गुजरात की बौद्ध गुफाएँ

गुजरात की बौद्ध गुफाएँ

प्राचीन भारत में जब भी हम बौद्ध धर्म के बारे में सोचते हैं तो हमारे ज़हन में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार का नाम आता हैं। हमारे ज़हन में कभी भी गुजरात का नाम नहीं आता क्योंकि हमें लगता है कि बौद्ध धर्म का इस क्षेत्र से कोई नाता ही नहीं था लेकिन हमारा ऐसा सोचना ग़लत है। गुजरात में धर्म के बारे में जब भी कोई सोचता है तो उसके ज़हन में द्वारका और अहमदाबाद के मंदिरों, कृष्ण की भक्ति और पालिताना और अन्य क्षेत्रों में स्थित जैन स्मारकों की तस्वीर उभर आती है। इसके अलावा हमारे ज़हन में अहमदाबाद और चंपानेर की मस्जिदें भी आती हैं। हिंदू और इस्लाम के बाद आज गुजरात जैन धर्म के लिये जाना जाता है।

क़रीब आठ सौ साल पहले ये बात सही नहीं थी। यहां बौद्ध मंदिर, मठ और परिसर हुआ करते थे। तरंगा के प्रसिद्ध मंदिर की तरह अन्य कई मंदिरों में बौद्ध और जैनी दोनों पूजा करते थे। जैन परंपरा के अनुसार इन मंदिरो का निर्माण एक बौद्ध राजा और एक जैन मुनी ने करवाया था। गुजरात में दूसरी-तीसरी ई.पू. से ही चट्टान को काटकर बनाए गए मठ थे और 13वीं-14वीं शताब्दी के क़रीब मध्यकाल तक इन मठों का इस्तेमाल होता रहा था।

कार्ला की चैत्य गुफा का प्रवेश द्वार | विकिमीडिआ कॉमन्स

गुजरात में बौद्ध धर्म तीसरी शताब्दी ई.पू. आया था। भारते के पश्चिम तट के विभिन्न क्षेत्रीय और समुद्री तथा मौर्य साम्राज्य के पश्चिम की तरफ़ फैले क्षेत्रों के व्यापारियों के साथ कारोबार के सिलसिले में गंगा घाटी से व्यापारी यहां आते थे और उन्हीं के साथ यहां बौद्ध धर्म भी आया था। इसका एक सबूत गिरनार के शिला पर अंकित अशोक मौर्य का फ़रमान है। गुजरात में सबसे पूज्नीय और प्राचीन बौद्ध स्थल गिरनार पर्वत है। यहीं अशोक का शिला पर अंकित प्रमुख फ़रमान है जो तीसरी शताब्दी ई.पू. का है। हिंदु और जैनी दोनों इस स्थान को पवित्र मानते हैं। इतिहासकारों के अनुसार पर्वत के ऊपर आज जहां जैन मंदिर हैं वहां कभी बौद्ध मठ हुआ करते थे।

जूनागढ़ में अशोक के अभिलेख | विकिमीडिआ कॉमन्स

क्षत्रप युग (प्रथम शताब्दी ई.पू – 5वीं शताब्दी) में प्रथम ई.पू. के दौरान पश्चिमी तट पर स्थानीय और मिस्र, अरब, ईरान और फिर सन 55 में अलेक्ज़ेंड्रिया पर रोमन के कब्ज़े के बाद विदेशी व्यापारिक गतिविधियां बढ़ गई थीं। इसके सबूत पहली सदी में लिखे गए समुद्री यात्रा वृतांत एरीथ्रीयन और दूसरी शताब्दी में लिखे गए टॉलेमी के भूगोल में मिलते हैं। इन दोनों ग्रंथो में भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहों और उन वस्तुओं का उल्लेख है जिनका व्यापार होता था। आरंभिक गुफाएं मौर्य युग की हैं जबकि बाद की गुफ़ाएं क्षत्रप समय की हैं। क्षत्रप युग में भारत और रोम के बीच बहुत व्यापार होता था और तब ख़ुशहाली भी बहुत थी।

गंगा घाटी से व्यापारी अरावली के मुख्य व्यापारिक मार्गों से गुजरात आते थे। वे उत्तरापथ से राजस्थान में भी कारोबार करते थे। ये व्यापारिक मार्ग देवनी मोरी से गुजरात में का प्रवेश द्वार था। देवनी मोरी में गुजरात में ईंटों का सबसे पुराना स्तूप और मठ परिसर हैं। ये स्तूप और मठ परिसर क्षत्रप युग (तीसरी-चौथी सदी) के हैं। इनसे पता चलता है कि बौद्ध धर्म क्षत्रप युग में प्रचलित था। इसके अलावा बौद्ध धर्म उत्तर में तक्षशिला, पूर्व में गंगा घाटी से राजस्थान और मध्य प्रदेश से और दक्षिण में महाराष्ट्र से जुड़ा हुआ था।

तलाजा पहाड़ी की गुफाएं | गुजरात टूरिज्म

भावनगर में तलाजा पर्वत की गुफएं गुजरात में सबसे पुरानी बौद्ध गुफाएं हैं। पर्वत के ऊपर सफ़ेद सुंदर जैन मंदिर बने हुए हैं लेकिन इनके किनारे प्राचीन बौद्ध गुफ़ाएं हैं। तालाजा में बीस से ज़्यादा गुफ़ाएं हैं और इनमें से सबसे पुरानी गुफ़ा एभल मंडप है। कला इतिहासकार एभल गुफ़ा को तीसरी-दूसरी ई.पू. का बताते है। इसके अग्रभाग पर साधारण लेकिन सुंदर चैत्य मेहराबें और चार अष्टकोणीय स्तंभ हैं जो महाराष्ट्र में लोनावला के पास भाजा गुफ़ाओं की मेहराबों और स्तंभो की तरह हैं। बौद्ध कला इतिहासकार पिया ब्रानकासियों के अनुसार ये गुफ़ाएं शायद भाजा गुफ़ाओं के भी पहले की है।

तलजा, काठियावाड़ में एभल मंडपा गुफा | ब्रिटिश लाइब्रेरी

 

गुजरात के जूनागढ़ ज़िले की बौद्ध गुफ़ाएं शायद तालाजा गुफ़ा परिसर के थोड़े पहले समय की हैं। टूटेफूटे अभिलेखों के अनुसार इनमें सबसे पुरानी गुफाएं खापड़ कोड़िया गुफाएं हैं। इन अभिलेखों के अक्षर मौर्य युग के अभिलेखों के अक्षरों से मिलते जुलते हैं। ये गुफाएं जूनागढ़ के ऊपरकोट क़िले के बाहर पवित्र सुदर्शन जलाशय के तट पर बनाईं गई थीं। दुर्भाग्य से बौद्ध भिक्षु जब यहां से चले गए उसके बाद पत्थरों के खनन की वजह से ज़्यादातर इलाक़ा नष्ट हो गया था।

खापड़ कोड़िया गुफाएं | विकिमीडिआ कॉमन्स

जूनागढ़ में सबसे बड़ा गुफ़ा परिसर बावा प्यारे परिसर है जो मोधीमठ के पास जूनागढ़ किले में ऊपरकोट के बाहर स्थित है। ये गुफा परिसर फिर भी काफी बेहतर स्थिति में है। इनका निर्माण प्रथम-द्वतीय सदी में क्षत्रप-सातवाहन शासनकाल के दौरान हुआ था। चीनी बौद्ध भिक्षु ह्वेन त्सांग यहा आया था और उसके अनुसार इनके निर्माण पहली सदी में हुआ था। उत्तर दिशा के गुफा समूह में चार और दक्षिण गुफा समूह में 13 गुफाएं हैं। बाद में इन गुफाओं का इस्तेमाल जैनियों ने किया था जिनकी दीवारों पर कई जैन चिन्ह अंकित हैं।

बावा प्यारे गुफाओं की योजना | विकिमीडिआ कॉमन्स

 

ऊपरकोट में जूनागढ़ में गुफ़ाओं का एक और समूह है जिन्हें ऊपरकोट गुफाएं कहा जाता है। ये गुफाएं दूसरी और तीसरी सदी की हैं और इन पर सातवाहन तथा क्षत्रप शैली का प्रभाव दिखाई पड़ता है। गुफाओं की तीन तहे हैं और ऊपरी तह पर एक गहरा कुंड है जिसमें पानी जमा किया जाता था। इसके अलावा लकड़ी के छत वाले पवैलियन का भी एक प्लान है। यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं और ये स्थानीय तथा बाहर के सैलानियों की पसंदीदा जगह है। गुफ़ा के स्तंभ अलंकृत, प्रवेश द्वार नक़्क़ाशीदार हैं। गुफा की चैत्य मेहराबदार हैं और भिक्षुओं का एक बड़ा सभागार है।

जूनागढ़ में उपरकोट की गुफाएं | विकिमीडिआ कॉमन्स

इन प्रसिद्ध गुफाओं के अलावा गुजरात के भड़ौच ज़िले के जाज़पोर गांव में कड़िया डूंगर की गुफाओं की तरह और भी गुफाएं हैं जिनके बारे में लोग कम जानते हैं। ये गुफ़ाएं भड़ौच के मशहूर क़िले से ज़्यादा दूर नहीं हैं। इस क़िले को मिस्र और रोम के लोग बारीगज़ा के नाम से जानते थे जिसका उल्लेख टोलमी का भूगोल (दूसरी सदी) और एरिथियन सी ऑफ़ पेरीलस यात्रा वृतांत में मिलता है। एरिथियन सी ऑफ़ पेरीलस यात्रा वृतांत एक ग्रीक-रोमन यात्री ने लिखा था जिसमें अरब सागर के बंदरगाहों का ज़िक्र है। व्यापारियों द्वारा संरक्षित ये गुफाएं अमूमन व्यापार मार्गों पर थीं और इससे निश्चित रुप से साबित होता है कि कभी ये मार्ग इस पर्वत से गुज़रने वाला एक प्रमुख व्यापारिक मार्ग रहा होगा। पहाड़ी के ऊपर इन गुफाओं से मार्ग दिखता है और ये कभी व्यापारियों के आराम करने की जगह होती होगी। गुफाएं साधारण हैं जिन्हें स्थानीय लोगों ने मंदिर में तब्दील कर दिया है। पर्वत के नीचे ईंटों के एक छोटे स्तूप के अवशेष भी मौजूद हैं।

उदासी अखाड़ा आश्रम से कड़िया डूंगर पहाड़ी | विकिमीडिआ कॉमन्स

गुजरात के गिर सोमनाथ ज़िले में शाना वांकिया में स्थित सना गुफाओं के बारे में लोग ज़्यादा नहीं जानते हैं। गुफाओं के दो समूह हैं। सना गुफाएं इनमें सबसे भव्य हैं। गुफाओं का दूसरा समूह वेरावल बंदरगाह के पास है जिसे प्रभास पाटन की गुफा कहा जाता है। गुफाओं के ये समूह एक दूसरे से सौ कि.मी. की दूरी पर हैं।

सना गुफाएं | विकिमीडिआ कॉमन्स

वेंकिया गुफा परिसर में 62 गुफाएं हैं जो दूसरी ई.पू. या फिर पहली सदी की हैं। ये निर्भर करता है कि आप किस विशेषज्ञ पर ज़्यादा यक़ीन करते हैं। यहां कोई शिलालेख नहीं है और शिला भी ख़राब स्तर की हैं। समय के साथ ये गुफाएं नष्ट भी होती रही हैं। हमारी जानकारी के अनुसार कहा जा सकता है कि ये हीनयान/थरवाद मठ होते होंगे। इनमें तीन सुंदर मेहराबदार चैत्य सभागार हैं, कई विहार हैं और कई गुफाएं हैं जिनमें से कुछ के अंदर चट्टान को काटकर बनाए गए स्तूप हैं।

गुफांओं में चट्टान को काटकर बनाए हुए सुंदर स्तंभ हैं जिनके शिखर साधारण हैं। इसके अलावा यहां बेंच और कमरे भी हैं। ये गुफाएं पहाड़ के कई स्तरों पर चट्टान काटकर बनाई गईं थीं। इनमें सबसे बड़ी गुफा (गुफा नंबर दो) को ब्रह्मा नी करी कहते हैं जो तालाजा एभल मंडप की गुफा से काफी मिलती जुलती है। यहां बहुत से जलकुंड हैं जहां बारिश का पानी जमा किया जाता था। ये जलकुंड मुंबई की कन्हेरी गुफाओं की तरह हैं। गुफाओं की संख्या के मामले में इनकी तुलना कन्हेरी की गुफाओं से की जा सकती है जहां सौ गुफाएं हैं। इन गुफाओं का स्थान बहुत दिलचस्प है। ये गुफाएं सौराष्ट्र तट पर उन महत्वपूर्ण बंदरगाहों के मार्गों पर स्थित हैं जो एक जगह आकर मिलते हैं। पश्चिम से पूर्व तक फैले ये मार्ग हैं दीव, नव बंदर, खेड़ा, राजपारा-मानकपुर और जाफ़राबाद-बाबरकोट। इस तरह से तटीय क्षेत्र से मार्गों का समागम समुद्री तटक्षेत्र वांकिया पर होता है। यही कारण है कि ये गुफाएं यहां बनाई गई हैं।

गुफाओं का दूसरा समूह प्रभास पाटन डिज़ाइन के मामले में बहुत साधारण है। इस समूह में सिर्फ़ तीन गुफाएं हैं जो तीसरी-चौथी शताब्दी की हैं। इनमें से दो गुफाओं का साइज़ 9×9 स्क्वैयर मीटर है और प्रत्येक गुफा में चार स्तंभ हैं। इन गुफाओं में कोई ख़ास सज्जा नहीं है। ये गुफाएं मलबे में दब चुकी हैं और आज इनके चौकोर प्रवेश द्वार का सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा ही दिखाई पड़ता है। ध्यान देने वाली बात ये है कि ये गुफाएं प्राचीन बंदरगाह प्रभास पाटन या सोमनाथ के क़रीब हैं। आरंभिक इतिहास और मध्यकाल में सोमनाथ एक प्रसिद्ध बंदरगाह था ।

सबसे विस्तृत और सुसज्जित गुफाएं गुजरात के राजकोट ज़िले में गोंडल के पास खंभालिदा में हैं। इनकी खोज प्रसिद्ध पुरातत्विद पी.पी. पंड्या ने सन 1958 में की थी। इस समूह में सिर्फ़ तीन गुफाएं हैं। इन्हें चूना पत्थर की छोटी पहाड़ी को काटकर बनाया गया है। ये गुफाएं गरम पानी के एक प्रसिद्ध सोते के पास स्थित हैं। बीच वाली गुफा चैत्य है क्योंकि इसमें एक स्तूप है। गुफा के प्रवेशद्वार पर दो विशाल बोधिसत्वं मूर्तियां है जिनके पास सेवक खडे हैं। बाएं तरफ़ की मूर्ति पद्मपाणी की है जिनके साथ एक महिला और पांच सेवक हैं। दाएं तरफ़ वज्रपाणी की मूर्ति है। इनके साथ भी पांच सेवक खड़े हैं। वज्रपाणी की मूर्ति के बग़ल में यक्ष की तरह दिखने वाले एक बौने की मूर्ति है जो काफ़ी विक्षिप्त हो चुकी है। इन छवियों की शैली कुषाण युग की मूर्तियों की शैली की तरह हैं। ये गुफाएं चौथी-पांचवी शताब्दी की हैं। इन तीन गुफाओं के अलावा प्रकोष्ठ की तरह दिखने वाली 15 छोटी गुफाएं हैं जिनका इस्तेमाल शायद भिक्षु ध्यान लगाने के लिये करते होंगे।

खंभालिदा बौद्ध गुफाएं | विकिमीडिआ कॉमन्स

दिलचस्प बात ये है कि इन गुफाओं की शैली कुषाण-गुप्त युग की शैली से काफ़ी मिलता जुलता है और गुजरात में इस तरह की अकेली अनोखी गुफाएं हैं। महत्वपूर्ण बात ये है कि इन गुफाओं से पता चलता है कि क्षत्रप युग के बाद भी गंगा घाटी के साथ व्यापार जारी था।

गुजरात में कच्छ के लखपत तालुक की सियोत बौद्ध गुफाओं के बारे में लोग कम ही जानते हैं। इस समूह में पांच गुफाएं हैं। इन्हें काटेश्वर गुफा कहते हैं। माना जाता है कि ये पांच गुफाएं सिंधु के मुहाने पर 80 बौद्ध गुफाओं का हिस्सा हुआ करती थीं जिसका उल्लेख ह्वेन त्सांग ने किया है। गुफाओं के अंदर और आसपास खुदाई में मिट्टी की छतों का पता चला है जिन पर बौद्ध संप्रदाय की बौद्ध छवियां बनी हुई हैं। छतों पर ब्रह्मी और नागरी लिपि अंकित है जिससे पता चलता है कि इन गुफाओं का इस्तेमाल लंबे समय तक होता रहा होगा। 13वीं शताब्दी में इन गुफाओं का प्रयोग शिव संप्रदाय के लोग करने लगे जिन्होंने इन्हें मंदिरों में तब्दील कर दिया।

सियोत बौद्ध गुफाएं | विकिमीडिआ कॉमन्स

गुजरात में चट्टान काटकर बनाई गईं अंतिम ज्ञात बौद्ध गुफाओं का परिसर जैन रॉक कट गुफा परिसर है। राजकोट ज़िले में, उपलेटा गांव के पास ढांक गुफाएं है जिन्हें क्षत्रप काल में चूना पत्थर की पहाड़ियों को काटकर बनाया गया था। यहां बौद्ध गुफाओं में बौद्धिस्तव छवियां हैं। जैम्स बर्जीस के अनुसार जैन गुफाएं 7वीं सदी की हैं लेकिन प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद प्रो. एच.डी. संकालिया इनका समय तीसरी सदी बताते हैं। यहां जैन यक्षी अंबिका की एक छवि के अलावा जैन तीर्थंकरों की कई छवियां हैं।

हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा गुजरात में की गई खुदाई में कई बौद्ध स्थल मिले हैं जिनमें वाडनगर का एक मठ भी शामिल है। पुरातत्वविद अभिजीत अंबेकर के नेतृत्व में खुदाई शाखा वी (बड़ौदा) द्वारा की गई खुदाई में तारंगा के पास एक मठ का ढांचा और छोटी प्राकृतिक गुफाओं का समूह मिला है। इनमें रुप परिवर्तन नाममात्र का है और 13वीं तथा 14वीं शताब्दी तक इनका इस्तेमाल हो रहा था। तारंगा के पास ही देवनीमोरी में गांधार शैली के विशाल स्तूप और उसके आसपास के मठों से भी हमें यहां बौद्ध धर्म की मौजूदगी के बारे में पता चलता है।

गुजरात में बौद्ध धर्म तीसरी ई.पू. से लेकर 14वीं शताब्दी तक यानी 1700 सास फूलाफला। बौद्ध यहां जैनियों के साथ सौहार्दपूर्ण तरीक़े से रहते थे जो यहां बाद में तीसरी-चौथी सदी में आए थे। जैसा की तारंगा में दिखता है और जैसा कि जैन आचार्यों ने उल्लेख किया है, दोनों संप्रदायों के बीच समन्वय था। गुप्त काल के बाद (छठी शताब्दी के बाद) बौद्ध धर्म का पतन होने लगा और फिर 11वीं-12वीं सदी में गुजरात में वैष्णव संप्रादय के उदय के साथ ही बौद्ध धर्म ग़ायब हो गया। ग़ायब होने का क्या कारण थे, इसकी हमें आज जानकारी नहीं है। हो सकता है कि समुद्री मार्ग से व्यापार तब ख़त्म होने लगा होगा जिसकी वजह से बौद्ध धर्म ग़ायब हो गया या फिर कोई और भी वजह हो सकती है।

बहरहाल, गुजरात में बौद्ध धर्म बहुरुप में मौजूद था। चट्टान को काटकर बनाई गईं अनेक गुफाएं, परिवर्तित गुफाएं, स्तूपों के ढांचे, मठ और मंदिर कच्छ से लेकर देवनीमोरी और देवनीमोरी से लेकर भड़ौच तक फैले हुए हैं। गुजरात की इस बौद्ध विरासत को आज विश्व के सामने लाने की ज़रुरत है।

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