श्रंखला नश्वर अंतरिक्ष की सीमा का निर्धारण करती है। चार्ट के किनारों पर बने मंडप मानव संसार के खगोलीय संरक्षकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जम्बूद्वीप और मेरु पर्वत

जंबूद्वीप के मध्य में ब्रह्माण्ड की लौकिक धुरी या केंद्र मेरु पर्वत है। इसकी तीन छतें हैं और प्रत्येक छत नीचे वाली छत से छोटी है तथा हर छत पर उद्यान और वन बने हुए हैं। सबसे शीर्ष पर जिनाओं (तीर्थांकर) को समर्पित एक मंदिर है। जैन मंदिरों में अक्सर मेरु पर्वत दिखाई देगा जिसकी पूजा की जाती है। ऊपरी संसार में कई स्वर्गों में ईश्वर वास करते हैं। हो सकता है कि वे सुखी जीवन जी रहे हों लेकिन वे सांसारिक इच्छाओं से मुक्त नहीं हैं यानी उन्हें मोक्ष नहीं मिला है। वे पारंपरिक मानव समाज के अनुसार वर्गीकृत हैं यानी सबसे नीचे दास और शीर्ष पर राजा है।

जैन नरक दो अलग-अलग चित्रों में चित्रित किया गया है

सबसे नीचे के संसार में दुख ही दुख है। इस संसार की सात पर्ते हैं जहां अर्ध-ईश्वर या फिर वहां रहने वाले लोग ख़ुद को यातनाएं देते दर्शाए गए हैं। इस सात पर्तों में भी कई मंज़िलें जो नर्क में विभाजित हैं। कुल मिलाकर 49 मंज़िलें और 84,00,000 नर्क हैं। नर्क जितना गहरा होगा वहां रहने वाले लोगों को उतनी अधिक यातनाएं झेलनी पड़ती हैं।

अमूमन जैन धर्म पर विचार-विमर्श अहिंसा अथवा कठिन रिवाजों, जिसके लिये ये धर्म जाना जाता है, के आपसाप ही केंद्रित रहता है। लेकिन अक्सर हम इसके जटिल दर्शन या विकसित कला का उल्लेख करना भूल जाते हैं। दो सहस्राब्दी के दौरान जैन धर्म में कला और वास्तुकला की महान परंपरा रही हैं जिसे एक ऐसे देश में सामने लाने की ज़रुरत है जहां इस धर्म को मानने वाले पचास लाख लोग हैं।

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