कार्ला की 2000 साल पुरानी गुफाएं 

कार्ला की 2000 साल पुरानी गुफाएं 

क्या आपको पता है कि भारत का सबसे बड़ा और सबसे अधिक संरक्षित चैत्यगृह या प्रार्थना सभागार मुंबई के पास एक बहुत लोकप्रिय पिकनिक स्थल से बस ज़रा सी दूरी पर है? महाराष्ट्र के लोनावला से 11 कि.मी. दूर ये चैत्यगृह दो हज़ार साल पहले चट्टानों को काटकर बनाए गए बोद्ध गुफा परिसर का हिस्सा है जिसे कार्ला गुफ़ाएँ के नाम से जाना जाता है।

कार्ला गुफाएं मुंबई-पुणे राजमार्ग से क़रीब पांच कि.मी. के फ़ासले पर स्थित हैं। संयोग से ये आधुनिक राजमार्ग प्राचीन समय में व्यापार का एक प्रमुख मार्ग हुआ करता था जो दक्कन के शहरों को कल्याण और सोपारा के समुद्री तटों से जोड़ता था। व्यापारियों और लोगों के काफ़िलों ने सैंकड़ों बरस तक इस मार्ग का इस्तेमाल किया था और इसीलिये यहां आपको चट्टानों को काटकर बनाईं हुईं कई गुफाएं (जैसे कार्ला, भाजा, कोंधाणे और बेडसे) मिलेंगी। ये गुफाएं बौद्ध धर्म के संरक्षक व्यापारियों ने बनवाईं थी जो अपनी यात्रा के दौरान यहां ठहरा करते थे।

करला गुफ़ाएँ

पहली शताब्दी ईसा पूर्व से चौथी शताब्दी के बीच कई व्यापारियों और लोगों के चंदे तथा मदद से कार्ला में 16 गुफाएं बनाईं गईं थीं। व्यापारियों और महाजनों की आर्थिक मदद के अलावा इन गुफाओं के लिये क्षत्रप और सातवाहन राजवंशों से भी उनुदान मिलता था जिनका उस समय इस क्षेत्र में शासन हुआ करता था। उस समय रोम के साथ बहुत व्यापार होता था और इसीलिये ये राजवंश ख़ूब फूलेफले भी। ये राजवंश बौद्ध प्रतिष्ठानों को संरक्षण भी दिया करते थे।

बौद्ध जगत में कार्ला गुफा का महत्ता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि समाज के हर वर्ग के लोगों ने इस परिसर की स्थापना में योगदान किया था। इन लोगों के नाम यहां मिले 34 अभिलेखों में दर्ज हैं।

चैत्यगृह (गुफा नंबर 8)

उदाहरण के लिये चैत्यगृह (गुफा नंबर 8) जो इस परिसर की प्रमुख गुफा है, में क़रीब 20 अभिलेख हैं। इस गुफा का हर हिस्से के लिये, चाहे वो रैलिंग हों, मूर्तियां हो या फिर स्तंभ हो, अलग अलग लोगों ने पैसा दिया था। मध्य द्वार के ऊपरे एक अभिलेख का आंशिक विवरण कुछ इस तरह है-“सफलता!! दिनका के पुत्र और क्षत्रप राजा नहापना के दामाद उसभदाता द्वारा वालुर्का की गुफाओं में रहने वाले तपस्वियों की मदद के लिये बिना धार्मिक अथवा स्थानीय भेदभाव के कराजिका गांव दिया गया है…”

चैत्यगृह के बाईं ओर स्तंभ संख्या 9। शिलालेख में लिखा है: “धेनुकाटक यवनसा / यसवधनाना [म] / थबो दाना [म]” यानि “(यह) स्तंभ धेनुकाटक से यवन यसवधनाना का उपहार है ”।

वालुर्का संभवत: कार्ला का प्राचीन नाम था और इस अभिलेख के अनुसार कहा जा सकता है कि चैत्यगृह का निर्माण पहली शताब्दी में हुआ था जब कुछ समय के लिये क्षत्रप राजवंश का शासन था। कई अभिलेखों पर ऐसे लोगों के हस्ताक्षर हैं जो ख़ुद को यवन बताते थे। इससे पता चलता है कि उस समय यहां आकर बसे विदेशियों ने भी परिसर के निर्माण के लिये चंदा दिया था। इससे इस बात को भी बल मिलता है कि उस समय ख़ूब व्यापार हो रहा था और विदेश से कल्याण तथा सोपारा बंदरगाह आए विदेशी व्यापारियों ने भी स्थानीय स्मारकों के निर्माण में योगदान किया था।

खंभों के ऊपर की मूर्तियां

उस समय की गुफाओं में कार्ला चैत्यगृह सबसे बड़ी और सबसे अधिक अलंकृत गुफा है। ये गुफा 37.87 मीटर गहरी, 13.87 मीटर चौड़ी और 14.02 मीटर ऊंची है। यहां दोनों तरफ़ 15 स्तंभों की दो पंक्तियां हैं जो विशाल स्तूप की तरफ़ होती हुईं गुफा के एकदम पीछे तक जाती हैं। प्रत्येक स्तंभ के ऊपर सामने की तरफ़ पैरों पर झुके दो हाथियों की मूर्तियां बनी हुई हैं। प्रत्येक हाथी पर दो मानव छवियां बनी हुई हैं। इसी तरह स्तंभ के ऊपर पीछे की तरफ़ घोड़ों और शेरों की मूर्तियां हैं और हर मूर्ति पर एक मानव छवि बनी हुई है।

बरामदे में कई पैनलों में से एक 

चैत्यगृह के तीन प्रवेश द्वार हैं। हर प्रवेश द्वार के बरामदे के पैनलों पर विभिन्न मुद्राओं में बुद्ध की मूर्तियां, बोधिस्तत्व तथा मानव की और हाथियों की छवियां बनी हुई हैं। हैरानी की बात ये है कि सदियों पुराना यह चैत्यगृह बहुत अच्छी तरह संरक्षित रहा है।

चैत्यगृह के बाहर एक विशाल स्तंभ है जिसके ऊपर शेरों की चार मूर्तियां हैं। ये स्तंभ क़रीब पचास फ़ुट ऊंचा होगा। इस पर अंकित अभिलेख में लिखा है कि “ये स्तंभ गोती के पुत्र महारथी अगिमिथरंक ने उपहार में दिया था।” लगता है कि इस तरह के दो स्तंभ रहे होंगे और मौजूदा स्तंभ इसी का एक हिस्सा है जबकि दूसरा शायद समय के साथ नष्ट हो गया। इस दूसरे स्तंभ की जगह एक मंदिर है जो एकवीरा देवी को समर्पित है। इस देवी की पूजा मुंबई के अग्री और कोली समुदाय के लोग करते हैं। यहां तक कि एकवीरा महाराष्ट्र की जानेमाने राजनीतिक परिवार ठाकरे की भी कुलदेवी है। इस मंदिर का निर्माण 17वीं-18वीं शताब्दी में कभी हुआ होगा और आज ये गुफाओं से भी ज़्यादा लोगों को आकर्षित करता है। चैत्यगृह के सामने एक चौड़ा और समतल क्षेत्र है जहां कभी बौद्ध धर्म के अनुयायियों का जमा होते होगें।

करला गुफाओं के विहारों में से एक 

चैत्यगृह के अलावा कार्ला परिसर में कई और गुफाएं हैं जो चैत्य या विहार रही होंगी जिनका इस्तेमाल बौद्ध भिक्षु और व्यापारी रहने के लिये करते थे। इन गुफाओं में भी मूर्तिया हैं और अभिलेख हैं हालंकि इनमें से ज़्यादातर खंडहर बन हो चुके हैं। उदाहरण के लिये चैत्यगृह के उत्तर की तरफ़ एक विहार की दीवार पर एक अभिलेख अंकित है जिसका आंशिक विवरण इस तरह है- “सफलता!! शीत ऋतु के तीसरे पखवाड़े के दूसरे दिन वशिष्ठिपुत्र राजा श्री पुलुवामी के शासन के 24वें साल में इस विनम्र उपासक, सतपहराना के पुत्र हरफराना ने नौ कक्ष वाला सभागृह रूपी ये पवित्र उपहार सार्वजानिक संघ को भेंट किया”। इससे पता चलता है कि क्षत्रप राजवंश के बाद ये क्षेत्र सातवाहन राजवंश के अधीन हो गया था। वशिष्ठिपुत्र पुलमावी इस वंश का सातवां राजा था।

लाहौर किला, 1863

वास्तुकला और ऐतिहासिक दृष्टि से कार्ला गुफाएं कमाल की गुफाएं हैं। यहां कार पार्किंग स्थल से क़रीब 250 सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जा सकता है। ये स्थान बहुत रमणीय है और ये भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में है। यहां ज़्यादातर ट्रेकर्स और श्रद्धालु आते हैं….कभी कभार इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले भी आ जाते हैं।

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