बिष्णुपुर के प्रसिद्ध मंदिरों की दास्तां

बिष्णुपुर के प्रसिद्ध मंदिरों की दास्तां

बिष्णुपुर का शाब्दिक अर्थ है विष्णु की भूमि । लेकिन यहां आने वाले बहुत कम लोगों को इस बात की जानकारी है कि टेराकोटा और पक्की मिट्टी के बने मंदिर के लिये प्रसिद्ध ये शहर वृंदावन से प्रेरित होकर बनवाया गया था जहां विष्णु के अवतार भगवान कृष्ण का बचपन बीता था। कोलकता से 138 कि.मी. दूर बिष्णुपुर मल्ल राजवंश की राजधानी हुआ करता था। 17वीं-18वीं शताब्दी में मल्ल साम्राज्य अपने उत्कर्ष पर था। इसी युग में यहां ज़्यादातर मंदिरों का निर्माण हुआ था। ये मंदिर समृद्धि और वैभव के प्रतीक थे और कलाकारों और शिल्पियों के लिये प्रेरणा हुआ करते थे।

बिष्णुपुर कब बसा, इसे लेकर इतिहास में हालंकि कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है लेकिन जो हम जानते हैं वो ये है कि 7वीं शताब्दी के आरंभ में यह मल्लभूम साम्राज्य का प्रमुख हिस्सा हुआ करता था। इनका साम्राज्य पश्चिम बंगाल में बंकुरा, बर्धमान, मदनीपुर और मुर्शीदाबाद के कुछ हिस्सों से लेकर बिहार में छोटानागपुर तक फैला हुआ था। उनकी पहले राजधानी दक्षिण बंकुरा में जॉयपुर के पास हुआ करती थी लेकिन 16वीं शताब्दी के आसपास उन्होंने बिष्णुपुर को अपनी राजधानी बना लिया। साम्राज्य के विस्तार के बाद मल्ल शासकों ने कला की तरफ़ ध्यान देना शुरु किया। वे कला और धर्म के बड़े संरक्षक थे। उन्होंने 10वीं और 18वीं में टेराकोटा के मंदिर बनवाए जिन पर बहुत सुंदर नक़्क़ाशी है। इन मंदिरों पर दरअसल उस प्रांत का इतिहास लिखा हुआ है।

बिष्णुपुर का दरवाज़ा | LHI

इसके पहले कि हम आपको बिष्णुपुर के मंदिरों के बारे में जानकारी दें, ये बात बताना ज़रुरी है कि बिष्णुपुर ही नहीं बल्कि पूरे बंगाल राज्य भर में टेराकोटा या पकी मिट्टी के मंदिरों की भरमार है। इसकी वजह ये है कि यहां गंगा, हुगली और पद्मा नदी और उनकी उप-नदियां बहती हैं। इनकी गाद (कीचड़) बहुत अच्छी होती है और इससे पत्थर भी अच्छे बनते हैं। इसीलिये यहां मंदिरों के निर्माण में इनका प्रयोग किया गया है। यूं पश्चिम बंगाल में कलना, बर्धमान और मुर्शीदाबाद में इस तरह के कई मंदिर हैं लेकिन बिष्णुपुर के मंदिर बंगाल मंदिर वास्तुकला की शैली की छतों की वजह से बहुत ही सुंदर लगते हैं। बिष्णुपुर में क़रीब बीस मंदिर हैं जिनमें से ज़्यादातर विष्णु और राधा तथा कृष्ण को समर्पित हैं। इनमें से कई मंदिर मल्ल शासकों की पत्नियों ने बनवाए थे।

मंदिर की कला में दर्शाई गई कृष्णा लीला | LHI

यहाँ पर मौजूद सबसे पुराने मंदिर की दिलचस्प बात ये है कि अन्य मंदिरों की तरह ये विष्णु को समर्पित नहीं है। मृण्मयी मंदिर 997 ई. को जगत मल्ल ने बनवाया था। ये मंदिर दुर्गा देवी को समर्पित है और यहां आज भी पूजा होती है।हर साल दुर्गा पूजा के समय मंदिर में बहुत रौनक़ होती है। यूं तो दुर्गा पूजा त्यौहार में नौ दिन तक पूजा चलती है लेकिन मां मृण्मयी या मां दुर्गा के इस मंदिर में बीस दिनों तक पूजा होती है।

प्राचीन मृण्मयी मंदिर | LHI

अभय पाठा मलिक ने अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ़ बिष्णुपुर राज: एन एंशियंट किंगडम इन बंगाल’ में लिखा है कि बिष्णुपुर में मृण्मयी मंदिर के पहले दो अन्य मंदिर होते थे। 9वीं शताब्दी में पृथ्वी मल्ल ने संदेश्वर मंदिर और 10वीं शताब्दी में पतिता मल्ल ने जगन्नाथ का मंदिर बनवाया था। लेकिन अब ये मंदिर अस्तित्व में नहीं हैं। इस तरह से मृण्मयी मंदिर सबसे प्राचीन मंदिर है।

बिष्णुपुर के अन्य मंदिर 16वीं-17वीं शताब्दी के दौरान बनने शुरु हुए थे। उस अवधि में मल्ल राजवंश के 49वें शासक हम्बीर मल्ल देव जिसे वीर हम्बीर भी कहा जाता है, के शासनकाल में बिष्णुपुर समृद्ध होने लगा था और अपने राजनीतिक तथा सांस्कृतिक परिवेश की वजह से पड़ौसी का ध्यान आकृष्ट करने लगा था। अकबर के समकालीन वीर हंबीर को बिष्णुपुर और मल्ला राजवंश के सबसे महानतम शासकों में गिना जाता है।

वीर हंबीर सिर्फ़ महान शासक ही नहीं बल्कि निर्माणकर्ता और सौन्दर्यवादी भी था। उसके शासनकाल में कला, कलाकार, संगीतकार, विद्वान और पवित्र लोग बहुत फूलेफले। कहा जाता है कि वही बिष्णुपुर में वैष्णव धर्म को लेकर आए थे। एक कथा के अनुसार वीर हम्बीर एक बार वृंदावन की तीर्थ यात्रा पर गए थे। 16वीं शताब्दी में वैष्णव की गौड़ीय परंपरा की स्थापना करने वाले श्री चैतन्य के अनुयायियों की वजह से तब वृंदावन का गौरव फिर वापस आ चुका था। वीर हम्बीर वृंदावन को देखकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने इसी तरह के मंदिर बिष्णुपुर में बनाने का फ़ैसला कर लिया।

रस मंच | LHI

वीर हम्बीर ने अपनी राजधानी में भगवान कृष्ण को समर्पित कई भव्य स्मारक बनवाए थे। सन 1600 में उन्होंने एक बाग़ में रस मंच बनवाया था जहां लोग जमा होते थे। रस मंच का ढांचा अनौखा है। ये पिरमिड के आकार का है जो ईंट और चट्टान के गलने से बनी मिट्टी से बना हुआ है। इसके चारों तरफ़ झोंपड़ीनुमा कंगूरे हैं। रस मंच शहर के बीचों बीच है। रस मंच में तीन घुमावदार गैलरियां हैं और मुख्य मंदिर के पैनल नक़्क़ाशीदार हैं। हालंकि ये रास मंच अब प्रयोग में नहीं है लेकिन सन 1932 तक हर साल अक्टूबर-नवंबर के माह में मल्ल शासक यहां वैष्णव रस महोत्सव मनाते थे। उस समय बिष्णुपुर और इसके आसपास के मंदिरों की मूर्तियों को यहां लाया जाता था।

दलमदल कमान तोप | विकिमीडिआ कॉमन्स 

वीर हम्बीर ने सिर्फ़ मंदिर ही नहीं बनाये थे, उसने बिष्णुपुर की क़िलेबंदी और सैन्य संगठन को भी मज़बूत किया था। उसके शासनकाल में शहर में तोपें लगवाईं गईं थीं जिनमें से कुछ अब भी मौजूद हैं। इनमें सबसे उत्कृष्ट दलमदल कमान तोप है जो आज भी शहर में देखी जा सकती है।

कलाचंद मंदिर | विकिमीडिआ कॉमन्स 

बिष्णुपुर में बाद में मल्ल शासक रघुनाथ सिंघा ने मंदिर बनवाए जो 17वीं शताब्दी में वीर हम्बीर का उत्तराधिकारी बना था। रघुनाथ सिंघा बहुत शक्तिशाली राजा था और उसने सन 1622 में सबसे पहले मल्लेश्वर मंदिर बनवाया था। कहा जाता है कि भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर को बनवाने की शुरुआत वीर हम्बीर ने की थी लेकिन मंदिर निर्माण अधूरा रह गया। ऐसा शायद इसलिये हुआ क्योंकि वीर हम्बीर ने वैष्णव संप्रदाय स्वीकार कर लिया था। रघुनाथ सिंघा ने श्याम राय मंदिर (सन 1643) महाप्रभु मंदिर (सन 1655) और कलाचंद मंदिर ( सन1656) सहित अन्य मंदिर भी बनवाए थे। उनकी पत्नी ने भी सन 1659 में बहुत ही सुसज्जित राधा विनोद मंदिर बनवाया था। इस मंदिर के कुछ हिस्से बीते सालों में ढ़ह चुके हैं।

श्याम राय मंदिर को बिष्णुपुर के सबसे उत्कृष्ट मंदिरों में गिना जाता है। ये मंदिर ईंटों का बना है जिसकी पांच आकर्षक मीनारें हैं। इन मीनारों की वजह से इसे पंच रत्न शैली के मंदिरों की श्रेणी में रखा जाता है। मंदिर के अंदर और बाहर की दीवारों पर कृष्ण लीला और रामायण के बहुत सारे चित्र उंकेरे हुए हैं। मंदिर के पैनल फूलों और अन्य ज्यामितीय आकृतियों से सुसज्जित हैं। मंदिर में अलंकरण से उस समय की उत्कृष्ट स्थानीय शिल्पकला का पता चलता है। ये बंगाली वास्तुकला में मंदिर कला का शानदार नमूना है।

श्याम राय मंदिर | LHI

सन 1656 के क़रीब वीर सिंघा ने अपने पिता रघुनाथ सिंघा से राजपाट संभाला। उसकी पत्नी शिरोमणि देवी ने भी सन 1665 में दो मंदिर बनवाए थे वीर सिंघा ने जहां सन 1658 में लालजी मंदिर बनवाया वहीं शिरोमणि देवी ने उनके पहले मुरली मोहन और मदन गोपाल मंदिर बनवाए थे। लालजी और मुरली मोहन मंदिर जहां एक रत्न शैली के मंदिर हैं, वहीं मदन गोपाल मंदिर पंच-रत्न शैली का मंदिर है जिसमें कोई ख़ास साज सज्जा नहीं है। राजधानी की सुरक्षा और सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिये वीर सिंघा ने बिष्णुपुर में एक क़िला बनवाया था जिसके अवशेष संखारीपारा में देखे जा सकते हैं। बीर सिंघ ने बिष्णुपुर में बांघ भी बनवाए थे जिनमें से ज़्यादातर अभी भी मौजूद हैं। इन्हें लाल बांध, कृष्ण बांध और गंटा बांध आदि कहा जाता है।

मदन मोहन मंदिर   | विकिमीडिआ कॉमन्स 

17वीं शताब्दी के अंत में दुर्जन सिंघा ने भी बिष्णुपुर में एक मंदिर बनवाया था। उन्होंने सन 1694 में मदन मोहन मंदिर बनवाया था जिसके द्वार पर कृष्ण लीला के दृश्य बने हुए हैं। मंदिर की मेहराबों पर युद्ध क् दृश्य बने हुए हैं। इसके अलावा मंदिर के पैनलों पर पुराणों की घटनाओं और दशावतार के भी चित्र उंकेरे हुए हैं।

सेरामपुर के समीप एक गाँव

बिष्णुपुर में मंदिर निर्माण का सिलसिला 18वीं शताब्दी में भी जारी रहा। सन 1726 में गोपाल सिंघा द्वारा बनवाए गए जोर मंदिर-समूह में दो विशाल मंदिर और एक छोटा मंदिर है। मंदिर परिसर में राधा गोविंद मंदिर है जो कृष्ण सिंघा ने सन 1729 में बनवाया था। ये मंदिर भी बहुत सुसज्जित हैं और इनकी दीवारों पर धार्मिक चित्रण है। इस समय का एक अन्य मंदिर राधा-माधव मंदिर है जो वीर सिंघा की पत्नी ने सन 1737 में बनवाया था। सन 1758 में चैतन्य सिंघा ने राधा श्याम मंदिर का निर्माण करवाया था।

राधा श्याम मंदिर   | LHI

राधा-श्याम मंदिर बिष्णुपुर में मौजूद सब मंदिरों में से सबसे नवीनतम है। इसका का बुर्ज अन्य मंदिरों के बुर्ज से भिन्न है। इसके गर्भगृह में बिष्णुपुर के जीर्णशीर्ण मंदिरों की मूर्तियां रखी हुई हैं जिनकी आज भी पूजा की जाती है।

कुछ मंदिरों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है क्योंकि वहां कोई शिला-लेख मौजूद नहीं हैं। नंदलाल और पाटपुर इन्हीं मंदिरों से एक हैं। उनकी शैली को देखकर लगता है कि ये 17वीं और 18वीं शताब्दी के रहे होंगे। एक अन्य मंदिर है श्रीधर जो नव-रत्न वास्तुकला शैली में बना हुआ है। इसमें चार बरामदे और तीन महराबें हैं। इन विशेषताओं की वजह से ये अनूठा है लेकिन इसे मल्ल शासकों ने नहीं बनवाया था। इसका निर्माण एक स्थानीय बसु परिवार ने करवाया था।

मल्ल साम्राज्य ने अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से बंगाल के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनके नियंत्रण वाली ज़मीन छोटा नागपुर पठार के किनारे थी। इसके साथ पुरुलिया (पश्चिम बंगाल) और सिंघभूम (झारखंढ़) के घने जंगल और आदिवासी क्षेत्र लगे हुए थे। इसकी वजह से मल्ल शासकों को बाहरी ख़तरा नहीं होता था। मुग़ल और बंगाल के सुल्तान उनका इस्तेमाल जंगल में रहने वाले आदिवासियों के ख़िलाफ़ करते थे। इसी वजह से मल्ल शासकों को तोप के इस्तेमाल की इजाज़तत मिली हुई थी जबकि उस समय जागीरदारों को तोपों के प्रयोग की इजाज़त बड़ी मुश्कल से मिलती थी।

मंदिर की नक्काशी में दिखते मुग़ल साफ़े  | LHI

बिष्णुपुर के मंदिरों पर कई तरह की मंदिर निर्माण कला का प्रभाव देखा जा सकता है। इनकी साज-सज्जा में मुग़ल साफ़े, जूते, कपड़े और जहांगीरी ताज देखे जा सकते हैं। इसके अलावा हाथ में बंदूक़ लिये यूरोपीय सैनिकों का भी चित्रण देखने को मिलता है। मंदिरों की दीवारों पर शिकार और समुद्री युद्ध के दृश्य भी अंकित हैं। इन मंदिरों में लोगों की अलंकृत साफ़े, टोपी और कलाई में पट्टे पहने चित्र हैं जो उत्तर भारतीय राजदरबारों के प्रभाव को दर्शाते हैं। बिष्णुपुर के मंदिरों पर मुग़ल प्रभाव भी देखा जा सकता है। चतुर्भुजाकार और गोलाकार चबूतरे इसका उदाहरण हैं जिन पर विशाल ढ़ांचा खड़ा है।

18वीं शताब्दी के ख़त्म होते होते मल्ल शासन का पतन होना शुरु हो गया था। सन 1742 में मराठों ने बिष्णुपुर पर हमला किया। उस समय गोपाल सिंघा का शासन हुआ करता था। मराठा सेना ने जनरल भास्कर पंडित की कमान में सन 1741-44 में हमला कर विष्पुर पर क़ब्ज़ा कर लिया। बाद में चैतन्य सिंघा के शासनकाल में ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी बिष्णुपुर को तबाह कर दिया। सन 1805 में बर्धवान के जागीरदारों को विष्पुर ख़रीदने की इजाज़त मिल गई। इस तरह मल्ल साम्राज्य का अंत हो गया।

बालूचरी साड़ी पर हुक्का फूँकते अफ़सर का प्रतिरूप   | LHI

वास्तुकला और डिज़ाइन के मामले में बिष्णुपुर के मंदिर लाजवाब हैं। ये सिर्फ़ पूजा स्थल ही नहीं हैं बल्कि वो झरोखा हैं जहां से इतिहास नज़र आता है। ये कलाकारों की कला का शानदार नमूना भी हैं। आज भी बिष्णुपुर की बालूचरी साड़ियों में इस अनमोल धरोहर की झलक देखी जा सकती है। इन साड़ियों पर कृष्ण-राधा, लोक कथाओं, हुक़्क़ा पीते अफ़सर और घुड़सवारों के चित्र बने होते हैं, ठीक वैसे ही जैसे मंदिर की दीवारों पर बने हुए हैं।

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