माह लक़ा बाई: दक्कन की मायावी शायरा



बंजारन की तरह अपनी ज़िंदगी शुरु करनेवाली माह लक़ा बाई ने, देखते ही देखते वह दक्कन में सबसे ताक़तवर महिलाओं में से एक बन गईं। हम यहां कहानी बता रहे हैं एक ऐसी तवाइफ़ की जो हैदराबाद के दो निज़ामों की क़रीबी रहीं और जिनकी बहादुरी रियासत के जांबाज़ों से किसी मायने में कम नहीं थी।

18वीं सदी के दक्कन में माह लक़ा बाई सबसे प्रभावशाली महिला थीं। इस तवाइफ़ की कई ख़ूबियां थीं, वह शायरा थीं, योद्धा थीं, राजनीतिक सलाहकार थीं, शिक्षक थीं और कला की संरक्षक भी थीं।

माह लक़ा बाई पालकी में सवार  
माह लक़ा बाई पालकी में सवार  |विकिमीडिया कॉमन्स 

दरअसल, माह लक़ा बाई का योगदान इतना महत्वपूर्ण था कि उन्हें हैदराबाद के दूसरे निज़ाम ने सीनियर उमराह का दर्जा तक दे दिया था। ये मुक़ाम हासिल करने वाली वह पहली और एकमात्र महिला थीं। इस सम्मान के साथ उन्हें ज़मीन और 100 अंगरक्षक भी मिले थे। यही नहीं, उन्हें नगाड़ा पीटने वालों का एक समूह भी मिली जो नगाड़ा बजाकर उनके आने की पूर्व सूचना दिया करते थे।


18वीं सदी के भारत में किसी महिला को इस तरह का सम्मान मिलना एक बेमिसाल बात थी।

कौन थी ये प्रभावशाली महिला और क्या है उसकी विरासत?

माह लक़ा बाई का जन्म 4 अप्रैल 1768 में हुआ था। उनकी मां राज कुंवर बाई पेशे से नाचने गानेवाली थीं और पिता बहादुर ख़ान मुग़ल अमीर थे। जन्म के समय इनका नाम चंदा बीबी था। दिलचस्प बात ये है कि माह लक़ा के नाना, मुहम्मद शाह रंगीले (1702-1748) के शासन काल में अहमदाबाद में मुग़ल प्रशासक थे। बुरा वक़्त आने पर वह अपनी पत्नी और तीन बेटियों को छोड़कर चले गए थे। हालात की मारी ये महिलाएं घूम घूमकर नाचने-गाने वाले दल में शामिल हो गईं। ये दल राजस्थान और उत्तरी दक्कन के बीच सक्रिय था। इन महिलाओं ने इस दल के साथ नाचना-गाना सीखा, उन्होंने इस दौरान नक़ल उतारने की कला के गुण भी सीखे।

एक बार ये दल जब बुरहानपुर, जो अब मध्य प्रदेश में है, में था तब इसका सामना हैदराबाद के पहले निज़ाम और असफ़ जाही राजवंश के संस्थापक निज़ाम-उल मुल्क (1671 - 1748) की फ़ौज से हो गया। महिलाए फ़ौजियों के मनोरंजन में लग गईं और इस दौरान ख़ासकर राज कुंवर बाई अपनी हुस्न और हुनर की वजह से मशहूर हो गईं। जब तक फ़ौज, उस समय, निज़ाम की राजधानी औरंगाबाद पहुंचती, यह महिलाएं धन-दौलत के साथ मशहूर तवाइफ़ें बन चुकीं थीं।

राज कुंवर बाई तब तक दो बेटियों को जन्म दे चुकी थीं। बाद में क़रीब पचास साल की उम्र में उन्होंने एक अमीर से शादी की और तीसरी बेटी चंदा बीबी उर्फ़ माह लक़ा बाई को जन्म दिया। माह लक़ा बाई की परवरिश राज कुंवर बाई की सौतेली बहन मेहताब कुंवर बाई के घर हुई। मेहताब कुंवर बाई के पति नवाब रुक्न-उद-दौला थे जो हैदराबाद के पहले निज़ाम, निज़ाम अली ख़ान (1734-1803), के वज़ीर-ए-आज़म (प्रधानमंत्री) थे।

ज़ाहिर है ऐसे में माह लक़ा की परवरिश अमीराना माहौल में हुई जहां हर तरह की सहूलियतें मौजूद थीं। यहां उन्हें बेहतरीन उस्ताद उपलब्ध थे और यहीं उनका नयी राजधानी हैदराबाद की संस्कृति से परिचय भी हुआ। यहां माह लक़ा ने न सिर्फ़ साहित्य और शास्त्रीय नृत्य की ट्रेनिंग ली बल्कि तीरंदाज़ी और घुड़सवारी के भी गुण सीखे।

माह लक़ा जैसे ही बाहर निकलकर अपने हुनर का प्रदर्शन करने लगीं, उनका ओजस्वी व्यक्तित्व पुरुषों को आकर्षित करने लगा। अपने जीवनकाल में माह लक़ा दो निज़ामों और तीन प्रधानमंत्रियों की बेहद क़रीबी रहीं। इनके अलावा उनके और भी चाहने वाले थे। लेकिन उनकी ज़िंदगी का सबसे महत्वपूर्ण शख़्स था तानसेन का परपोता और मशहूर संगीतकार ख़ुशहाल ख़ां 'अनूप' जिन्होंने उन्हें संगीत सिखाया था। ख़ुशहाल ख़ां ने माह लक़ा को ब्रज गीत और मुग़ल संगीत से लेकर उत्तर भारत में गाए जाने वाले राग भी सिखाए। माह लक़ा ने ग़ज़ल गायकी और ग़ज़ल लिखना भी उन्हीं से सीखा। उनकी ग़ज़लों में रुमानियत और रहस्यवाद दोनों का मिश्रण दिखता है।

गुल के होने की तवक़्क़ो पे जिये बैठी है

हर कली जान को हथैली पर लिए बैठी है

कभी सय्याद का खटका कभी ख़ौफ़-ए-ख़िज़ां

बुलबुल अब जान हथैली पर लिये बैठी है

तीर-ओ-शमशीर से बढ़कर है तेरी तिरछी निगाह

सैंकड़ों आशिक़ों का ख़ून पिये बैठी है

माह लक़ा ऐसे समय में थीं जब दक्खिनी भाषा पर, जो उर्दू का एक रुप था, फ़ारसीयुक्त उर्दू का असर होने लगा था। दक्षिण भारत में माह लक़ा के साहित्य में इस तरह के भाषाई परिवर्तन की झलक मिलती है। प्रेम, वफ़ादारी, साज़िश और दुश्मनी उनकी कविताओं के विषय हुआ करते थे। कभी-कभी वह दक्कनी शैली के कथक पर अपनी कविताओं का पाठ भी किया करती थीं।

ये कोई हैरत की बात नहीं है कि माह लक़ा इतिहास में पहली महिला शायरा हुई हैं जिनका दीवान (कविता संग्रह) ‘गुलज़ार-ए-माहलक़ा’ प्रकाशित हुआ। ये दीवान 1798 में प्रकाशित हुआ था और इसमें 39 ग़ज़लें हैं जो एक से बढ़कर एक हैं।

गुलज़ार-ए-माहलक़ा
गुलज़ार-ए-माहलक़ा|विकिमीडिया कॉमन्स 

अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रो. स्कॉट कुगले ने माह लक़ा बाई के जीवन और साहित्यक और कलात्मक कार्य का गहरा अध्ययन किया है। 2016 में प्रकाशित अपनी किताब ‘वेन सन मीट्स मून: जेंडर, इरोस, एंड एक्स्टसी इन उर्दू पोएट्री’ में कुगले लिखते हैं कि निज़ाम के प्रधानमंत्री अरस्तु जाह एक राजनीतिक रणनीति के तहत बहुत कम उम्र में ही माह लक़ा को तैयार करने लगे थे ताकि उसे निज़ाम के क़रीब पहुंचाया जा सके।

1795 में निज़ाम मराठा शक्ति के उदय से जूझ रहे थे और खरदा युद्ध में अपने कई क्षेत्र गवां चुके थे। लेकिन अरस्तु की कूटनीति से निज़ाम को उनकी खोए हुए इलाक़े फिर मिल गए। ज़ाहिर है इससे अरस्तु की ताक़त बहुत बढ़ गई। 1780 के मध्य में 15 साल की माह लक़ा अरस्तु की मदद से दूसरे निज़ाम के नज़दीक पहुंचने में कामयाब हो गईं। वह निज़ाम की मृत्यु तक उनकी विश्वासपात्र बनी रहीं और इस दौरान निज़ाम राजपाट के मामले में भी उनकी सलाह लेते रहे। महल में निज़ाम का मनोरंजन करने के अलावा वह उनके साथ शिकार पर भी जाया करती थीं। लेकिन सबसे ज़्यादा दिलचस्प बात ये है कि माह लक़ा ने निज़ाम के साथ तीन जंगों में भी हिस्सा लिया। ये युद्ध उन्होंने पुरुष के लिबास में लड़े थे और भाला चलाने की कला से सबको चकित कर दिया था।

ये वो समय था जब मराठा साम्राज्य तेज़ी से बढ़ रहा था और मराठा तथा निज़ाम के बीच राजनयिक बातचीत का सिलसिला चल रहा था। माह लक़ा जब एक बार राजनयिक यात्रा पर पुणे गईं तो उन्होंने अरबी घोड़ों के बारे में अपने ज्ञान से मराठा मंत्री नाना फणनवीस को हैरान कर दिया था।

1802 में दूसरे निज़ाम के महल में परशिया (अब ईरान) के नये साल के मौक़े पर एक भव्य समारोह हुआ, जिसमें सैनिकों और दरबारियों को तोहफ़े, ख़िताब और अनुदान से सम्मानित किया गया था। सम्मान हासिल करने वालों के बीच, घुटने के नीच तक झूलते काले बालों वाली 34 साल की माह लक़ा भी मौजूद थीं।

 माह लक़ा बाई का चित्र 
माह लक़ा बाई का चित्र |विकिमीडिया कॉमन्स 

इसी समारोह में निज़ाम ने चंदा बीबी को ‘माह लक़ा बाई’ यानी ‘चंद्रमुखी’ के ख़िताब से नवाज़ा था और बहुत बड़ी ज़मीन की जागीरदारी दी थी। इस जागीरदारी की बदौलत माह लक़ा मालामाल हो गईं थीं। जागीरदारी के अलावा उन्हें अंगरक्षक, शाही पालकी और नगाड़ा बजाने वाले भी दिए गए थे।

माह लक़ा की कई कविताओं में निज़ाम की तारीफ़ और उनके प्रति आभार झलकता है।

बसंत आई है मौज-ए-रंग-ए-गुल है जोश-ए-सबा है

ख़ुदा के फ़ज़ल से ऐश-ओ-तरब की अब कमी क्या है

बयां मैं क्या करूं उसके शबिस्तां का ताअला-अल्लाह

क़ज़ा-ओ-क़द्र जिस के जश्न का अब कार-फ़रमा है

1803 में दूसरे निज़ाम और 1804 में उनके प्रधानमंत्री अरस्तु जाह के निधन के बाद माह लक़ा को नये निज़ाम सिकंदर जाह और उनके प्रधानमंत्री मीर आलम की सरपरस्ती मिल गई। दरअसल मीर आलम पहले से ही माह लक़ा के मुरीद थे। 1799 में उनकी एक मजलिस में माह लक़ा की मुलाक़ात सर जॉन मैल्कम से हुई थी जो हैदराबाद में असिस्टेंट ब्रिटिश रेसिडेंट थे। इसी मुलाक़ात में माह लक़ा ने उन्हें अपने दीवान की एक कॉपी तोहफ़े में दी थी। आज दीवान की वो कॉपी ब्रिटिश पुस्तकालय के भारतीय दफ़्तर में रखी है। मीर आलम हैदराबाद के नवाब सलारजंग के वंशज थे और दिलचस्प बात ये है कि सलारजंग अपने संग्रहालय में कलात्मक चीज़ें का संग्रह करते थे। आज हैदराबाद में इसे सलारजंग संग्रहालय के नाम से जाना जाता है।

माह लक़ा के बारे में एक और दिलचस्प बात का पता चलता है और वो ये है कि उन्हें हंसने-हंसाने का भी बहुत शौक़ था यानी उनमें हास्यवृत्ति ग़ज़ब का था। एक बार वह कहीं जा रही थीं तभी उनकी गाड़ी से एक छोटे डिब्बे में रखे नींबू नीचे गिर गए। इसे देखकर किसी ने कहा बाई की गाड़ी से एक ‘अंडा’ नीचे गिर गया। माह ने तुरंत जवाब दिया, ‘अरे वाह, नीचे गिरते ही चूज़ा चहकने लगा!’

हैदराबाद में माह लक़ा के कितने ख़ास लोगों से किस हद तक संबंध थे, ये तो पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता लेकिन एक व्यक्ति था जिससे उन्हें प्रेम था। इसका नाम था राजा राव रंभा जयवंत बहादुर। राजा राव सेनापति थे जिन्होंने 1790 में दूसरे निज़ाम की ओर से मराठा साम्राज्य के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ी थी और टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ निज़ाम और अंग्रेज़ सेना का साथ दिया था। वह माह लक़ा के शुरुआती संरक्षकों में से एक थे और दोनों को घोड़ों में दिलचस्पी थी। माह लक़ा अक्सर उन्हें बेहतरीन नस्ल के घोड़े भेंट किया करती थीं।

माह लक़ा बाई और राजा राव रंभा जयवंत बहादुर
माह लक़ा बाई और राजा राव रंभा जयवंत बहादुर|विकिमीडिया कॉमन्स 

हैदराबाद के महल में कई महत्वपूर्ण राजनीतिक फ़ैसलों को प्रभावित करने वाली इस तवाइफ़ ने नेक ज़िंदगी भी जी। उनकी लगभग हर ग़ज़ल के आख़िरी शेर शिया मत के पहले अमीर और उनके आध्यात्मिक गुरु अली को समर्पित हैं। वह पैग़ंबर मोहम्मद के दामाद मौला अली की दरगाह को दिल खोलकर दान करती थीं।

समाज में माह लक़ा का योगदान सिर्फ़ उनकी साहित्यिक उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने सीढ़ी वाले कुएं, मस्जिदें और बाग़ीचे जैसी चीज़े भी बनवाई। उन्होंने एक पुस्तकालय भी बनवाई थी जिसमें कला और विज्ञान विषय पर किताबें थीं। उनहोंने कविता और लेखन की अन्य विधाओं को भी बढ़ावा दिया। इसमें महानामा भी शामिल है जो दक्कन का इतिहास है।

माह लक़ा की हवेली हस्सा रंग महल आज भी हैदराबाद के नामपल्ली में मौजूद है। यहां उन्होंने सैकड़ों तवाइफ़ों को ट्रेनिंग दी थी। भारत को आज़ादी मिले के बाद हैदराबाद में आख़िरी निज़ाम के शासन की समाप्ति के बाद इस हवेली को स्कूल में तब्दील कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि अंतिम समय में माह लक़ा ने अपनी वसीयत में ज़मीनें, सोना, चांदी और हीरे के ज़ेवरात सहित अपनी सारी संपत्ति बेघर महिलाओं के नाम कर दी थी।

माह लक़ा का मक़बरा
माह लक़ा का मक़बरा |विकिमीडिया कॉमन्स 

माह लक़ा का निधन 1824 में हो गया था। उनका मक़बरा हैदराबाद में मौला अली पहाड़ी के नीचे आज भी मौजूद है। उन्होंने ऐसे समय और ऐसे धार्मिक सामाजिक पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है जिसमें महिलाओं को पर्दे के बाहर झांकने तक की आज़ादी नहीं थी।

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