नानदेड़ और गुरू गोबिंद सिंह के अंतिम दिन 

नानदेड़ और गुरू गोबिंद सिंह के अंतिम दिन 

गोदावरी नदी के किनारे पर बसा है महाराष्ट्र का मशहूर शहर नानदेड़, यहां की चहल पहल और बनती हुई नई इमारतों को देखकर ये भारत के अन्य तेज़ी से विकसित होते शहरों की तरह ही लगता है। शायद ये बात कम ही लोगों को पता होगी कि नानदेड़ और इसके आस पास के इलाक़े का इतिहास क़रीब 2300 साल पुराना है। सबसे बड़ी बात यह है कि दुनियाँ भर के सिखों के लिए इसका बहुत महत्व है।

चौथी और पांचवी शताब्दी (ईसा पूर्व) में नानदेड़, नंदा राजवंश के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था और पाटलीपुत्र इसकी राजधानी थी जिसे अब पटना के नाम से जाना जाता है। यहां मौर्य और सतवाहन का शासन भी हुआ करता था। चौथी शताब्दी में इस क्षेत्र पर कल्याणी के चालुक्य राजवंश ने कब्ज़ा कर लिया था। चालुक्य शासकों ने कई मंदिर बनवाए और इस क्षेत्र में अपने वास्तुकला की गहरी छाप छोड़ी। सिद्धेश्वर मंदिर इसकी जीती जागती मिसाल है।

सिद्धेश्वर मंदिर | विकिमीडिया कॉमन्स 

13वीं शताब्दी में महानुभव संप्रदाय के पवित्र आलेख लीला चरित्र में नानदेड़ और उसकी खेती-बाड़ी के तौर तरीक़ों का ज़िक्र मिलता है। दरअसल, महानुभव संप्रदाय, भक्ति काल के दौरान उपजा एक धार्मिक आंदोलन था। पास ही के वाशिम में मिले एक ताम्रपत्र से पता चलता है कि नानदेड़ को पहले नंदीतट कहा जाता था। स्थानीय लोगों का मानना है कि भगवान शिव ने एक बार गोदावरी के किनारे पर तपस्या की थी और इसीलिए इसे नंदीतट कहा जाता है।

हज़ूर साहिब गुरूद्वारा | लिव हिस्ट्री इंडिया

नानदेड़ सिखों के लिए महज़ एक तीर्थ स्थल नहीं है बल्कि सिखों के महत्वपूर्ण पवित्र स्थलों में से एक है। हर साल यहां हज़ारों की तादाद में तीर्थयात्री आते हैं। अमृसतर में स्वर्ण मंदिर से क़रीब 1800 कि.मी. दूर स्थित ये शहर सिखों के पवित्र स्थलों में गिना जाता है क्योंकि यहां ऐतिहासिक गुरुद्वारों में से एक तख़्त सचखंड श्री हज़ूर साहिब है। यह गुरुद्वारा सिख धर्मों के पांच तख़्तों में से एक है। यहां सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना आख़िरी समय गुज़ारा था। गुरु गोबिंद सिंह ने यहीं पर आदेश दिया कि अब गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के गुरु होंगे।

जेल में मौजूद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के थीम पर बना रेस्टोरेंट

महराजा रणजीत सिंह की पहल पर 1832 और 1837 के बीच हज़ूर साहिब गुरूद्वारा बनाया गया था। ये सिख धर्म के पांच प्रमुख तख़्तों में से एक है जहां हर साल हज़ारों श्रद्धालु आते हैं। बाक़ी चार तख़्त है: अकाल तख़्त (अमृतसर), तख़्त केशगढ़ साहिब (आनंदपुर साहिब), तख़्त दमदमा साहिब (तलवंडी साहिब) और तख़्त पटना साहिब (बिहार) तख़्त सचखंड। श्री हज़ूर साहिब की एक ख़ासियत ये भी है कि यहां गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपने जीवन के अंतिम 14 महीने गुज़ारे थे.

1675 में जब नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर ने इस्लाम धर्म अपनाने से इनकार कर दिया, तो औरंगज़ेब की मुग़ल सेना ने दिल्ली के चांदनी चौक में उनका सिर क़लम कर दिया था। इसके बाद उनके नौ साल के पुत्र गोबिंद सिंह को सिखों का धर्म गुरू नियुक्त किया गया। उस दौर में मुस्लिम और सिखों के बीच लगातार संघर्ष चल रहा था और इसलिए गुरु गोबिंद सिंह ने 1699 में आध्यात्मिक-योद्धा पंथ ख़ालसा की स्थापना की। इस पंथ का उद्देश्य हथियार उठाकर अपने धर्म की रक्षा करना था। गुरु गोविंद सिंह ने ख़ालसा पंथ के लिए पांच चीज़ें अनिवार्य की थीं, ये हैं – केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कछेड़ा।

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गुरु गोविंद सिंह का बाक़ी जीवन युद्ध में ही बीता। सिखों पर मुग़ल सेना और हिमाचल में कांगड़ा और बिलासपुर के स्थानीय हिंदू राजाओं के हमले भी होते रहते थे। गुरु गोबिंद सिंह ने 1696 और 1705 के बीच 13 जंगें लड़ी। उन्हीं के सामने उनके चारों बच्चों का क़त्ल किया गया। इनमें से दो की हत्या सरहिंद के मुग़ल गवर्नर ने की थी और बाक़ी दो पंजाब में। 1704 में चमकौर के युद्ध में शहीद हो गए थे। उसी साल गुरु गोबिंद सिंह को अपने अनुनायियों के साथ आनंदपुर (पंजाब) छोड़कर दक्कन जाना पड़ा था।

1707 में शहंशाह औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उनके उत्तराधिकारी बहादुर शाह ने सिखों से सुलह की कोशिश की। उन्होंने शांति के लिए गुरु गोबिंद सिंह को दिल्ली बुलाया। गुरु गोबिंद सिंह दिल्ली आ रहे थे। रास्ते में गोदावरी के तट पर उन्होंने डेरा जमा रखा था तभी उन पर हमला हुआ। बताया जाता है कि इन हम लावरों को सरहिंद के गवर्नर वज़ीर ख़ान ने भेजा था। हमले में गुरु गोबिंद सिंह बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए और 7 अक्टूबर 1708 में उनका निधन हो गया।

नानदेड़ के हज़ूर साहिब में 1708 में गुरु गोबिंद सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था।

सिख समुदाय ने उस जगह पर एक कमरा बनवाया जहां से वे अपने अनुयायियों को संबोधित किया करते थे। इस कमरे में गुरु ग्रंथ साहिब को भी रखा गया है। गुरू गोबिंद सिंह ने इसका नाम तख़्त साहिब रखा था।

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तख़्त साहिब की मौजूदा इमारत को पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने 1830 की शुरुआत में बनवाया था। इसके लिए उन्होंने धन के अलावा पंजाब से आर्किटेक्ट और मज़दूर भी भेजे थे। उस समय नानदेड़ हैदराबाद के निज़ाम के अधीन था। 1956 में आज़ादी के बाद ये बंबई प्रेसीडेंसी में चला गया और 1960 में जब भाषाई आधार पर महाराष्ट्र बना, तो मराठी बहुल नानदेड़ इसका हिस्सा बन गया।

इस पवित्र हज़ूर साहिब की सबसे ख़ास बात यह है कि यहां एक पवित्र स्थल है जिसमें दो कमरे हैं। बाहर के कमरे में, जहां ग्रंथियों की निगरानी में तमाम धार्मिक समारोह होते हैं, वहीं अंदर के कमरे में गुरु गोबिंद सिंह साहिब की, हथियारों सहित अन्य बेशक़ीमती चीज़े रखी हुई हैं। इस कमरे में सिर्फ़ मुख्य ग्रंथी ही जा सकते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब के अलावा यहां दसम ग्रंथ भी रखा हुआ है.

नानदेड़ में हर महीने हज़ारों सिख श्रध्दालू हज़ूर साहिब आते हैं। ये जगह इसीलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पवित्र भी है और ऐतिहासिक भी है।

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