राजस्थान के थांवला का शिव मंदिर

राजस्थान के थांवला का शिव मंदिर

सुनहरे घने, हरे-भरे पहाड़, ऊँचे-ऊँचे गढ़ और क़िले, सम्मोहक भाषा, रंग-बिरंगे लिबास, सुरीले गीत, मर्यादित रीत, समृद्ध कला सहित ऐतिहासिक सम्पदाओं की धरती राजस्थान के कण-कण में विभिन्नता होने के बाद भी यहां की स्थापत्य कला एकता के सूत्र में बांधे हुए रखती है। चलिए,आज आपको शिवरात्रि के पावन अवसर पर नागौर ज़िले के पूर्वी छोर पर बसे ऐतिहासिक एवं पौराणिक थांवला क़स्बे की गौरवगाथा से रूबरू करवाते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि राष्ट्रीय राजमार्ग बीकानेर-मेड़ता-अजमेर पर मारवाड़ तथा मेरवाड़ सीमा चौकी बाडी घाटी के पास अजमेर से 25 और मेड़ता से 80 किमी दूरी पर बसा हुआ है थांवला। यहां दूर-दूर तक अरावली की मनमोहक पहाड़ियां तथा इनसे निकलने वाले बरसाती नदी-नाले सभी इस गांव के चारों ओर से बहते हुए लुनी नदी में समा जाते है। इस गांव का सम्बन्ध अजमेर के शासक चौहान वंश से रहा है। यहां के पण्डित भवानीशंकर उपाध्याय बताते हैं, कि पदमपुराण के अनुसार इस क्षेत्र का तीर्थराज पुष्कर की चौबीस कोसीय परिक्रमा क्षेत्र में आने से महत्त्व बढ़ गया है। साथ ही यहां की भौगोलिक विभिन्नता मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र जैसी होने के कारण इसे मारवाड़ का मालवा भी कहा जाता है।

गांव का गढ़

एक ओर अरावली की ऊँची चोटियां, तो दूसरी ओर ढ़लान में बालू रेत के टीले पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। यहाँ आस-पास कई धार्मिक,ऐतिहासिक और सैलानियों की दिलचस्पी के स्थल मौजूद हैं। इनमें से राजा भृर्तहरिजी की गुफा, कंकेड़िया भैरू जी, काकड़ वाले बालाजी सनेड़िया, आसन मठ, राता ढूढा माताजी मंदिर, पीह की प्राचीन बावड़ी, क़िला, गांव का पहाड़ी दुर्ग, नरसिंह भगवान, जैन मंदिर के अलावा चारभुजानाथ और रघुनाथ जी का मंदिर भी जन आस्था के प्रमुख केन्द्र हैं।

थांवला का शिव मंदिर | लेखक

रियासत कालीन थांवला यहाँ के ठाकुर दातार सिंह उदावत बताते हैं, कि पाली ज़िले के जैतारण शहर के राव रतनसिंह के ज्येष्ठ पुत्र कल्याणसिंह ने अपनी राजधानी बदलकर रायपुर में स्थापित की थी। कल्याण सिंह के ज्येष्ठ पुत्र भीमसिंह थे, लेकिन उन्होंने अपना अधिकार छोड़कर छोटे भाई दयालदास को रायपुर तथा स्वयं मेड़तियों से जीतकर थांवला की बड़ी जागीर प्राप्त की थी। बाद में भीमसिंह को मारवाड़ के महाराजा गजसिंह-प्रथम ने थांवला का ज़िम्मा सन 1623 में प्रदान किया था। इनके बाद दलपत सिंह उत्तराधिकारी हुए तथा छोटे पुत्र और भाईयों को पीह, कालीयाटड़ा, मंडोवरी, कुलीयाणा, मिडंकिया तथा बवाल सहित आदि गांव मिले थे। भीमसिंह के वंशज भीम सिंह उदावत कहलाते हैं, इनमें थांवला पाटवी ठिकाना माना जाता है। ठाकुर दलपत सिंह उदावत सन 1658 में महाराजा जसवन्त सिंह के साथ काबुल के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे।

प्राचीन शिवालय बस स्टेंड पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर के बारे में पुरातत्वेता किशनलाल मारू बताते हैं, कि 10वीं शताब्दी के उतरार्द्ध अथवा 11वीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में निर्मित यह कलात्मक मंदिर पुर्वान मुखी तथा पूजान्तर्गत है। नागर शैली में निर्मित यह शिव मंदिर वास्तु शिल्पकला का सुंदर नमूना है, तथा सभी अवभव जैसे गर्भगृह, अंतराल, मण्डप, पोर्च एवं शिखर सुंदर स्थिति में हैं। यह मंदिर पुरातत्त्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित किया जा चुका है। इस मंदिर के चारों ओर ख़ूबसूरत नक़्क़ाशी के साथ उकेरी गई विभिन्न देवी-देवताओं की सभी मूर्तियां खंडित होने के बावजूद ग्रामीण बड़े श्रृद्धा भाव के साथ पूजा करते आ रहे हैं।

गांव के मध्य प्राचीन देवालय | पुरण उपाध्याय

प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष विधि-विधान के साथ शिवलिंग की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन आस-पास गांवों के किसान परिवार नए लिबास पहनकर खेतों से फल-फूल, दूध-दही व पूजन सामग्री सहित उपस्थित होकर भोलेनाथ का शृंगार करते हैं। दिन भर लम्बी क़तारों में भक्तगण अभिषेक और रात्रि में जागरण का आयोजन करते हैं।

गर्भगृह

गर्भगृह की 8 फ़ीट ऊँची छत में पूर्ण खिला कमल बना हुआ है। यहां गर्भगृह के फ़र्श के मध्य में योनीपट्ट सहित शिवलिंग स्थापित किया हुआ है। इसकी द्वार की चौखट और कपाट (किवांड़) अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है। शाखाओं पर शिव प्रतिहारों सहित मानवाकृतियों का अंकन हैं। वहीं चौखट के मध्य में शिव सहित सप्त मातिृकाओं ( महिला सुपरवाइज़रों) और भगवान गणेश का अंकन किया हुआ है। दरवाज़े के कपाटों पर फूलपत्तियां, कीर्तिमुखों सहित कुबेर उकेरे किए हुए है। गर्भगृह के बाहरी भाग में तीन प्रधान ताक़ हैं, जिनमें दक्षिण क्रम से गणेश, शिव, शिव विहीन गौधासना गौरी की खंडित मूर्तियाँ हैं।

गर्भगृह में शिवलिंग | लेखक

अंतराल

इस भाग के उत्तर-दक्षिण दोनों ओर खुला है, लेकिन दोनों ओर दो फीट ऊंची प्रस्तर पट्टिकाएं लगी हैं, जो मण्डप और बरामदे को भी चारों ओर से घेरे हुए हैं। अंतराल की छत पांच कलात्मक प्रस्तर स्तम्भों पर अवलम्बित हैं। स्तम्भों पर पूर्ण खिला कमल तथा घट पल्लव आदि अभिप्रायों का अंकन हैं। इसकी छत सपाट बनी हुई है।

सभा मण्डप

मंदिर का मण्डप 16 स्तम्भों पर आधारित है। स्तम्भों के ऊपरी भाग में ललाट/बिम्ब (केपिटल व लिन्टल) है, जिन पर गोलाकार गुम्बदनुमा मण्डप की छत टीकी हुई है। चार सादे स्तम्भों के अलावा सभी पर अर्द्ध खिले कमल और घटपल्लव आदि उत्कीर्ण किए हुए हैं।

सभा मण्डप | लेखक

बरामदा

मण्डप का बरामदा जो 6 गज़ और 6 फ़ीट में निर्मित है। इसमें दो अतिरिक्त स्तम्भों पर छत डालकर बरामदे का स्वरूप दिया गया है। चौकोर आकार में निर्मित इस छत के भीतरी भाग में पूर्ण खिले कमल का अंकन है। बांए स्तम्भ पर लता पत्रक तथा ऊपरी भाग में पुष्पलता सहित कीर्तिमुख का अंकन किया हुआ है।

शिलालेख

इस मंदिर के स्तम्भ पर संस्कृत भाषा में उकेरे गए एक शिलालेख के बारे में इतिहासकार आर.सी. अग्रवाल द्वारा वरदा वर्ष 5, अंक 1 में प्रकाशित तथा डा. दशरथ शर्मा द्वारा शोध के अनुसार पौष सुदि 4, सन 956 में महाराजधिराज सिंहराज चाहमान प्रथम के राज्यकाल में मंदिर को बहुत दान दियए जाने का उल्लेख है। डा. श्रीकृष्ण ‘‘जुगनू’’ बताते हैं, कि इस मंदिर में दूसरा शिलालेख भी चौहान शासक सिंहराज के समय का है। इस लेख के अनुसार उस काल में देवालय-प्रबंधन के लिए विस्तार से चर्चा कर गोष्टी कै आयोजन किया जाता था। इस लेख में शांकभरी के चौहान सिंहराज और उसका महंतक दुर्गराज था जो सिंहराज के अधिकारी चचेरक का पुत्र था। लेख का मूल पाठ इस प्रकार से है – संवत 1013 पौष सुदि 4 महाराजाधिराज श्री सिंघराज महंतक दुर्गरा ज चेहरक सुतश्च पुण्य यशोभिवर्द्धयेन मांल्हण दत्ति नंदानि (नंदाग्रामे) (आ) दित्यदेवाय परम भक्त वाम भगवती –स्वभुज्यमान सोमिदित्यं क– पुष्पं धूप, दीप, पवित्रकरण धवलेनदि (भिः) श्रीर (त्ना) दित्य देवस्य (शासनं ददाति) महात्म—मुपरेल प्रयत्नतः। देव ब्राह्मण रतो नंदनः समस्तव्र्वर्धते नित्यं हवदिहः (भव˜िः)। पाल्यातमिदं।

शिव मंदिर का प्राचीन शिलालेख | लेखक

यह लेख प्रारंभिक देवनागरी लिपि में है और कुटिल के संधिवय की है। इस शिलालेख के अनुसार थांवला से करीब 20 किलोमीटर दूर, अरावली श्रृंखला की दूसरी तरफ, नांद गांव में एक सूर्य मंदिर और देवी के मंदिर की देखरेख के लिए कुछ दान किया गया था। हालाँकि आज नांद गाँव में इन दोनों मंदिरों के कोई अवशेष नहीं हैं। मगर नांद गांव में एक कुषाण-कालीन शिवलिंग है जिसकी एहमियत पुष्कर की चौबीस कोसीय परिक्रमा में भी है। इस प्रकार थांवला की यह धरोहर शोधार्थीयों, पर्यटकों तथा श्रद्धालुओं का आस्था का प्रमुख केन्द्र है।

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