जहांगीर का आख़िरी सफ़र और उनका मक़बरा

जहांगीर का आख़िरी सफ़र और उनका मक़बरा

बात सन 1627 के आरंभ की है। मुग़ल बादशाह जहांगीर अपने पसंदीदा शहरों में से एक और मुग़ल सत्ता का महत्वपूर्ण केंद्र लाहौर (अब पाकिस्तान में) में दरबार लगा रहे थे लेकिन गर्मी ने उन्हें इतना परेशान किया और उनकी तबियत बिगड़ने लगी। उन्होंने इससे राहत पाने के लिये कश्मीर जाने का फ़ैसला किया। लेकिन वहां भी उन्हें कोई ख़ास सुकून नहीं मिला। उन्होंने वापस लाहौर वापसी का फ़ैसला किया। मगर ये उनकी ज़िंदगी का आख़िरी सफ़र साबित हुआ।

कश्मीर से लाहौर जाते समय राजौरी (जम्मू-कश्मीर) के पास 28 अक्टूबर सन 1627 को जहांगीर का निधन हो गया। भिम्बेर (पाक अधिकृत कश्मीर) के पास एक मुग़ल मस्जिद के क़रीब चिंगाज़ या चिंगुज़ सराय में उनके शरीर के कुछ हिस्से एक अस्थाई क़ब्र में दफ़्न कर दिए गए। लेकिन उन्हें अंतत: लाहौर में ही दफ़्न किया गया। अगले दस साल तक लाहौर में एक ख़ूबसूरत बाग़ के बीच विशाल मक़बरे का निर्माण कार्य चलता रहा। ये बाग़ जहांगीर की सबसे चहेती पत्नी नूरजहां का था। जहांगीर का मक़बरा आज,लाहौर के, मुग़ल काल के सबसे महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक है।

मुग़ल बादशाह जहांगीर  | विकिमीडिआ कॉमन्स

सन 1605 में पिता अकबर के देहांत के बाद जहांगीर ने मुग़ल सल्तनत संभाली। 22 साल के शासनकाल में जहांगीर ने अपनी एक ख़ास जगह बनाई। माना जाता है कि मुग़ल बादशाहों में वह एक ऐसा बादशाह था जिसे युद्ध में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी। उनका रुझान कला की तरफ़ ज़्यादा था। उन्हें प्रकृति के अध्ययन में बहुत दिलचस्पी थी और वो उप-महाद्वीप के वनस्पतियों और जीवों के कई फोलियों के लिए प्रसिद्ध है जिन्हें उन्होंने कमीशन किया था। उनके शासनकाल की एक अन्य महत्वपूर्ण उपलब्धी थी…सिक्के। सत्ता संभलाने के फ़ौरन बाद, जहांगीर ने ऐसे सिक्के चलाने शुरु कर दिए जिन पर चित्र बने होते थे। इस तरह के सिक्के चलाने वाले वह पहले मुग़ल शासक थे। नवंबर सन 1605 में पिता अकबर के देहांत के फ़ौरन बाद उन्होंने औपचारिक ताजपोशी से पहले ही, अपने पिता के चित्र वाले सिक्के बनाने का आदेश दे दिया था।

जहाँगीर द्वारा जारी चित्र वाला सिक्का | ब्रिटिश म्यूजियम

लोकप्रिय संस्कृति और कालपनिक कथाओं की वजह से जहांगीर शहज़ादे सलीम के नाम से और अनारकली से प्रेम की वजह से मशहूर हुए। लेकिन सच्चाई ये है कि जहांगीर की पत्नियों में एक नूरजहां का इतिहास में एक अहम स्थान है। मेहरुन्निसा, अकबर के शासन काल में, बाग़ी सैनिक अधिकारी शेर अफ़ग़न की बेवा थीं। सन 1611 में जहांगीर ने मेहरुन्निसा से शादी की और वह उनकी 20वीं बीवी बन गई। बीस बीवियों के बावजूद मेहरुन्निसा जहांगीर की सबसे चहेती पत्नी रहीं। उन्होंने, मेहरुन्निसा को नूरजहां ( पूरी दुनिया की रौशनी) का ख़िताब दिया।

जहांगीर और नूरजहां   | विकिमीडिआ कॉमन्स 

बहुत जल्द नूरजहां मुग़ल इतिहास की सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली महिलाओं में से एक बन गईं। वह सल्तनत के कामकाज में बहुत सक्रिय रहती थीं। उनका शासन पर इतना नियंत्रण था कि वह फ़रमान भी जारी करने लगीं थीं। यहां तक कि उनके चित्र वाले सिक्के भी चलने लगे थे जो उस समय एक असाधरण बात थी। कहा जाता है कि नूरजहां ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए व्यापार मार्गों पर “कारवां सराय” बनवाईं थीं। वह कला और वास्तुशिल्प की भी बड़ी संरक्षक थीं।

सन 1622 में जहांगीर के पुत्र शहज़ादे ख़ुर्रम, जो आगे चलकर बादशाह शाहजहाँ बने, ने अपने पिता और नूरजहां के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी। जब कंधार क़िले (अफ़ग़ानिस्तान) पर ईरानियों ने कब्ज़ा कर लिया, तब उस क़िले को ईरानियों से मुक्त करवाने की ज़िम्मेदारी ख़ुर्रम को सौंपी गई। लेकिन ख़ुर्रम को डर था कि उसकी ग़ैरमौजूदगी में कहीं नूरजहां अपने दामाद और जहांगीर के पुत्र शहरयार को सत्ता के दावादार के रूप में आगे न बढ़ा दे (जहांगीर के बेटे शहरयार की शादी नूरजहां और शेर अफ़गन की बेटी से हुई थी।) इसीलिये ख़ुर्रम ने अपने पिता और नूरजहां के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी।

मकबरे के गलियारे

लाहौर जहांगीर और नूरजहां दोनों का पसंदीदा शहर था। मुग़ल शासनकाल में लाहौर एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र हुआ करता था। अकबर के शासनकाल के दौरान सन 1585 में लाहौर मुग़लों की राजधानी बन गया था। अकबर और उसके बाद जहांगीर के शासनकाल में लाहौर में बहुत संपन्नता आई। कहा जाता है कि जहांगीर के शासनकाल में लाहौर के बाज़ारों में बहुत रौनक़ हुआ करती थी और वहां अक्सर विदेशी आया करते थे। बाज़ार तरह तरह के सामान से पटा रहते थे। मुग़ल बादशाह शाहजहां का जन्म भी लाहौर में हुआ था। लाहौर क़िला, बादशाही मस्जिद और आलमगीरी गैट जैसे स्मारकों में मुग़लों के अतीत को आज भी देखा जा सकता है।

लाहौर शहर की एक पुरानी पेंटिंग, 1849 | ब्रिटिश लाइब्रेरी 

सन 1627 में जहांगीर और नूरजहां लाहौर में थे। तभी मौसम की वजह से जहांगीर की तबीयत ख़राब हो गई। जहांगीर ने आब-ओ-हवा बदलने के लिये कश्मीर जाने का फ़ैसला किया लेकिन इससे कुछ ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ और उनकी तबीयत और बिगड़ गई। कश्मीर से लाहौर वापसी के समय शिकार के दौरान एक दर्दनाक घटना हो गई। जहांगीर ने शिकार का फ़ैसला किया और एक हिरण पर गोली चलाई जो उनके क़रीब लाया गया था। जैसे ही जहांगीर का एक आदमी हिरण को उठाने दौड़ा, उसका पैर फिसल गया और चट्टान पर गिरने से उसकी मौत हो गई। इस घटना का जहांगीर की सेहत पर और भी गहरा असर पड़ा। 28 अक्टूबर को राजौरी के पास उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र 58 साल थी और वे अपने शासन काल के बाईसवें साल में थे।

क़ायदे से जहांगीर की क़ब्र का लाहौर में होना ही ठीक माना गया। कहा जाता है कि जहांगीर लाहौर को हिंदुस्तान की सबसे बेहतरीन जगहों में मानते थे और वह यहां अक्सर दरबार लगाया करते थे। एक लोकप्रिय धारणा के अनुसार अक्टूबर सन 1627 में निधन के बाद उनके अवशेष, ख़ासकर आंतें चिंगास या चिंगुस सराय में एक अस्थाई क़ब्र में दफ़्न कर दी गईं थीं। चिंगुस सराय को चिंगुस क़िला भी कहा जाता है जो जम्मू-कश्मीर में राजौरी ज़िले से लगभग 35 किमी दूर स्थित है। माना जाता है कि ये क़िला मुग़लों ने 16वीं शताब्दी के दौरान बनवाया था। कश्मीर जाते समय मुग़ल शासक इस क़िले में आराम फ़रमाया करते थे। कहा जाता है कि नूरजहां को आशंका थी कि अगर जहांगीर की मौत की ख़बर राजधानी पहुंच गई तो सत्ता संघर्ष शुरु हो जाएगा। इसलिये वह लाहौर पहुंचने के बाद ही जहांगीर की मौत का ऐलान करना चाहती थीं।

मकबरे के गलियारे

जहांगीर के शव को सुरक्षित रखने के लिये उन्होंने उनकी आंतों को निकालकर चिंगुस सराय में दफ़्न करने का आदेश दिया। फ़ारसी भाषा में चिंगुस का मतलब आंत ही होता है।

आतें दफ़्न करने के बाद नूरजहां के भाई असफ़ ख़ान ने जहांगीर का शव लाहौर भिजवाया “नूरजहां-एम्प्रेस ऑफ़ इंडिया” (1993), के लेखक एलिसन बैंक्स लिखते हैं, “असफ़ ख़ान ने मक़सूद ख़ान और कुछ अन्य दरबारियों की निगरानी में जहांगीर का शव लाहौर भिजवाया। उन्होंने सख़्त हिदायत दी थी कि लाहौर पहुंचने तक हर वक़्त नूरजहां अपने पति के जनाज़े के पास ही रहेंगी। एक लम्बी शाही शव यात्रा भिम्बेर से लाहौर दो चरणों में रवाना हुई…पहले जत्थे में नूरजहां शव-यात्रा के साथ रवाना हुईं । दूसरे दिन दूसरा जत्था रवाना हुआ। शाहदरा पहुंचकर,जहांगीर को उनकी आख़री आरामगाह में दफ़्न किया गया।”

जहांगीर का मक़बरा, लाहौर  | विकिमीडिआ कॉमन्स 

शुरुआती अंदाज़ों से लगा था कि जहांगीर को आगरा में उनके पिता अकबर के मक़बरे के पास ही दफ़्न किया जाएगा। एक अन्य परम्परा के मुताबिक़, जहांगीर चाहते थे कि उन्हें कश्मीर में उनके अपने वरनाग बाग़ में दफ़्न किया जाए जो उनकी पसंदीदा जगहों में से एक थी।

जहांगीर की मौत के बाद मुग़ल साम्राज्य में सत्ता संघर्ष शुरु हो गया जो तीन महीने तक चलता रहा। नूरजहां अपने दामाद और जहांगीर के पुत्र शहरयार को गद्दी पर देखना चाहती थीं। लेकिन जल्द ही शाहजहां ने नूरजहां के भाई और दरबार के वकील असफ़ ख़ान की मदद से सत्ता संघर्ष में बाज़ी मार ली। जहांगीर की मौत के समय शाहजहां दक्कन में एक अभियान पर थे।

जहांगीर का मक़बरा लाहौर में रावी नदी के पुराने तट पर, शाहदरा के दिलकुशा बाग़ में है। मक़बरा बनने में दस साल लगे और इसका निर्माण कार्य सन 1637 में पूरा हुआ। कहा जाता है कि मक़बरे पर क़रीब दस लाख रुपये ख़र्च हुए थे।

मकबरे के गलियारे

मक़बरा किसने बनवाया, इसे लेकर भी इतिहासकारों और विद्वानों में मतभेद हैं। इसे शाहजहां ने बनवाया या फिर नूरजहां ने? कुछ विद्वानों का कहना है कि मुग़ल परंपरा के अनुसार शाहजहां ही मक़बरा बनवा सकते थे। इस बात के पक्ष में यह भी दलील दी गई कि भव्य मक़बरा बनवाकर शाहजहां ने ख़ुद को वास्तविक उत्ताराधिकारी साबित करना चाहता होगा।

कुछ विद्वानों का कहना है कि जहांगीर के निधन के बाद नूरजहां के पास सीमित पैसा रह गया था और मक़बरा सिर्फ़ उनकी देखरेख में ही बना होगा। कई इतिहासकारों का मानना है कि नूरजहां ने जहांगीर के निधन के आरंभिक दिन मक़बरे के निर्माण की देखरेख में बिताए थे। लेकिन ये भी कहा जाता है कि मक़बरे की डिज़ाइन, साज-सज्जा और नक़्शे के मामले में भी अंतिम फ़ैसले सिर्फ़ नूरजहां के हाथ में नही रहे होंगे।

जहांगीर के निधन के बाद नूरजहां ने ख़ुद को सल्तनत के कामकाज से दूर कर लिया था और लाहौर में सादा जीवन गुज़ार ने लगीं थीं। कहा जाता है कि वह लाहौर में उसी परिसर में रहती थीं जहां जहांगीर को दफ़्न किया गया था। शाहजहां की तरफ़ से उन्हें दो लाख रुपये सालाना मिला करते थे। उनका रुझान परोपकार और धर्म की तरफ़ हो गया। कहा जाता है कि वह मक़बरे की सफ़ाई ख़ुद किया करती थीं और वहां क़ुरान पढ़ती थीं। जहांगीर की मौत के 18 साल बाद सन 1645 में नूरजहां का देहांत हो गया और उन्हें वहीं उसी परिसर में दफ़्न कर दिया गया। माना जाता है कि उन्होंने अपने लिये पहले से ही मक़बरा बनवा लिया था और क़ब्र की जगह भी ख़ुद डिज़ाइन की थी।

नूरजहां का मक़बरा  | विकिमीडिआ कॉमन्स

आज लाहौर में जहांगीर का मक़बरा महत्वपूर्ण स्मारकों में से एक है। कुछ लोग इसे आगरा के ताज महल के बाद सबसे भव्य मुग़ल इमारत मानते हैं। इसकी ख़ास बात ये है कि एक तरफ़ जहां अधिकतर मुग़ल मक़बरों के ऊपर एक ख़ास तरह का गुंबद होता है लेकिन इसकी छत एकदम सपाट है। कहा जाता है कि जहांगीर गुंबद के पक्ष में नहीं थे।

मकबरे के गलियारे

जहांगीर के समय आगरा में अकबर का जो मक़बरा बना हुआ है, उस पर भी गुंबद नहीं है। चारबाग़ गार्डन की तर्ज़ पर बना जहांगीर का मक़बरा चौकोर है जो परिसर के मध्य में है। मक़बरे के चारों तरफ़ चार सुंदर मीनारें हैं जिसमें चार चबूतरे हैं। इन चबूतरों पर छतरी है जिसका गुंबद सफ़ेद संगमरमर का है। इमारत के बाहर की तरफ़ मध्य में एक गलियारा है जहां कमरे बने हुए हैं। इसके अलावा मक़बरे में हर दिशा में ख़ानों की कई कतारें हैं जो मक़बरे के बीच उस मेहराबदार स्थान तक जाती हैं जहां जहांगीर की क़ब्र है। जहांगीर की असली क़ब्र नीचे है। क़ब्र पर जहांगीर के अलावा अल्लाह के 99 नाम अरबी भाषा में बहुत ही ख़ूबसूरत ख़त्ताती में लिखे हुए हैं।

मक़बरे के अंदर जहांगीर की क़ब्र | विकिमीडिआ कॉमन्स 

जहांगीर का मक़बरा उसकी बेहद ख़ूबसूरत साजसज्जा के लिये भी जाना जाता है। मक़बरे का अग्रभाग लाल बालूपत्थर का बना है जिस पर संगमरमर से सुंदर पैटर्न और रुपांकन बने हुए हैं। मक़बरे के भीतर भी सुंदर भित्ति चित्र बने हुए हैं और जड़ाऊ तथा परचीनकारी का महीन काम है। कहा जाता है कि मक़बरे में कभी क़ीमती नग जड़े हुए थे।

मक़बरे के अंदर की सजावट | विकिमीडिआ कॉमन्स 

18 वीं सदी में, मुग़ल शासन के पतन के बाद महाराजा रणजीत सिंह के नेतृत्व में लाहौर पर सिखों का कब्ज़ा हो गया। कहा जाता है कि रणजीत सिंह ने मक़बरे से कई क़ीमती हीरे मोती निकलवाकर स्वर्ण मंदिर में इस्तेमाल के लिये अमृतसर भिजवा दिये थे। मक़बरे का इस्तेमाल सिख सैनिक अधिकारी निवास के तौर पर भी होता था।

सिखों के बाद सन 1846 के क़रीब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया। उसने परिसर में स्थित अकबरी सराय को रेल्वे गोदाम में तब्दील कर दिया था। परिसर में आसफ़ ख़ान और नूरजहां के मक़बरों के बीच एक रेल्वे लाइन भी बिछाई गई जिससे स्मारक को नुक़सान पहुंचा। अकबरी सराय सन 1637 में एक बड़ी सराय हुआ करती थी। इसका निर्माण यात्रियों और जहांगीर के मक़बरे की देखरेख करने वालों के लिये किया गया था।

अकबरी सराय | विकिमीडिआ कॉमन्स

कहा जाता है कि अंग्रेज़ों ने मक़बरे के कुछ हिस्सों की मरम्मत करवाई थी। रावी नदी की बाढ़ से भी मक़बरे को नुक़सान होता रहा है।

1870 के दौरान ली गई मक़बरे की फोटो | ब्रिटिश लाइब्रेरी 

शाहदरा बाग़ में जहांगीर के मक़बरे के परिसर में असफ़ ख़ान और नूरजहां के भी मक़बरे हैं। यहां अकबरी सराय भी है।

असफ ख़ान का मक़बरा  | विकिमीडिआ कॉमन्स 

ये स्मारक यूनेस्को की संभावित विश्व घरोहर सूची में हैं। मुग़ल काल की कहानियां बयां करते ये स्मारक आज पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण मुग़ल विरासत है।

मुख्य चित्र: ब्रिटिश लाइब्रेरी

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