एलिफ़ेंटा की ऐतिहासिक गुफाएं  

एलिफ़ेंटा की ऐतिहासिक गुफाएं  

क्या आप जानते हैं कि एलिफ़ेंटा द्वीप की बंदरगाह पर जो हाथी की मूर्ती हुआ करती थी और जिसके नाम पर ही द्वीप का नाम पड़ा था, वही मूर्ती आज एक संग्रहालय में रखी हुई है? और क्या आपको यह भी पता है कि द्वीप की गुफाओं में शिव की प्रसिद्ध त्रिमूर्ति, जिसे देखने लोग ख़ासतौर पर यहां आते हैं, दरअसल पंचमुखी (पांच मुख वाली) मूर्ति है? और यह कि एक बार वेल्स के राजकुमार के लिये मुख्य गुफा में रात्रिभोज का आयोजन भी किया गया था?

मुंबई के गेटवे ऑफ़ इंडिया से नाव से इस द्वीप पर पहुंचने में एक घंटा लगता है। इस द्वीप को स्थानीय लोग घारापुरी कहते हैं। यहां पहुंचने पर आप चट्टानों को काट कर बनाई गईं गुफ़ाओं की ऐसी दुनियां में पहुंच जाते हैं जहां अद्भुत मूर्तियों का भंडार छुपा हुआ है। इस जगह को हम एलिफ़ेटा गुफा के नाम से जानते हैं। ये इतनी मशहूर और महत्वपूर्ण हैं कि सन 1987 में यूनेस्को ने इसे अपनी विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर लिया।

एलिफेंटा द्वीप | विकिमीडिया कॉमन्स

हालंकि इस बात को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं कि एलिफ़ेटा गुफाओं की खुदाई कब हुई थी लेकिन अमूमन यह माना जाता है कि पांचवीं और छठी शताब्दी के बीच कभी खुदाई में ये गुफाएं मिली थीं। ये विश्वास दक्कनी क्षेत्र में गुफाओं में अंकित तारीख़ों पर आधारित है। लेकिन इस बात के भी साक्ष्य हैं कि पहले भी इस द्वीप में लोग रहा करते थे। यहां दो हज़ार साल पहले भी लोग बसते थे। ये छोटा सा द्वीप कभी व्यापार का केंद्र हुआ करता था।

उपलब्ध साक्षों के आधार पर कहा जा सकता है कि दूसरी सदी में समुद्री यात्रा के दौरान व्यापारी इस बंदरगाह पर आराम करने और ताज़ा पानी लेने के लिये रुकते थे। यहां रोम साम्राज्य के समय के घड़ों के अवशेष भी मिले हैं। हाल ही के अध्ययन से पता चलता है कि ये गुफाएं छठी शताब्दी के मध्य में कलाचुरी राजवंश के राजा कृष्णराजा ने बनवाई थीं। एलिफ़ेंटा में खुदाई में राजा कृष्णराजा के समय के तांबे के कई सिक्के मिले हैं।

कलाचुरी शासक मध्य प्रदेश में माहिश्मती (मौजूदा समय में माहेश्वरी) से शासन करते थे। वे शिव के भक्त थे और शैव संप्रदाय के पशुपत पंथ के अनुयायी थे। पशुपत पंथ परम देवता के रुप में शिव की भक्ति करने वाला आरंभिक हिंदू संप्रदाय माना जाता है। कहा जाता है कि इस संप्रदाय की स्थापना घुमंतु भिक्षु लाकुलिषा ने क़रीब दूसरी शताब्दी में की थी। लाकुलिषा को शिव का 28वां और अंतिम अवतार माना जाता है। ये गुफाएं मुंबई में पशुपत पंथ के तीन स्थलों में से एक हैं। अन्य दो स्थल हैं- जोगेश्वरी गुफाएं और मंडपेश्वर गुफाएं।

एलिफ़ेंटा गुफाएं दो पहाड़ियों पर हैं-एक पश्चिम की तरफ़ और दूसरी पूर्व दिशा की ओर। इनमें पश्चिमी पहाड़ी की गुफा नंबर एक सबसे अद्भुत है। इसे भारतीय कला का शानदार नमूना कहा जा सकता है। भगवान शिव को समर्पित ज़्यादातर गुफाओं में शिव के कई रुप और उनसे जुड़ी किवदंतियों पर आधारित मूर्तियां हैं।

शिवलिंग की पूजा करते हुए श्री राम और सीता का चित्र

कला का उत्सव

इस गुफा में मुख्य मूर्ति पंचमुखी शिव की है जिसे सदाशिव कहते हैं। सदाशिव के पांच सिर हैं और प्रत्येक सिर उनके अलग-अलग चरित्र को दर्शाता है। अक़्सर लोग इस मूर्ति को त्रिमूर्ति समझ बैठते हैं क्योंकि सामने से सिर्फ़ तीन सिर ही दिखाई पड़ते हैं।

सदाशिव | विकिमीडिया कॉमन्स

सामने का सिर दिव्य ऊर्जा (सदाशिव) का प्रतिनिधित्व करता है जबकि बाएं तरफ़ का सिर भय (अघोर शिव) तथा दाएं तरफ़ का सिर परम सुख (वामदेव) का प्रतिनिधित्व करता है। जो सिर दिखाई नहीं पड़ते हैं वो हैं- पीछे की तरफ़ वाला तप (तत्पुरुष) और ऊपर वाला शक्ति रचयिता (सद्धोजता शिव)। ये मूर्ति 17 फ़ुट या 5.45 मीटर ऊंची है और ये एक मीटर ऊंचे चबूतरे पर स्थित है।

अर्धनारीश्वर | विकिमीडिया कॉमन्स

पंचमुखी शिव के आसपास कई और भी मुर्तियां हैं। पंचमुखी शिव की मूर्ति के बाएं तरफ़ अर्धनारीश्वर यानी भगवान की आधे पुरुष और आधी स्त्री की छवि है। स्त्री वाला हिस्सा पार्वती हैं जिन्होंने बहुत सारे आभूषण पहन रखे हैं। दूसरा हिस्सा शिव हैं जिनका एक हाथ नंदी बैल पर है और दूसरे हाथ में उन्होंने नाग पकड़ रखा है। इस मूर्ति के आसपास देवी-देवताओं के अलावा कई सहायकों की छवियां हैं।

गंगाधर | विकिमीडिया कॉमन्स

महेशमूर्ति के दाएं तरफ़ गंगाधर अवतार में शिव की मूर्ति है। इसमें शिव ने अपने हाथों में अपनी जटाएं पकड़ रखी हैं। जटाओं से एक महिला की छवि उभरती दिखाई देती है जो गंगा देवी की है। गंगा देवी के तीन सिर हैं जो विश्व की तीन नदियों-मंदाकिनी (देवताओं का संसार), भगीरथी (पुरुषों का संसार) और भोगवती (भूमिगत) को दर्शाते हैं।

शिवलिंग | विकिमीडिया कॉमन्स

गुफा की पश्चिम दिशा में शिव का मंदिर है। इस मंदिर का गर्भग्रह बहुत साधारण है जहां एक मीटर लंबा शिवलिंग है। गुफा की हर दीवार पर शिव से जुड़ी किवदंतियां छवियां के रुप में बनी हुई हैं और हर छवि पांच मीटर ऊंची है। इनमें शिव-पार्वती के विवाह,शिव द्वारा अंधक राक्षस का वध, कैलाश पर्वत को हिलाता रावण और नटराज के रुप में नृत्य करते शिव जैसी किवदंतियां का वर्णन है। मूर्तियों के अलावा गुफा की छतों पर चित्रकारी के अंश नज़र आते हैं जिससे पता चलता है कि कभी छतों पर भित्ती चित्र रहे होंगे। दूसरी गुफाओं में भी चित्रकारी के अंश दिखाई पड़ते हैं।

गुफा 1 का आंतरिक भाग

दिलचस्प बात ये है कि एलिफ़ेटा की मुख्य गुफा ऐलोरा की धूमर लेना (गुफा नं.29) से काफ़ी मिलती जुलती है। धूमर लेना गुफा 7वीं शताब्दी की है जिसका खुदाई में बहुत पहले पता चला था। दोनों गुफाओं का प्लान, स्तंभों की शैली और पैनलों की स्थिति बिल्कुल एक जैसी हैं।

गुफा 3 | विकिमीडिया कॉमन्स

द्वीप में कुल मिलाकर सात गुफाएं हैं लेकिन मुख्य गुफा ही मूर्तियों से सुशोभित है। बाक़ी गुफाएं साधारण हैं और इनमें से तीन गुफाएं तो अधूरी हैं। गुफा नंबर 2 में एक मंडप है जिसके सामने चार स्तंभ और दो कमरे हैं। गुफा नंबर 3 में एक आयताकार हॉल है जिसके द्वार पर छह हाथों वाले एक पुरुष की छवि बनी हुई है। गुफा नंबर चार गुफा नंबर तीन की ही तरह है और इसमें एक बड़ा बरामदा है। गुफा नंबर 5 अधूरी है।

अधूरी गुफा 5  | विकिमीडिया कॉमन्स

गुफा नंबर एक से गुफा नंबर पांच जहां पश्चिमी पहाड़ी पर हैं, वहीं गुफा 6 और 7 पूर्वी पहाड़ी पर स्थित हैं। दोनों पहाड़ियों के बीच एक घाटी है और पाहड़ियों को एक रास्ता जोड़ता है। पुर्तगालियों के शासन के समय गुफा नंबर 6 को चर्च में बदल दिया गया था। पास की गुफा 7 में ईंटों के बने एक बौद्ध स्तूप के अवशेष हैं। ये स्तूप दूसरी ई.पू. सदी का है।

एलिफेंटा के ‘ऑन-द-आइलैंड’ को उकेरा गया डब्ल्यू डैनियल द्वारा एक ड्राइंग पर आधारित

हाथी की मूर्ति

एलिफ़ेंटा द्वीप का नाम पुर्तगालियों ने ही रखा था। सन 1534 में पुर्तगालियों ने गुजरात सल्तनत से ये
द्वीप लिया था। द्वीप के प्रवेश स्थान पर कहीं उन्हें हाथी की आदमक़द पत्थर की एक मूर्ति मिली।
उन्होंने इसे बंदरगाह पर नाव बांधने का एक लैंडमार्क बना लिया ताकि ये अरब सागर के अन्य छोटे
द्वीपों से भिन्न लगे। इस तरह उन्होंने इसका नाम एलिफ़ेंटा आइलैंड (द्वीप) रख दिया।

लेकिन दुर्भाग्य से हाथी की ये मूर्ति अब नहीं है। सन 1864 में अंगरेज़ इसे ब्रिटेन ले जाना चाहते थे लेकिन जहाज़ में इसे चढ़ाते वक़्त क्रैन टूट गई और मूर्ति चकनाचूर हो गई। बाद में मूर्ति के टुकड़ों को विक्टोरिया गार्डन (जीजामाता उद्यान) लाकर जोड़ा गया। ये मूर्ति अब भऊ दाजी लाड संग्रहालय में रखी हुई है।

भऊ दाजी लाड संग्रहालय में हाथी की मूर्ति | विकिमीडिया कॉमन्स

गुफाओं की मूर्तियों की मरम्मत

एलिफ़ेंटा गुफ़ाओं की कुछ मूर्तियां जहां समय की मार से बच गईं वहीं ज़्यादातर मूर्तियां नष्ट हो गईं। विद्वान इसकी कई वजह बताते हैं। कुछ विद्वानों का कहना है कि गुजरात के सुल्तानों ने मूर्तियों को खंडित किया था जबकि कुछ का कहना है कि पुर्तगाली सैनिक गुफा से गोलीबारी करते थे और मूर्तियों का इस्तेमाल निशाना लगाने के अभ्यास के लिये करते थे। कुछ विद्वानों का कहना है कि इसके लिये मराठा ज़िम्मेवार हैं जिन्होंने 17वीं शताब्दी में जानबूझकर कलाकृतियों को नष्ट किया था। पुर्तगालियों के आने के पहले 16वीं शताब्दी तक एलिफ़ेंटा गुफाओं में पूजा होती थी।

सन 1871 में पुरातत्वविद जैम्स बर्गीस ने इस स्थान के रेखाचित्र बनाए थे और “रॉक टैंपल ऑफ़ एलिफ़ेंटा” नाम से इन्हें प्रकाशित करवाया था। इसमें उन्होंने गुफाओं और मूर्ति की दशा के बारे में जानकारी दी थी। चित्रों के प्रकाशन के बाद ही लोगों का ध्यान इन गुफाओं की तरफ़ गया था।

सन 1875 में वैल्स के राजकुमार एल्बर्ट एडवर्ड भारत के दौरे पर आए थे। यात्रा के दौरान वह उसी साल नवंबर में बॉम्बे आए थे। इस मौक़े पर बॉम्बे के गवर्नर सर फिलिप वोडहाउस ने शाही महमानों के लिये एलिफ़ेंटा की मुख्य गुफा में रात्रिभोज का आयोजन किया था। दावत में क़रीब 400 लोग शामिल हुए थे।

1875 में प्रिंस ऑफ वेल्स के लिए भोज आयोजित किया गया

सन 1890 के दशक में अंग्रेज़ सरकार के लोक निर्माण विभाग ने गुफाओं की खुदाई करवाई और एलिफ़ेंटा गुफाओं के संरक्षण का प्रयास किया। सन 1905 में मुख्य गुफा के नीचे पत्थर की छह मूर्तियां निकली थीं इनमें चार मुख वाली ब्रह्मा या शिव और महीषासुरमर्दनी की मूर्तियां शामिल हैं। खुदाई में ये भी पता चला कि यहां गुफाओं के अलावा मंदिर भी रहे होंगे।

एलिफेंटा की गुफाओं से ब्रह्मा की मूर्ति मिली  | विकिमीडिया कॉमन्स

आज ये गुफाएं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में हैं। जिस तरह यहां दो हज़ार साल पहले श्रद्धालु आते थे ठीक वैसे ही आज भी महाशिवरात्री के मौक़े पर लोग यहां शिव की पूजा करने आते हैं। ये गुफाएं भले ही शैव संप्रदाय की प्रतीक हों लेकिन जो भी यहां आता है, इसकी कलात्मक सुंदरता को देखकर दंग रह जाता है।

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