जोशीली क्रांतिकारी मैडम कामा



एक सदी पूर्व 22 अगस्त सन 1907 को एक जुझारु भारतीय महिला ने स्टुटगार्ट, जर्मनी, में अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट क़ॉंफ़्रेंस में भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया जो दरअसल हमारे राष्ट्रीय ध्वज का पहला संस्करण था जिसमें बाद के वर्षों में बदलाव होते रहे और आख़िकार वो तिरंगा बन गया जिसे आज हम जानते और प्रेम करते हैं । इस सम्मेलन में दुनिया भर से हज़ारों समाजवादी और क्रांतिकारी जमा हुए थे जिसमें व्लादिमीर लेनिन भी शामिल थे। इस महिला का नाम था मैडम भीकाजी कामा जिन्हें अंग्रेज़ एक ख़तरनाक अराजकतावाली और ऐसी कुख्यात महिला मानते थे जिसके दिमाग़ में क्रांतिकारी विचारों का फितूर भरा था।

लेकिन मैडम कामा इससे कहीं अधिक दिलेर थीं। वह दो टूक बात करने वाली थी। ऐसे समय जब नरमपंथी भारत की आज़ादी के लिये संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे, मैडम कामा ने अमेरिका स्थित एक अख़बार को दिए साक्षात्कार में कहा-

‘संयुक्त राज्य भारत हमारा उद्देश्य है, एक नया और महान गणराज्य जिस पर भारत की जनता हुक़ुमत करेगी-ये हम चाहते हैं- अगर संभव हुआ तो शांतिपूर्ण तरीक़े से या फिर ज़रुरत पड़ने पर बल से-एक रक्तहीन क्रांति-ये हमारी इच्छा है और अगर ये संभव नहीं हुआ तो फिर रक्तरंजित क्रांति- ये हमने ठान लिया है.....’

स्टटगार्ट में मैडम कामा द्वारा भारतीय स्वतंत्रता का झंडा उठाया गया
स्टटगार्ट में मैडम कामा द्वारा भारतीय स्वतंत्रता का झंडा उठाया गया|विकिमीडिया कॉमन्स

भीकाजी कामा का जन्म बम्बई के एक संपन्न पारसी परिवार में 24 सितंबर सन1861 को हुआ था। ये वो समय था जब देश में राष्ट्रवाद की लहर चल रही थी और घरों में इस पर चर्चा होती थी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भीकाजी कामा अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में ही राजनीति में दिलचस्पी लेने लगीं थीं। सन 1885 में उन्होंने प्रसिद्ध वकील रुस्तमजी कामा से शादी कर ली जो समाज सुधारक और विद्वान ख़ुर्शीदजी कामा के पुत्र थे। ख़ुर्शीदजी कामा की स्मृति में मुम्बई में के. आर. कामा ओरिएंटल इंस्टीट्यूट स्थापित किया गया था जो रिसर्च के लिये समर्पित था। लेकिन भीकाजी कामा की शादी सुखद नहीं थी क्योंकि उनके पति अंग्रेज़ों के समर्थक थे जबकि कामा कट्टर राष्ट्रवादी थीं।

सन 1896 में जब बॉम्बे में ब्यूबोनिक प्लेग फ़ैला, भीकाजी ने इसके शिकार हुए लोगो की दिन-रात सेवा की। इस महामारी में अकेले बॉम्बे में 22 हज़ार लोग मारे गए थे। भीकाजी भी प्लेग से संक्रमित हो गईं थीं और उन्हें इलाज के लिये यूरोप जाने की सलाह दी गई। सन 1902 में वह भारत से यूरोप रवाना हो गईं लेकिन उन्हें ये नहीं मालूम था कि अब यूरोप ही उनका घर बनने जा रहा है।

यूरोप में वह स्वतंत्रता आंदोलन से और जुड़ गईं और औपनिवेशिक शासन की बुराईयों के बारे में अपने विचार प्रकट करने लगीं। लंदन में उनकी मुलाक़ात दादाभाई नौरोजी से हुई और सन 1906 में उन्होंने नौरोजी लिये चुनाव प्रचार किया। नैरोजी हाउस ऑफ़ कॉमंस का चुनाव लड़ रहे थे हालंकि वह हार गए। लंदन प्रवास के दौरान भीकाजी ने हाइड पार्क में जोशीले भाषण दिए और भारत में अंग्रेज़-शासन की आलोचना की। सन 1907 में उन्होंने जर्मनी में स्टुटगार्ड में सोशलिस्ट कॉन्फ़्रेंस में हिस्सा लिया और वहां भारत का झंडा फहराया।

तलवार पत्रिका - मार्च 1910
तलवार पत्रिका - मार्च 1910|विकिमीडिया कॉमन्स

उसी समय लंदन में इंडिया हाउस की स्थापना हुई जो क्रांतिकारियों की सोसाइटी थी। इसमें मैडम कामा, वी.डी. सावरकर, मदनलाल ढ़ींगरा और लाला हरदयाल जैसे क्रांतिकारी थे। मैडम कामा सावरकर की गुरु थीं जो छात्र के रुप में लंदन आए थे। ये सोसाइटी भारत में क्रांतिकारियों को पिस्तौल और रिवॉल्वर की सप्लाई करती थी और भारतीय छात्रों को बंदूक चलाने की ट्रेनिंग देती थी। क्रांति से संबंधित पर्चे और किताबें गुप्त रुप से पोंडेचेरी के रास्ते भारत भेजी जाती थीं। ये सब तब ब्रिटेन और भारत में प्रतिबंधित थे। लेकिन स्कॉटलैंड यार्ड और ब्रिटिश गुप्तचर ऐजेंसी, सोसाइटी की गतिविधियों पर नज़र रखने लगी थीं। सन 1909 में लंदन में अंग्रेज़ अफ़सर कर्ज़न वैली की हत्या के आरोप में मदनलाल ढ़ींगरा को फांसी दे दी गई थी और इंडिया हाउस को बंद कर दिया गया था। इसके बाद कामा सहित अन्य क्रांतिकारियों को भी लंदन छोड़ना पड़ा।

सन 1909 में कामा पेरिस चली गईं जो उस समय सारी दुनिया के क्रातिकारियों का अड्डा होता था। पेरिस में मैडम कामा के घर में क्रातिकारियों की बैठकें होने लगीं। सन 1910 में सावरकर भी वहां आ गए। मैडम कामा ने वहां क्रातिकारी अख़बार “बंदे मातरम” निकाला जिसके संपादक लाला हरदयाल थे जिन्होंने बाद में यूरोप में “ग़दर पार्टी” बनाई। पेरिस और जिनीवा से प्रकाशित होने वाला अख़बार सारे विश्व में भारतीय प्रवासी पढ़ते थे। इसके बाद मदनलाल ढींगरा की स्मृति में एक पत्रिका “मदन की तलवार” निकाली गई। ये पत्रिका जर्मनी में छपती थी और इसे लंदन के ज़रिये गुप्त रुप से भारत पहुंचाया जाता था।

लेनिन (L) और मैक्सिम गोर्की (R)
लेनिन (L) और मैक्सिम गोर्की (R)|विकिमीडिया कॉमन्स

भीकाजी कामा लेनिन और मौक्सिम गोर्की के संपर्क में थीं और वह फ्रैंच सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो गईं थीं। सन 1914 में प्रथम विश्व युद्ध में फ़्रांस, ब्रिटेन के साथ हो गया था। इस युद्ध में हिस्सा लेने जब पंजाब सैनिक टुकड़ी मार्सेलीज़ पहुंची तो कामा ने उन्हें भड़काने की कोशिश की तो फ़्रांस ने उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया। नवंबर सन 1917 में उनकी रिहाई हो गई। अगले कुछ दशकों तक वह भारत की आज़ादी के लिये लड़ती रहीं हालंकि उम्र और बीमारी का असर उन पर पड़ने लगा था। अब वह पहले की तरह सक्रिय नहीं रह पा रहीं थीं।

नवंबर 1935 में भीकाजी भारत आ गईं। उन्हें पक्षाघात हो गया था। नौ महीने बाद यानी 13 अगस्त सन 1936 को, 74 साल की उम्र में उनका निधन हो गया। नौ साल बाद भारत अंग्रेज़ों से आज़ाद हो गया लेकिन दुर्भाग्य से ये देखने के लिये वह जीवित नहीं थीं।

मैडम कामा की स्मारक डाक टिकट
मैडम कामा की स्मारक डाक टिकट|डाक विभाग, भारत सरकार

सन 1907 में मैडम कामा ने जो झंडा डिज़ाइन किया था उसे प्रसिद्ध स्वंतंत्रता सैनानी और गुजरात के समाजवादी नेता इंदुलाल याग्निक गुप्त रुप से भारत ले आए थे। ये झंडा पुणे में मराठा और केसरी लाइब्रेरी में देखा जा सकता है।

मैडम कामा एक ऐसी क्रांतिकारी महिला और नेता थीं जिन्होंने भगत सिंह सहित कई अन्य क्रांतिकारियों को प्रेरित किया। कहा जाता है कि भगत सिंह उनके लेख पढ़ा करते थे। हालंकि वह आज़ाद भारत में राष्ट्रीय ध्वज को फहराता नहीं देख पाईं लेकिन ये तो उन्होंने अपने जीवन में सुनिश्चित कर लिया था कि एक दिन ये ध्वज ज़रुर फ़हराया जाएगा।

*कवर इमेज साभार-विकीपीडिया-श्रीजीत

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