भरहुत स्तूप: बौद्ध कला का खज़ाना  

भरहुत स्तूप: बौद्ध कला का खज़ाना  

उज्जैन से विदिशा होते हुए, एक रास्ता, पाटलिपुत्र को जाता है। वहां से यह रास्ता उत्तर की तरफ़ मुड़ता है और मैहर नदी घाटी पार कर कौशाम्बी और श्रावस्ती पहुंचता है। अपनी एतिहासिक पृष्ठ भूमि के साथ यहां एक बौद्ध स्थल भरहुत है जो शायद, भारत में महान बौद्ध स्थलों में से एक है। इसकी खोज भारतीय पुरातत्व के जनक एलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने सन 1874 में की थी। भरहुत स्तूप मगध साम्राज्य के मध्य प्रांत के एक छोर पर स्थित है। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का मानना है कि जिस स्थान पर ये स्तूप स्थित है वह उस युग के प्रमुख राजमार्ग का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। हालंकि ये स्तूप अलग तरह का है लेकिन फिर भी सांची और उसके अन्य स्मारकों से ये काफ़ी मिलता जुलता है जो इसे विश्वस्नीय बनाता है।

भरहुत गांव मध्य प्रदेश के सतना ज़िले में है। ये स्थान ई.पू. दूसरी सदी की बौद्ध कला के जटिल उदाहरणों में से एक है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि भरहुत में मूल स्तूप अशोक मौर्य ने तीसरी ई.पू. में बनवाया था और दूसरी ई.पू. शताब्दी में इसे बड़ा रूप दिया गया।

कनिंघम द्वारा 1874 में की गई पहली खुदाई | विकिमीडिआ कॉमन्स  

कनिंघम ने जब सन सन 1874 में इसकी खोज की थी तब ये भरहुत स्तूप लगभग बरबाद हो चुका था और यहां के कटघरे और प्रवेश द्वार आसपास के कई गांव में भवनों की शोभा बढ़ा रहे थे। वहां वेदिका (स्तूप के आसपास पत्थरों से बनी मंडेर और कटघरे) के सिर्फ़ तीन खंबे बचे थे। साथ ही पूर्वी तोरण का एक खंबा भी बचा था।

इन खंबों पर अभिलेख देखकर कनिंघम दंग रह गए और उन्होंने फ़ौरन अपने सहायक जोसेफ़ बेगलर को इस जगह की खुदाई करने करने का आदेश दिया। खुदाई होती देख गांववालों को शक हुआ कि ये लोग ज़मीन में दबा सोना निकालने के लिए खुदाई कर रहे हैं लेकिन उन्हें ये नहीं पता था कि कनिंघम सोने से भी कहीं ज़्यादा बेशक़ीमती ख़ज़ाने के लिए खुदाई कर रहे थे।

भरहुत में 11 वीं शताब्दी की बुद्ध की छवि | विकिमीडिआ कॉमन्स  

खुदाई में अचानक लाल पत्थर के बने नक़्क़ाशीदार तोरण (प्रवेश द्वार) और वेदिका (कटघरे) के बिखरे हुए टुकड़े मिले। इनमें से ज़्यादातर टुकड़ों पर आरंभिक ब्रह्मी लिपि में लिखित अभिलेख अंकित थे। सतह पर एक और जो ढांचा दिखाई दिया वो एक बौद्ध मंदिर था जो शायद गुप्त काल का था। मंदिर के अंदर 12वीं सदी की पाल शैली में बनी बुद्ध की छवि थी। ये खोज इस मायने में दिलचस्प थी क्योंकि इससे पता चला कि इस क्षेत्र में,12वीं सदी तक बौद्ध धर्म ज़िंदा था। यहां एक बड़ा आयताकार स्लैब भी मिला था जिस पर संस्कृत बौद्ध अभिलेख अंकित था लेकिन इसके बाद यहां कुछ नहीं मिला।

जिस स्थान पर भरहुत स्तूप मिला है वह कनिंघम के अनुसार भिल्सा क्षेत्र का ही हिस्सा है। इसके अलावा सांची, अंधेर, सातधारा, सोनारी और मुरेल खुर्द भी भिल्सा का ही हिस्सा हैं जहां स्तूप मिले हैं। दिलचस्प बात ये है कि कुरुंग मृग जातक कथा में बुद्ध के महत्वपूर्ण शिष्य औऱ बौद्ध धर्म के शिक्षक सारीपुत्र और मौद्गल्यायन बुद्ध के साथ अपने पूर्व जन्म के एक रुप में अवतरित होते हैं। भिल्सा के स्तूपों में इन दोनों शिक्षकों के चिन्ह देखे जा सकते हैं। इनके अवशेष सांची और सातधारा के स्तूपों में भी मिलते हैं। वहां मिली इनकी समाधियों पर अंकित अभिलेखों से भी इस बात की पुष्टि होती है।

भरहुत में केंद्रीय स्तूप का व्यास क़रीब 21 मीटर है और ये इंटों का बना हुआ था जिसे लूटा गया और नष्ट कर दिया गया था। ऐसा संकेत मिले था कि ये स्तूप दो चरणों में बनाया गया था। बाद की साबुत ईंटें 30x30x9 स्क्वैयर सेंटीमीटर की थीं जबकि टुकड़ों में मिली पहले की ईंटें 12.5 से लेकर 15.5 सें.मी. मोटी थीं। खुदाई में ईंटों के स्तूप के आधार का एक छोटा सा ही साबुत हिस्सा मिला था।

लाहौर किला, 1863

इससे पता चला कि स्तूप के बाहरी हिस्से पर पलस्तर किया गया था। परिकर्मा पथ स्पष्ट रुप से रेखांकित किया हुआ था और इसलिये परिधि का अंदाज़ा लगाना संभव था। सांची, भट्टीप्रोलु या फिर अमरावती के स्तूपों की तुलना में भरहुत का स्तूप छोटा है। हालंकि ये स्थान छोटा था लेकिन यहां मूर्तिकला संबंधी विस्तृत विविरण मिला था। कटघरों में गोलाकार पदक बने हुए थे जिन पर जातक और बुद्ध की जीवन कथाओं तथा उनके विचारों का वर्णन था। इनके अलावा इन गोलाकार पदकों पर श्रद्धालुओं, दानदाताओं, शलभंजिका, यक्ष, बाघ, फूलों के भित्ति चित्र तथा यूनानी यौद्धा सहित अन्य व्यक्तियों की छवियां ,जिनमें यूनीन योद्धा की तरह दिखाई देनेवाली आकृति भी शामिल हैं।

ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बात ये है कि बेगलर खुदाई में निकली मूर्तियों या मूर्तियों के अवशेषों की तस्वीर लेता था जो अपने समय से आगे की बात थी और भारत में तो ऐसा पहली बार हुआ था। कनिंघम ने पड़ौस के गांव से जितना संभव हो सका उतने प्राचीन स्मारकों के अवशेष जमा किए। उन्हें मालूम था कि ज़्यादातर मूर्तियों को फिर दुरुस्त नहीं किया जा सकता था और भवन बनाने के लिये ज़्यादातर मूर्तियों को तोड़ दिया गया था ताकि इनका फिर इस्तेमाल भवन निर्माण में किया जा सके।

कनिंघम ने सारा संकलन कोलकता में संग्रहालय को भेजने का फ़ैसला किया क्योंकि उन्हें यहां इनकी सुरक्षा को लेकर चिंता थी। हालंकि इन मूर्तियों को संग्रहालय भेजने को लेकर बहस हुई लेकिन कनिंघम को पक्का यक़ीन था कि कोलकता में ये सुरक्षित रहेंगी। वह इन्हें ब्रिटेन भेजने के भी सख़्त ख़िलाफ़ थे क्योंकि उन्हें पता था कि जिस तरह भारत से भेजी गईं अन्य कलाकृतियां और लिखित खंड (ब्लॉक) ब्रिटिश संग्रहालय के स्टोर रुम में पड़े हुए हैं वैसे ही ये मूर्तियां भी वहां पड़ी रहेंगी। कटघरों और प्रवेश द्वारों को मरम्मत कर भारतीय संग्रहालय में रख दिया गया जो आज भी वहां मौजूद हैं और जो संग्रहालय का गौरव हैं।

मूर्ति संबंधी डाटा की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि यह कटघरों में बने गोलाकार पेंडलों में अंकित कहानियां हैं। ऐसी ही एक कथा माया के सपने की है जब उनके गर्भ में बुद्ध आये थे। बुद्ध की मां ने सपने में देखा कि एक स्वर्गिक सफ़ेद हाथी उनके गर्भ में दाख़िल हो गया। इसी तरह अनंत पिंडिका द्वारा जेतावना को ख़रीदने की कथा भी बहुत रोचक है। आप ज़मीन को ढ़के घूंसे के चिन्ह वाले सोने के सिक्के देख सकते हैं। स्तूप में गया में बोधी वृक्ष की अराधना का भी दृश्य है। यहां पत्थर का एक सिंहासन है जो अशोक द्वारा उपहार में दिए गए वज्रासन सिंहासन के तरह ही है। ये वज्रासन आज भी बोध गया में बोधी वृक्ष के सामने मौजूद है।

भरहुत में कई जातक कथाओं का वर्णन है जैसे वसंतारा जातक, करका जातक, महाकपि जातक, निगरोध मृग जातक, कुरुंग मृग जातक तमिया जातक आदि।इसके अलावा एक अज्ञात यूनानी यौद्धा की भी छवि है जिसने सिर पर शाही पट्टी (हेडगियर) और अंगरखा पहन रखा है, उसके छोटे बाल हैं और वह बूट पहने हुए है। उसकी तलवार पर नंदीपाड़ा बना हुआ है जो बौद्ध चिन्ह है। वह द्वारपाल की तरह खड़ा हुआ है। कई पत्थरों पर बने प्रतीक चिन्हों पर खरोष्ठी संगतराश के ठप्पे हैं।

पैनलों में से एक पैनल पर धर्मचक्र की अराधना का चित्रण है और इसके नीचे चार घोड़ों वाला एक सुंदर रथ दिखाई पड़ता है। इसी तरह आश्यर्यजनक मूर्तियों में एक मूर्ति गजलक्ष्मी की है जो कटघरे के एक गोलाकार पदक पर बनी हुई है। ये शायद आरंभिक छवियों में से एक थी और ये उत्तर-पश्चिमी भारत के इंडो- स्क्य्थिंस शासक अज़ेस के समय के सिक्कों पर बनी प्रथम ई.पू. सदी की गजलक्ष्मी की छवि से बहुत मेल खाती है। इस छवि में गजलक्ष्मी खड़ी हुई हैं और दो हाथी अपनी सूंड में पानी भरकर उन्हें स्नान करा रहे हैं। ये बहुत महत्वपूर्ण भारतीय छवि है जो 13वीं सदी तक क़ायम रही।

कला शैली और अभिलेखों तथा सुगना राजवंश के शासक धनाभूति के नाम वाले अभिलेख के अध्ययन के आधार पर भरहुत स्तूप के निर्माण-काल को लेकर पुरातत्वविदों और कला इतिहासकारों में मतभेद रहे हैं। कुछ मानते हैं कि सुगना शब्द का अर्थ सुग होता है जबकि कुछ का विश्वास है कि ये सुगना राजवंश है जिसने सुघ शहर से पंजाब पर शासन किया था। ऐसे में यहां पत्थरों पर खरोष्ठी संगतराश के निशानों का जवाब मिल सकता है।

धनाभूति का भारहुत शिलालेख   | विकिमीडिआ कॉमन्स  

भरहुत में एक अन्य अभिलेख पर भी राजा धनाभूति का उल्लेख है। ये शायद वही धनाभूति है जिसने मथुरा में बोद्ध संघ को एक प्रवेश द्वार और कटघरा दान किया था। हालंकि भरहुत पत्र अशोक ब्रह्मी (ई.पू. तृतीय सदी) में हैं और मथुरा से मिले पत्र पहली सदी के लगते हैं। पुरातत्वविद और कला इतिहासकार अजीत कुमार स्तूप के निर्माण का समय पहली सदी को मानते हैं जबकि कनिंघम को पूरा विश्वास था कि इसका निर्माण दूसरी-तीसरी शताब्दी ई.पू. में हुआ था। सच्चाई शायद इन दोनों शताब्दियों के बीच कहीं है। बहरहाल, इतना तो कहा ही जा सकता है कि भरहुत हालंकि सांची और बोध गया के स्तूपों से काफ़ी मिलते जुलते हैं लेकिन इसकी नक़्क़ाशी की शैली काफ़ी फूहड़ है।

भरहुत की अनोखी बात ये है कि यहां के पैनलों पर नक़्क़ाशी में पात्रों के नाम अंकित हैं जिसकी वजह से उन्हें पहचानना आसान हो जाता है। भरहुत मूर्तियां भारत में बौद्ध कला और वास्तुकला के आरंभिक मूर्तिविहीन दौर की साक्षी हैं और इस तरह ये उप-महाद्वीप के आरंभिक कला इतिहास का एक अमिट हिस्सा हैं।

भरहुत के अवशेष हालंकि सुरक्षित हैं लेकिन बहुत अच्छा नहीं माना जा सकता। भारतीय संग्रहालय में कटघरों और अन्य स्तूप संबंधी चीज़ों को फ़र्श में सीमेंट से लगा दिया है और अब उन्हें बिना भारी नुक़सान पहुंचाये निकाला नहीं जा सकता।

भरहुत अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है और ये भोपाल क्षेत्र में आता है लेकिन ये जगह अब पुराने वैभव और ठाट-बाट से एकदम जुदा वीरानगी में पड़ी है। यहां अब न तो मूर्तियां हैं और न ही कोई प्राचीन ढांचे, यहां तक कि न तो पास में कोई संग्रहालय ही है और न ही तस्वीरों का कोई रिकॉर्ड।

अगर यहां कोई संग्रहालय हो जहां स्तूप की नक़ल रखी जाए तो न सिर्फ़ ये एक बौद्ध पर्यटन स्थल बन जाएगा बल्कि इसको वो हक़ भी मिल जाएगा जिसका वो हक़दार है। स्थानीय लोगों के लिये ये गौरव की बात तो होगी ही।

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