रत्नेश्वर महादेव: बनारस का ‘झुका हुआ’ मंदिर

रत्नेश्वर महादेव: बनारस का ‘झुका हुआ’ मंदिर

मिर्ज़ा ग़ालिब ने बनारस को हिंदुओं का मक्का-मदीना कहा था। और यह सच है, कि अगर हिंदू धर्म का कोई आध्यात्मिक दिल है, तो बेशक वह वाराणसी ही है। वाराणसी नगरी, भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटक स्थलों में से एक है। वाराणसी की लगभग हर प्रतिष्ठित तस्वीर में गंगा नदी में आधा डूबा हुआ मंदिर नज़र आता है, जिसके बारे में ज़्यादातर लोग जानते ही नहीं हैं। इसे काफ़ी हद तक इटली के पीसा के झुके हुये मीनार की तरह ‘वाराणसी का झुका हुआ मंदिर’ कहा जा सकता है। पीसा के झुके मीनार से ऊँचे झुकाव वाला रत्नेश्वर महादेव मंदिर दुनिया के दो झुके हुए मंदिरों में से एक है।

वाराणसी शहर दुनिया के उन सबसे पुराने शहरों में से एक है, जहां बहुत समय पहले लोग आकर बसे थे। यह भारत के सबसे पवित्र शहरों में से एक है।

अपने मंदिरों के लिए मशहूर, यह शहर गंगा नदी के किनारे पर बने घाटों के लिये भी जाना जाता है। शहर के 88 घाटों में से ज़्यादातर घाटों का उपयोग स्नान और पूजा के लिए किया जाता है।

घाट पर स्थित मंदिर | सुजय - विकिमीडिआ कॉमन्स

मणिकर्णिका घाट पर स्थित रत्नेश्वर महादेव एक अद्भुत मंदिर है, जो 9 डिग्री के कोण पर झुका हुआ है। इस मंदिर का झुकाव इटली में पीसा के मशहूर मीनार से 5 डिग्री अधिक है। दिलचस्प बात यह है, कि यह दुनिया में झुके हुए दो मंदिरों में से एक है। दूसरा मंदिर “हुमा का झुका हुआ मंदिर” है, जो ओड़िशा है।

बनारस के मणिकर्णिका घाट की एक पुरानी तस्वीर | विकिमीडिआ कॉमन्स

जिस घाट पर यह मंदिर बना हुआ है, उसका भी बहुत महत्व है। मणिकर्णिका घाट वाराणसी के सबसे पुराने और पवित्र घाटों में से एक है। बनारस में केवल दो घाट हैं, जहां अंतिम संस्कार किया जाता है, और यह उनमें से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शिव की पत्नी सती के कान के कुंडल इसी घाट पर गिर गए थे। मंदिर का नाम उसी बाली पर पड़ा है। यह मंदिर 51 शक्ति पीठों में से एक है। माना जाता है, कि जब सती ने आत्मदाह किया था, तब उनके शरीर के 51 अंग समस्त भारतीय उपमहाद्वीप में गिर गए थे, जिनमें से उनके कुंडल वारणसी में गिरे।

एडविन ग्रीव्स ने अपनी पुस्तक “काशी द सिटी इलस्ट्रियस या बनारस (1909)” में मणिकर्णिका घाट का जीवंत वर्णन किया है। इस पुस्तक में झुके हुए मंदिर का भी उल्लेख है। वे लिखते है:

नदी के किनारे के पास से देखने पर मणिकर्णिका कुंड के पास पैदल मार्ग के बीच में लोगों का हुजूम दिखाई पड़ता है।  इसके पीछे मंदिरों और इमारतों का एक अजीब-सा जमघट है, जिसमें अमेठी के राजा का लाल गुंबद वाला मंदिर सबसे ऊंचा है; अगले हिस्से में एक झुका हुआ मंदिर और बरामदा है, जो लगभग पानी के स्तर पर ही बना हुआ है, और जिसे देखकर लगता है, कि ये कभी भी पानी के ऊपर गिर जाएगा । देश के विभिन्न हिस्सों से तरह-तरह की पोशाकों में स्नान करने आये लोगों की उत्सुक भीड़ रंग बिरंगी छटा बिखेरती दिखाई देती है।”

रत्नेश्वर महादेव मंदिर, तारकेश्वर महादेव मंदिर के पास ही स्थित है। इस घाट पर तारकेश्वर महादेव मंदिर, मालवा साम्राज्य की महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने बनवाया था।

मंदिरों की पुरानी तस्वीर जिसमे कुछ मंदिर पानी में डूबे हुए नज़र आ रहे हैं | विकिमीडिआ कॉमन्स

ये मंदिर एक पहेली है। इस मंदिर का इतिहास संदिग्ध है, यहां तक के इसके निर्माण के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, मंदिर का निर्माण राजा मान सिंह के एक सेवक ने करवाया था, जिसका नाम पता नहीं है। जबकि एक अन्य कथा के अनुसार इसका निर्माण अहिल्या बाई के एक सेवक ने करवाया था। कुछ विद्वानों का मानना ​​है, कि मंदिर का निर्माण ग्वालियर के सिंधिया वराजवंश की रानी बैजा बाई ने 19वीं शताब्दी में करवाया था। उत्तर भारतीय नागर शैली में बने मंदिर में एक गर्भगृह, एक अर्ध-मंडपा और एक बड़ा हाल है। नदी के जलस्तर बढ़ने पर, ये सभी पानी में डूबे जाते हैं।

पानी में डूबा हुआ मंदिर | Antoine Taveneaux - विकिमीडिआ कॉमन्स

विडंबना यह है, कि यह मंदिर को जानने के कारणों पर रहस्यों का पर्दा पड़ा है। कोई नहीं जानता, कि ये मंदिर झुके हुये अंदाज़ में क्यों बनाया गया है? और इसे बनाने के लिये ये स्थान क्यों चुना गया ? घाटों पर बने अन्य मंदिर जहां गंगा के प्रवाह से दूर ऊंचे स्थानों पर बने हुए हैं, रत्नेश्वर महादेव मंदिर नदी के पास बहुत निचले स्तर पर बना है। इसका चबूतरा इतना नीचा है, कि ये मंदिर ज़्यादातर समय, आंशिक रूप से पानी में डूबा रहता है। नदी का पानी शिखर के एक हिस्से तक पहुंच जाता है। बहरहाल, इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह है, कि ये मंदिर बनाने वाले अच्छी तरह से जानते थे, कि मंदिर ज़्यादातर समय पानी के भीतर ही रहेगा। ये एक रहस्य है, कि उन्होंने ये मंदिर नदी के इतने क़रीब क्यों बनाया, जिसकी वजह से उसके पानी में डूबे रहने की संभावना हमेशा बनी रहेगी। दिलचस्प बात यह भी है, कि घाटों पर बना यह एकमात्र झुका हुआ मंदिर नहीं हो रहा होगा, क्योंकि उस समय के चित्रों और रेखाचित्रों में और भी कई झुके हुए मंदिर दिखाई देते हैं। बाक़ी मंदिर तो समय के साथ नष्ट हो गये, लेकिन रत्नेश्वर महादेव मंदिर ही अब तक बचा हुआ है।

सन 1820 से सन 1830 के दौरान, अंग्रेज़ विद्वान और प्राच्यविद् जेम्स प्रिंसेप को बनारस टकसाल में एक पारखी उस्ताद के रूप में नियुक्त किया गया था। अपने प्रवास के दौरान उन्होंने कई चित्र बनाये जो ‘बनारस इलस्ट्रेटेड, इन ए सीरीज़ ऑफ़ ड्रॉइंग्स’ के नाम से प्रकाशित हुए। वे लिखते हैं, “दाहिने हाथ की ओर अष्टकोणीय मठ, अहिल्या बाई के घाट के दक्षिण कोने की निशानदेही करता है; बाहर बने आलों में से एक आला बैठी हुई मुद्रा में इस प्रसिद्ध राजकुमारी की सफ़ेद संगमरमर की एक छोटी आकृति से सजा हुआ है। राजकुमारी ने रेखाचित्र में बने दो मंदिरों को उस स्थान पर बनवाया, जहां अन्य मंदिर थे। ये दोनों मंदिर नदी में बह गये थे। बहुत जल्द बाक़ी नयी संरचनाओं पर भी बह जाने का ख़तरा मंडराने लगेगा, क्योंकि नदी का प्रवाह इन्हें कमज़ोर कर रहा है। बारिश में मंदिर छत तक डूब जाते हैं, बहुत से निडर हिंदू, ख़तरे और असुविधायें झेलकर भी अपनी परंपरागत पूजा को जारी रखते हैं। वह नदी के तेज़ बहाव में तैरते हैं और बरामदे तथा चौखट के नीचे ग़ोते लगाते हैं।”

मंदिर का एक दृश्य | Ilya Mauter- विकिमीडिआ कॉमन्स

आज हम जो झुका हुआ मंदिर देखते हैं, उसे जानबूझकर ऐसा नहीं बनाया गया था। मंदिर कई वर्षों के अंतराल में झुक गया है। दिलचस्प बात यह है, कि कुछ शुरुआती चित्रों में मंदिर की बनावट में कोई झुकाव नहीं देखाई देता है। मंदिर का झुकना संभवतः 20वीं शताब्दी में शुरु हुआ था। कमज़ोर या ग़लत तरीक़े से बनाई गई नींव और मंदिर के नीचे पानी और नदी के दबाव के कारण मंदिर झुकने लगा होगा। दिलचस्प बात यह है, कि इस मंदिर से जुड़ी कथाओं में मंदिर के झुकाव का कारण अभिशाप बताया गया है। एक अन्य लोकप्रिय कथा में राजा मान सिंह के सेवक ने अपनी मां रत्ना बाई की याद में मंदिर का निर्माण कराने के बाद बड़े गर्व के साथ कहा था, मैंने अपनी मां का कर्ज़ (मातृ-ऋण) चुका दिया है।” इस बात से मां ख़ुश नहीं हुई। मां का मानना था, कि मां का कर्ज़ तो कभी भी नहीं चुकाया जा सकता। इस तरह सेवक की मां ने श्राप दे दिया और मंदिर झुकने लगा। इस पौराणिक कथा में मंदिर का वैकल्पिक नाम “मातृ-ऋण” है।

साल में ज़्यादातर समय पानी में डूबे रहने के बावजूद, इस मंदिर की बहुत अच्छी तरह से देखभाल की जा रही है। ऐसा माना जाता है कि वाराणसी में यही वह मंदिर है, जिसके सबसे ज़्यादा फ़ोटो खींचे जाते हैं….अगर यह सच है, तो इसमें आश्चर्य करने वाली कोई बात नहीं है।

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