संक्रम: आंध्र प्रदेश में बौद्ध विरासत



बात जब भारत के मुख्य बौद्ध स्थलों की होती है तो शायद ही आंध्र प्रदेश का नाम गिना जाता है।पर क्या आप जानते हैं की यहाँ बौद्ध धर्म से संबंधित क़रीब 140 ऐतिहासिक स्थल हैं! ये स्थल आज भी बौद्ध धर्म के उदय से लेकर उसके प्रसार और उसकी विरासत की गाथा सुनाते हैं।

ये बौद्ध स्थल उस समय के हैं जब ई.पू. दूसरी शताब्दी से लेकर दूसरी शताब्दी तक इस प्रांत में
समृद्ध सातवाहन साम्राज्य हुआ करता था। सातवाहन ने महाराष्ट्र में पैठण को छोड़कर आंद्रप्रदेश में धान्यकटका (मौजूदा समय में अमरावती) को अपनी राजधानी बना लिया था। राजधानी बदलने के बाद सातवाहन शासकों के साथ बड़ी संख्या में विद्वान और व्यापारी भी यहां आ गए। उस समय रोम के साथ इनका ख़ूब व्यापार होता था जिसकी वजह से साम्राज्य के धन में भी वृद्धि हुई। इस दौरान बौद्ध और हिंदू संस्थानों का भी बहुत विकास हुआ।

आधुनिक समय में जहां नागार्जुनकोंडा और अमरावती जैसे स्थल सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने, वहीं कई स्थान गुमनामी के अंधेरे में खो गए, संक्रम इन्हीं में से एक है। दो हज़ार साल पुराना संक्रम बौद्ध परिसर दक्षिण-पश्चिम विशाखापत्तनम से 40 कि.मी. दूर स्थित है।

संक्रम से दिखते धान के खेत
संक्रम से दिखते धान के खेत|विकिमीडिआ कॉमन्स 

ये परिसर बोज्जनकोंडा औऱ लिंगलाकोंडा नाम की दो पहाड़ियों पर स्थित है। दोनों ही जगहों पर अब चट्टानें काटकर बनाई गईं गुफ़ाओं, स्तूपों, मठों और बुद्ध की मूर्तियों के अवशेष ही रह गए हैं। विद्वानों का मानना है कि संक्रम संघाराम शब्द का ही अपभ्रंश है। बौद्ध शब्दावली में संघाराम का अर्थ मंदिर या मठ से होता था। बोज्जनकोंडा और लिंगलाकोंडा नाम छठी औऱ 7वीं शताब्दी में तब रखे गए थे जब शैव संप्रदाय तटीय आंद्र प्रदेश में लोकप्रिय हो गया था।

लिंगलाकोंडा और उसके पीछे दिखता हुआ बोज्जनकोंडा
लिंगलाकोंडा और उसके पीछे दिखता हुआ बोज्जनकोंडा|विकिमीडिआ कॉमन्स

संक्रम की खोज अंग्रेज़ पुरातत्विद् एलेक्ज़ेंडर री (1858-1924) ने की थी। उन्होंने कहा था कि यहां मिले पत्थर के खंबे उस समय के हो सकते हैं जब सम्राट अशोक ने ई.पू. तीसरी शताब्दी में मंदिर बनवाए थे। लेकिन इस जगह का विकास काफ़ी बाद में तीसरी और चौथी शताब्दी में हुआ था। संक्रम की बड़ी विशेषता ये है कि इसमें तीनों बौद्ध संप्रदायों- हीनयान, महायान और वज्रयान का प्रभाव देखा जा सकता है।

परिसर में मौजूद एक महाचैत्य
परिसर में मौजूद एक महाचैत्य|विकिमीडिआ कॉमन्स

बोज्जनकोंडा में एक पत्थर का स्तूप है जो पहाड़ की चट्टान काटकर बनाया गया था हालंकि इस पर ईंटों से काम किया हुआ है। स्तूप के चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ है जो पत्थर का है। इसके आसपास अलग अलग आकार और रुप के अनेक स्तूप हैं जहां लोग मन्नत मांगते होंगे। इनकी लंबाई दो फुट से लेकर साढ़े दस फुट तक है। यहां चैत्यगृह है जहां पश्चिम की दिशा से सीढ़ियों से होकर पहुंचा जा सकता है।

स्तूप के अवशेष 
स्तूप के अवशेष |विकिमीडिआ कॉमन्स 

ई.पू. दूसरी शताब्दी के शिला-लेख के अनुसार ये चैत्यगृह एक महिला श्रद्धालु ने उपहार में दिया था। इनके अलावा खुदाई में मोहरें, तख़्तियां, जस्ते का एक सिक्का जिस पर सातवाहन समय का घोड़े का चिन्ह अंकित है, और गुप्त राजवंश के समुद्रगुप्त के समय का सोने का एक सिक्का मिला है।बोज्जनकोंडा पहाड़ी पर मिले भवनों के अवशेषों का ध्यान से अध्ययन करने पर पता चलता है कि संक्रम विहार की वास्तुकला पश्चिम भारत में महायान गुफाओं की वास्तुकला और नागार्जुनाकोंडा के आपरसैला विहार की शैली से काफ़ी मिलता जुलता है।

बोज्जनकोंडा की पहाड़ी
बोज्जनकोंडा की पहाड़ी|विकिमीडिआ कॉमन्स 

लिंगलाकोंडा नाम इसलिये पड़ा है क्योंकि स्तूप का आकार लिंग की तरह है। लिंगलाकोंडा के मध् हिस्से में श्रेणीबद्ध पत्थरों के सैंकड़ों स्तूप हैं और मिलेजुले प्लेटफ़ॉर्म पर सात स्तूप क़तार से खड़े हैं। भारत में किसी पहाड़ी की सतह पर इतने सारे स्तूपों की मौजूदगी दुर्लभ ही है। विद्वानों का मानना है कि इंडोनेशिया में जावा में बौद्ध स्मारक संक्रम के स्मारक की ही नक़ल है। यहां बौद्ध देवी हरीती की एक सुंदर मूर्ति मिली थी जिसे बच्चों का संरक्षक माना जाता है। इसके अलावा यहां पत्थर के दो ताबूतों के अवशेष और कई मोहरें मिली थीं जिन पर ‘हे धम्म हेतु प्रभावन’ अंकित है। दिलचस्प बात ये है कि यहां कालभैरव की मूर्ति भी मिली थी जिसका सिर गणेश का है जिस पर शंख की माला है। इससे पता चलता है कि कैसे हिंदू धर्म ने बौद्ध धर्म और इसके स्थानों को आत्मसात कर लिया था जिसकी वजह से 7वीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म का पतन हो गया।

बोरोबुदुर, जावा
बोरोबुदुर, जावा|विकिमीडिआ कॉमन्स  

संक्रम की मुख्य गुफा के ऊपर ध्यान मुद्रा में बुद्ध की विशाल मूर्ति प्रमुख आकर्षण है। मुख्य गुफा के अलावा यहां और कई छोटी और सामान्य गुफाएं हैं जो भिक्षुओँ और छात्रों की विहार हुआ करती थीं। कमरों बकी दीवारों में छेद हैं जहां दिये जलाकर रौशनी की जाती थी। परिसर में पानी के लिये चट्टाने काटकर कुएं भी बनाए गए हैं। यहां मिली कलाकृतियां चेन्नई के सरकारी संग्रहालय में रखी हुईं हैं। इनमें सबसे सुंदर कलाकृति बुद्ध की है जो बालुपत्थर से बनी हुई है जो ई.पू. प्रथम शताब्दी की है।

ध्यान मुद्रा में बुद्धा की मूर्ति, संक्रम
ध्यान मुद्रा में बुद्धा की मूर्ति, संक्रम|विकिमीडिआ कॉमन्स  

बहरहाल, संक्रम के इस बौद्ध परिसर की सदियों तक अनदेखी होती रही है जिस पर आज ध्यान देने की ज़रुरत है। हालंकि सैलानियों के लिये ये जगह अज्ञात है लेकिन हर साल बुद्ध पूर्णिमा के मौक़े पर आसपास के गांवों से हज़ारों की संख्या में लोग यहां जुटते हैं।

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