एनफ़ील्ड मस्कट 1853 – एक ऐतिहासिक हथियार 

एनफ़ील्ड मस्कट 1853 – एक ऐतिहासिक हथियार 

ये कहानी है एक ऐसे हथियार की जिसने पूरे उप-महाद्वीप की नियति बदलकर रखी दी. ऐसा हथियार जिसके दम पर 19वीं शताब्दी का सबसे बड़ा विद्रोह हुआ, वो हथियार जिसने विश्व की पहली बहुराष्ट्रीय कंपनी पर ताला लगवा दिया, एक ऐसा हथियार जिसने आधुनिक विश्व के सबसे बड़े साम्राज का अंत कर दिया। ये कहानी है ‘1853 एनफ़ील्ड मस्कट’ की है। इसे सबसे पहले 1855 में सशस्त्र सेना ने इस्तेमाल किया था और दो साल बाद यानी सन 1857 में भारत में भी इसका इस्तेमाल हुआ।

स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले लाखों छात्रों को उनके शिक्षकों और किताबों के ज़रिये ये बताया गया है कि सन 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के भारतीय सिपाहियों ने विद्रोह इसलिये किया था क्योंकि नयी बंदूक़ों में इस्तेमाल किये जाने वाले कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का उपयोग होता था। सिपाहियों को गोली दाग़ने के पहले गोली को‘मुंह से काटना’ होता था। हिंदुओं और मुसलमानों के लिये ऐसा करना नामुमकिन था क्योंकि हिंदुओं के लिये जहां गाय पवित्र थी, वहीं मुसलमान सूअर को एक अपवित्र जानवर मानते थे जिसे खाना इस्लाम में हराम है। इस तरह से दोनों के लिये ये इस तरह से गोली दाग़ना, उनके धर्म के ख़िलाफ़ था।
बहरहाल छात्र अक्सर ये सवाल करते हैं कि गोली चलाने के पहले उसे मुंह से काटना क्यों ज़रुरी था। इस सवाल का जवाब किताबों में नहीं मिलता। सवाल ये भी था कि कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी क्यों मिलाई गई थी? इस सवाल का जवाब जंगी हथियार बनाने की आधुनिक तकनीक में मिलता है।

कारतूस

17वी, 8वीं और 19वीं शताब्दी में भारत का मतलब ईस्ट कंपनी होता था। देश पर नियंत्रण ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड के सदसयों का हुआ करता था। 18वीं और 19वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी सबसे शक्तिशाली कंपनी थी जिसकी स्थापना सन 1600 में हुई थी। इस कंपनी को किसी भी देश के ख़िलाफ़ युद्ध करने का विशेषाधिकार प्राप्त था। और आगे चलकर इस विशेषाधिकार की वजह से कंपनी ने भारत पर सख़्ती से शासन किया। कंपनी की तीन सेनाएं थीं। कंपीने ने भारत को तीन सूबों में बांट रखा था- बॉम्बे, मद्रास और बंगाल। कंपनी अपनी शक्ति की पराकाष्ठा पर थी तब उसकी सेना में दो लाख साठ हज़ार सैनिक थे जिन्हें सिपाही कहा जाता था। उन्हें कंपनी ने ब्रिटेन में बने हथियारों से लैस कर दिया था।

एनफ़ील्ड मस्कट 1853 रायफ़ल को पैटर्न 1853 भी कहा जाता था। सन 1853 एनफ़ील्ड या रायफ़ल्ड-मस्कट ऐसे समय बनाई गई थी जब हथियार बनाने की तकनीक अपने चरम पर थी। इसका निर्माण अंग्रेज़ सेना के ख़ुद के आयुद्ध कारख़ाने में हुआ था जिसे इंग्लैंड में एनफ़ील्ड आर्म्स कंपनी कहा जाता था। इस कारख़ानें में ऐसी 15 लाख बंदूकें बनाई गईं थी। इनका इस्तेमाल अंग्रेज़ों और दूसरी सेनाओं ने पूरे विश्व में किया। इस रायफ़ल की नली एक मीटर लंबी होती थी और इसमें तीन बेंड होते थे। इसमें गोली, नली के मुंह से डाली जाती थी। ये 577 बोर बंदूक़ थी जिसमें छोटी लेड-बॉल और काले पाउडर का इस्तेमाल किया जाता था। इसके पहले मस्कट बंदूक़ों में जानवरों के सींग से बने पाउडर का इस्तेमाल किया जाता था। इसके बाद उस लेड-बॉल को हटा दिया गया जिसमें बारुद भरा जाता था। इसकी जगह नली के नींचे लोहे की एक सलाख़ लगा दी गई। पाउडर और बॉल को रखने के लिये एक कपड़ा कसकर बांध दिया गया। बंदूक़धारी इसके बाद हैमर पर चोट करके घोड़ा दबा देता था और गोली चल जाती थी। लेकिन ये काम जटिल था और इसमें समय भी बहुत लगता था। इस समस्या से निपटने के लिये मस्कट की गोली को एक काग़ज में लपेटा गया और उसे बेलनाकार कारतूस का रुप दिया गया। बंदूक़ में गोली भरने के लिये सिपाही कारतूस बाहर निकालकर गोली को मुंह से काटकर काग़ज़ में लपेटकर बंदूक के उंदर डाल देता था। मिनी गोली या बॉल का बंदूक़ में अच्छी तरह से फिट होना ज़रुरी था इसलिये चिकनाई की ज़रुरत होती थी। मिनी गोली को उसकी जगह रखने के लिये काग़ज़ पर तेल लगाया जाता था जो गाय और सूअर की चर्बी को मिलाकर बनाया जाता था। जिसका इस्तेमाल यूरोप में बहुत होता था क्योंकि ईसाई धर्म में गाय या सूउर का मांस वर्जित नहीं था। गोली चलाने की ये प्रक्रिया कहीं ज़्यादा तेज़ और आसान थी। इस प्रक्रिया की वजह से एक सिपाही एक मिनट में पांच से छह गोली दाग़ सकता था जो उससे पहले तक संभव नहीं था।

विद्रोही | विकिमीडिया कॉमन्स

दुर्भाग्य से अंग्रेज़ ने भारतीय सिपाहियों की आस्था को नज़रअंदाज़ दिया । कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी की अफ़वाह फैलते ही सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया। दरअसल विद्रोह की वजह सिर्फ़ यही नहीं थी। हालांकि ,सिपाहियों ने कारतूस का इस्तेमाल करने से इनकार किया था । इसके लिये उन्हें गिरफ़्तार भी किया गया लेकिन इसके पहले से ही सिपाहियों में असंतोष फैल रहा था जो 1857 के ग़दर के रूप में फूट पड़ा।

लखनऊ में रेडान बैटरी पर हमला करने वाले म्यूटेंट | विकिमीडिया कॉमन्स

ग़दर का ये नतीजा निकला कि ब्रटिश सम्राट ने सत्ता की बागडोर ख़ुद अपने हाथों में ले ली और महारानी की तरफ़ से इसक तरह की घोषणा, एक नवंबर सन 1885 में सारे देश में की गई। ब्रटिश राजशाही ने ईस्ट इंडिया कंपनी, उसकी सारी संपत्ति और सेना को अपने हाथों में ले लिया। इस तरह सन 1874 तक ईस्ट इंडिया कंपनी पूरी तरह ख़त्म हो गई। भारतीय सिपाहियों के असंतोष को दबाने के लिये नयी रायफ़ल पैटर्न सन 1858 लाई गई जो 0.656 बोर की थी। साथ ही यह भी आश्वासन दिया गया कि कारतूस में गाय या सूअर की चर्बी नहीं इस्तेमाल की जायेगी ।

ब्रिटिश रानी की उद्घोषणा, 1 नवंबर 1858  | विकिमीडिया कॉमन्स

1947 में अंग्रेज़ों के भारत छोड़ने तक यानी लगभग 90 साल तक, सन 1857 के ग़दर की चर्चायें होती रहीं। कंपनी के ख़त्म होने के बाद, ये ग़दर अंग्रेज़ साम्राज पर पहला कुठराघात था। इस तरह से अंग्रेज़ साम्राज में आख़िरकार सूर्य अस्त हो ही गया जिसकी एक बड़ी वजह थी 1853 एनफ़ील्ड मस्कट रायफ़ल।

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