शहज़ादे अकबर की शहंशाह औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ बग़ावत

शहज़ादे अकबर की शहंशाह औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ बग़ावत

मुग़ल ख़ानदान में बेटों का पिता के ख़िलाफ़ बग़ावत करने का लंबा इतिहास रहा है। सबसे मशहूर बग़ावत सन 1658 में, औरंगज़ेब ने की थी। औरंगज़ेब ने अपने पिता को तख़्त से उतार दिया था और अपने भाइयों को क़त्ल करवा दिया था। कम ही लोग जानते हैं कि औरंगज़ेब के अपने बेटे शहज़ादे मोहम्मद अकबर ने भी सन 1681 में औरंगज़ेब का तख़्ता पलटने की कोशिश की थी।

इस बग़ावत के ज़रिए,उसके पास तख़्त पर बैठने का एक अच्छा मौक़ा था। शहज़ादे अकबर को राजपूतों और मराठों का समर्थन भी प्राप्त था। लेकिन दुर्भाग्य से बग़ावत नाकाम हो गई। यह सोचकर हैरानी होती है कि अगर वह बग़ावत कामयाब हो जाती तो भारत का इतिहास कितना अलग होता। अगर औरंगज़ेब को गद्दी से हटा दिया जाता और उसकी जगह एक खुले दिल-ओ-दिमाग़ का बादशाह सत्ता संभालेता। इतिहास के पन्नों से शहज़ादे अकबर की बग़ावत लगभग नदारद है।

पृष्ठभूमि 

उस समय हिंदू राजा वंशानुक्रम का पालन करते थे जिसके तहत सबसे बड़ा पुत्र स्वाभाविक रूप से उत्तराधिकारी बन जाता था लेकिन मुग़ल, उस्मानियां और सफ़विद सल्तनतों की तरह  इस रिवायत का पालन नहीं करते थे। मुग़ल सल्तनत में, तख़्त-ओ-ताज, सबसे लायक़पुत्र को  सौंपने का रिवाज था। इसी वजह से बादशाह के बूढ़े होने पर उत्तराधिकारियों के बीच सत्ता संघर्ष आम बात थी।

शहज़ादा मुहम्मद अकबर, शहंशाह औरंगज़ेब और मलिका दिलरस बानो बेगम का चौथा बेटा था। शहज़ादा अकबर जब सिर्फ़ एक माह का था तभी उसकी मां का देहांत हो गया था। इसीलिए औरंगज़ेब को अकबर से ख़ास लगाव था और यही वजह है कि जब अकबर ने बग़ावत की तो औरंगज़ेब को गहरा झटका लगा।

बादशाह औरंगज़ेब | विकी कॉमन्स

हुआ ये कि सन 1678 में जोधपुर के राजा जसवंत सिंह की मृत्यु के बाद औरंगज़ेब ने सत्ता हथियाने के लिए अपने वफ़ादार इंद्र सिंह को अगला राजा नियुक्त कर दिया। जब जोधपुर के राठौड़-परिवार ने औरंगज़ेब से, जसवंत सिंह के नवजात बेटे अजीत सिंह को अगला राजा नियुक्त करने का अनुरोध किया तो औरंगज़ेब ने यह शर्त रख दी कि अजीत सिंह को इस्लाम धर्म अपनाना होगा। उसके बाद अजीत सिंह को बंधक बना लिया गया। इसी बात पर सन 1679 में राठौड़-परिवार ने विद्रोह कर दिया जिसकी अगुवाई मारवाड़ के सेनापति दुर्गादास राठौड़ कर रहे थे। बहरहाल, किसी तरह राठौड़ बच्चे(अजीत सिंह) को लेकर भागने में सफल रहे। फिर उन्होंने मेवाड़ राज्य से मदद मांगी।

मेवाड़ के महाराणा राज सिंह, राठौर-परिवार की मदद के लिए तैयार हो गए क्योंकि अजीत सिंह की मां मूल रूप से मेवाड़ परिवार की राजकुमारी थींमहाराणा को लगता था कि औरंगज़ेब का अगला निशाना उनका राज्य भी हो सकता था। इसलिए मेवाड़ (उदयपुर) के सिसोदिया-परिवार ने राठौड़-परिवार की बग़ावत का समर्थन किया। 

औरंगज़ेब ने अपने चहेते बेटे शहज़ादे अकबर और जनरल तहव्वुर ख़ान को राजपूत रईसों को रिश्वत देने और उनका समर्थन हासिल करने के लिए भेजा लेकिन दुर्गादास राठौड़ ने औरंगज़ेब की बाज़ी पलट दी। ये जानते हुए कि पिता और पुत्र के बीच मतभेद हैं,  दुर्गादास ने शहज़ादे अकबर को औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ बग़ावत के लिए उकसाया और वादा किया कि उसे शहंशाह बनवाने में राजपूत रियासतें उसका पूरा समर्थन करेंगी।

शहज़ादे अकबर की बग़ावत

2 जनवरी,सन 1681 को शहज़ादे अकबर ने 30 हज़ार राजपूतों सहित कुल 70,हज़ार फ़ोजियों के साथ, अजमेर की ओर कूच किया जहां औरंगज़ेब ने डेरा डाल हुआ था। 15 जनवरी को वे शाही ख़ेमे से तीन मील की दूरी तक पहुंच गया। यह हमला करने का एक अच्छा मौक़ा था क्योंकि औरंगज़ेब की सेना के दो मुख्य डिवीज़न शाही खेमे से दूर मेवाड़ में तैनात थे। औरंगज़ेब के वफ़ादार शाही रक्षक भी वहां मौजूद नहीं थे। यह शह और मात देने का बेहतरीन मौक़ा था लेकिन औरंगज़ेब के पास इसके जवाब में एक दूसरी चाल थी।  

औरंगज़ेब ने अकबर को षडयंत्र के तहत एक पत्र लिखा। औरंगज़ेब चाहता था कि वह पत्र राजपूतों के हाथ लग जाए। उस पत्र में औरंगज़ाब ने राठौड़ और सिसोदिया को फंसाने के लिए अकबर की तारीफ़ की। जब राठौड़ को हाथों ये पत्र लगा तो उनका अकबर पर से भरोसा उठने लगा। राजपूत गठबंधन ने उसे छोड़ दिया और मेवाड़ की तरफ़ लौट गए। इसके बाद अकबर के अधिकांश सैनिक भी उसे छोड़कर शाही सेना में शामिल हो गए। 16 जनवरी को वह अकेला पड़ गया। उसके पास मेवाड़ की ओर पीछे हटने के अलावा कोई विकल्प नहीं था जहां उसके राजपूत सहयोगी थे।

महाराष्ट्र की ओर पलायन

जब दुर्गादास को अकबर की बेगुनाही का एहसास हुआ, तो उसने उसे मराठा क्षेत्र में दक्कन भागने में मदद की। दूसरे मराठा राजा छत्रपति संभाजी ने अकबर को पनाह दी। नतीज में, औरंगज़ेब ने राठौर और सिसोदिया के साथ अपने विवाद को समाप्त कर दिया और दक्कन पर आक्रमण करने पर ध्यान देना शुरू कर दिया। छत्रपति संभाजी ने अकबर को मुग़ल तख़्त पर बैठाने में मदद करने का वादा किया लेकिन वह ख़ुद आंतरिक राजनीति और युद्धों में उलझ गया।

छत्रपति संभाजी

शहज़ादा अकबर मराठा साम्राज्य के भीतर एक जगह से दूसरी जगह घूमता रहा। आख़िरकार, निराश और अपनी सुरक्षा के डर से, उसने भारत छोड़कर ईरान जाने का फ़ैसला किया। अकबर की मां, ईरान के सफ़वीद ख़ानदान से ताल्लुक़ रखती थीं। इसलिए अकबर ने औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ इस्फ़हान में अपने दूर के रिश्तेदार से मदद मांगी। अकबर सन 1683 में कुछ समय के लिए वेंगुर्ला में डच कारख़ाने में रहा। उसने नाव से ईरान जाने का फ़ैसला किया लेकिन दुर्गादास और संभाजी के सलाहकार कवि कलश ने उसे वापस बुला लिया। एक साल तक अकबर ने छत्रपति संभाजी की, उनके अभियानों में मदद की लेकिन अंत में अकबर को यक़ीन होने लगा कि मुग़ल सेना मराठों को हरा देगी। अंत में, वह राजापुर से एक ब्रिटिश मालवाहक जहाज़ से वेंगुर्ला और मस्क़त से होते हुए फ़रवरी, सन 1687 में ईरान रवाना हो गया।

अकबर लगभग एक साल बाद जनवरी सन 1688 में इस्फ़हान (ईरान) पहुंचा। सफ़ाविद सम्राट शाह हुसैन सफ़वी ने औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के उसके अनुरोध को ठुकरा दिया। उन्होंने शरियत का हवाला देते हुए कहा कि क्योंकि शहज़ादा अकबर, बादशाह औरंगज़ेब का बेटा है इसलिए बाप के ख़िलाफ़ बग़ावत में बेटे का साथ नहीं दिया जा सकता। लेकिन शाह हुसैन सफ़वी ने अकबर से वादा किया कि अगर बादशाह कोई और होगा तो वह उसकी मदद करेंगे। इस तरह निर्वासित शहज़ादा, औरंगज़ेब की मौत का इंतज़ार  करने लगा ताकि उसकी मौत के बाद वह वापस लौटकर सत्ता पर काबिज़ हो सके। दुर्भाग्य से सन 1704 में, औरंगजेब की मौत से ठीक तीन साल पहले ही, 48 वर्ष की उम्र में उसकी ही मृत्यु हो गई।

शहज़ादे अकबर के बच्चे,राजपूतों की देखरेख में

शहज़ादे अकबर को ईरान रवाना करने के बाद, दुर्गादास मारवाड़ लौट आए। अकबर के बच्चे उनकी देखरेख में थे। युद्ध विराम के तहत उन्होंने अकबर के बच्चे औरंगज़ेब को सौंप दिए। उन्होंने पहले,सन 1696 में अकबर की बेटी सफ़ियत-उन-निसा को, औरंगज़ेब को सौंपा जो उस वक़्त 16 साल की थी। औरंगज़ेब यह जानकर बहुत ख़ुश हुआ कि दुर्गादास ने सफ़ियत को इस्लामी धर्मशास्त्र की तालीम दी थी। सन 1698 में दुर्गादास ने शहज़ादे अकबर के बेटे बुलंद अख़्तर को भी सौंप दिया। इससे ख़ुश होकर, बादशाह औरंगज़ेब ने दुर्गादास और अजीत सिंह को तोहफ़े में मनसब और जागीरें दीं।

दुर्गादास और अजीत सिंह

हालांकि शहज़ादे अकबर की बग़ावत नाकाम हो गई लेकिन उसने साबित कर दिया कि औरंगज़ेब जैसे ताक़तवर बादशाह को भी पराजित किया जा सकता था।

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