वी.ओ. सी. पिल्लई: जिन्होंने स्वदेशी जहाज़ चलाये 

वी.ओ. सी. पिल्लई: जिन्होंने स्वदेशी जहाज़ चलाये 

“इस कंपनी का उद्देश्य सिर्फ़ लाभ कमाना नहीं है। ये जहाज़ अंग्रेज़ों को उनका बोरिया बिस्तर लपेटकर देश छोड़ने में मदद करंगे।”

ये शब्द वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई ने तब बोले थे जब वह एक भाषण के दौरान अपनी स्वदेशी शिपिंग कंपनी के उद्देश्य गिना रहे थे। पेशे से वकील चिदंबरम ने स्वदेशी स्टीम नेवीगेशन कंपनी (SSNC) शुरु की थी। ये कंपनी 20वीं शताब्दी के आरंभ में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शुरु होने वाली शिपिंग कंपनियों में से एक थी। ये कंपनी अंग्रेज़ों की शिपिंग कंपनियों और समुद्री व्यापार पर उनके एकाधिकार को सीधे टक्कर दे रही थी। चिदंबरम के इस क़दम से न सिर्फ़ स्वेशी आंदोलन को मदद मिली बल्कि इस ने अंग्रेज़ी सरकीर के ख़िलाफ़ चल रहे देशव्यापी आंदोलन को भी ताक़त दी।

17वीं शताब्दी के ख़त्म होते होते इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम ने एक शाही फ़रमान जारी कर कुछ अंग्रेज़ व्यापारियों को एशिया में समुद्री व्यापार की इजाज़त दे दी थी। इस तरह एशिया के समुद्री व्यापार पर उनका एकाधिकार हो गया था। ये समुद्री और भू-व्यापार मार्ग केप ऑफ़ गुड होप से लेकर दक्षिण चीन समुद्र तक फैला हुआ था। इसमें भारतीय उप-महाद्वीप भी शामिल था। इस तरह इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी का जन्म हुआ जो 18वीं शताब्दी के अंत में अंग्रेज़ साम्राज्य का पर्याय बन गई। अंग्रेज़ों के पहले से यहां पुर्तगाल और डच निवासी व्यापार कर रहे थे। शाही फ़रमान का मतलब था कि इसमें उल्लेखित भू-भाग और समुद्री मार्ग पर इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अलावा कोई और व्यक्ति अथवा कंपनी व्यापार नहीं कर सकती थी। अगले कुछ वर्षों में कंपनी का आधे विश्व व्यापार, ख़ासकर कपास, रेशम, नील, नमक, मसालों, शोरा, चाय और अफ़ीम पर कब्ज़ा हो गया। इंग्लिश ईस्ट इंडिया कंपनी का शिपिंग सेवाओं पर भी नियंत्रण था।

ईस्ट इंडिया कंपनी के बंदरगाह  | विकिमीडिआ कॉमन्स 

19वीं शताब्दी के अंत से लेकर 1900 के दशक के आरंभिक वर्षों के दौरान तक भारत का स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगे थे। विदेशी सामानों का बहिष्कार और स्वदेशी सामानों को बढ़ावा देना- स्वदेशी आंदोलन इन दो मज़बूत खम्बों पर टिका था। इस आंदोलन का नेतृत्व अरबिंदो घोष, लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल और लाला लाजपत राय जैसे नेता कर रहे थे। इन नेताओं ने भारतीय जनता से अदालत, स्कूल और कॉलेज तथा विदेशी सामानों सहित अंग्रेज़ सरकार की सेवाओं का बहिष्कार करने का आव्हान किया। वे राष्ट्रीय स्कूल और कॉलेज की स्थापित करके स्वदेशी सामान और शिक्षा को बढ़ावा देना चाहते थे। सन 1905 में बंगाल के विभाजन से लोगों का अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा फूट पड़ा। इस रोष को तूतीकोरिन (उस समय तमिलनाडु का एक ज़िला) में चिदंबरम ने हवा दी।

चिदंबरम के स्वदेश उद्यम के केंद्र में था तूतीकोरिन बंदरगाह शहर जिसे अब तमिलनाडू में तूतुकुड़ी कहा जाता है। तूतीकोरिन तमिलनाडू के समुद्री प्रवेश-द्वार के रुप में जाना जाता था जहां मछली और सीपियों से मोती निकाले जाते थे और जहां जहाज़ बनाने के उद्योग लगे हुए थे। तूतुकुड़ी ज़िले का कोरकई बंदरगाह पहले पंड्या राजवंश की राजधानी हुआ करता था। 7वीं और 9वीं शताब्दी के दौरान तूतीकोरिन पंड्या साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण शहर था।

9वीं और 12वीं शताब्दी के दौरान चोल साम्राज्य के लिये भी इसका बहुत महत्व था। बहुत जल्द तूतीकोरिन बंदरगाह समुद्री व्यापार का केंद्र बन गया जहां यात्री, सैलानी और फिर अंतत: उपनिवेशवासी आने लगे। 16वी शताब्दी में यहां सबसे पहले पुर्तगाली आए। उनके बाद 17वीं शताब्दी में डच लोग आए। आख़िरकार 18वीं शताब्दी में तूतीकोरिन पर अंग्रेज़ों का नियंत्रण हो गया। सन 1825 के लगभग ईस्ट इंडिया कंपनी ने तूतीकोरिन का प्रशासन अपने हाथ में ले लिया।

1752 में तूतुकुड़ी में डच बंदरगाह का दृश्य | विकिमीडिआ कॉमन्स 

तूतीकोरिन के व्यापारी सीलोन (श्रीलंका) के साथ व्यापार करते थे। लेकिन यात्री जहाज़ और मालवाहक सेवाओं पर ब्रिटिश इंडियन स्टीम नेवीगेशन कंपनी लिमिटेड (BISNCo) जैसी यूरोपीय शिपिंग कंपनियों का एकाधिकार था। सन 1856 में स्थापित ब्रिटिश इंडियन स्टीम नेवीगेशन कंपनी लिमिटेड की तूतीकोरिन और कोलंबो के बीच नियमित सेवाएं थीं।

चिदंबरम का, तूतीकोरन से संबंध, उनके छात्र जीवन से सुरू हो गया था। वीओसी नाम से प्रसिद्ध चिदंबरम पिल्लई का जन्म पांच अक्टूबर सन 1872 में तमिलनाडु के तिरुनेल्वेली ज़िले के ओट्टापिडारम में हुआ था। अपनी पढ़ाई के लिए वे तूतीकोरिन आ गए जहाँ उन्होंने काल्डवेल हाई स्कूल से मैट्रिक परीक्षा पास की। चिदंबरम के दादा और पिता (ओलगनाथम पिल्लई) वकील थे। यही वजह है कि चिदंबरम का भी रुझान इस विषय और पेशे की तरफ़ हो गया और उन्होंने क़ानून की पढ़ाई की। वकालत के शुरुआती दिनों के फ़ौरन बाद उनके पिता ने उन्हें तूतीकोरिन जाकर वहां वकालत करने का सुझाव दिया। सुझाव के अनुसार चिदंबरम अगस्त सन 1900 में तूतीकोरिन आ गए। ये उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था और यहीं से उन्होंने जीवन में वो किया जिसके लिये वह जाने जाते हैं।

बंगाल के विभाजन और स्वदेशी आंदोलन के बाद चिदंबरम भी राजनीति में सक्रिय हो गये और इस आंदोलन के अग्रज नेताओं में उनका शुमार होने लगा। कहा जाता है कि बाल गंगाधर तिलक उनके गुरु थे और वह स्वदेशी भावना में पूरी तरह रचबस गए।

बाल गंगाधर तिलक  | विकिमीडिआ कॉमन्स 

इस समय तूतीकोरिन और कोलंबो के बीच समुद्र मार्ग से व्यापार ख़ूब फलफूल रहा था और इस पर ब्रिटिश इंडियन स्टीम नेवीगेशन कंपनी लिमिटेड का पूरा एकाधिकार था। तूतीकोरिन में कुछ व्यापारियों ने देशी शिपिंग कंपनी शुरु करनी चाही। “बिल्डर्स ऑफ़ मॉडर्न इंडिया,वीओ चिदंबरम पिल्लै (1992)” के लेखक आर. एन. संपत और पे.सू. मणि ने तीन अक्टूबर सन 1906 के सरकारी आदेश का उल्लेख किया है जिसमें लिखा था-“अप्रैल में तूतीकोरिन के कुछ व्यापारी तूतीकोरिन और कोलंबो के बीच स्वदेशी स्टीमर चलाने का सोच रहे हैं।”

चिदंबरम को विश्वास था कि स्वदेशी शिपिंग कंपनी शुरु करने से विदेशियों के व्यापार पर अच्छी ख़ासी रोक लगेगी। इन विदेशी व्यापारियों को विदेशी प्रशासन का समर्थन प्राप्त था। इस तरह 16 अक्टूबर सन 1906 को स्वदेशी स्टीम नेवीगेशन कंपनी की शुरुआत हुई। कंपनी के लिये 40 हज़ार शेयर जारी कर दस लाख रुपये जमा किए गए। प्रत्येक शेयर का मूल्य 25 रुपये था। इस उद्यम को तिरुनेल्वेली, मदुरई और तमिलनाडु के अन्य शहरों से काफ़ी वित्तीय समर्थन मिला।

शुरु से इस कंपनी को एक बड़ा रुप देने की योजना थी। इसकी सेवा तूतीकोरिन और कोलंबो के बीच ही सीमित नहीं होनी थी। इसके लिये चिदंबरम को बहुत संघर्ष करना पड़ा। कहा जाता है कि उन्होंने इस उद्यम के लिये धन एकत्र करने के उद्देश्य से भारत के सभी शहरों का दौरा किया था। इस काम में उनका बाल गंगाधर तिलक और अरबिंदो घोष जैसे स्वदेशी नेताओं ने साथ दिया। इनके अलावा सुब्रह्मण्यम भारती (तमिल कवि) और सुब्रमण्य शिवा (सामाजिक कार्यकर्ता) ने भी बहुत मदद की। इन दोनों से उनकी मुलाक़ात राजनितिक गतिविधियों के दौरान हुई थी।

शुरुआत में कंपनी के पास ख़ुद के कोई जहाज़ नहीं थे। कंपनी ने पट्टे पर जहाज़ ले रखे थे। दूसरी तरफ़ ये बात ब्रिटिश कंपनी को भी नागवार गुज़र रही थी और उसे इससे ख़तरा मेहसूस हो रहा था। उसने बंबई की कंपनी एस्साजी दोदजीभाई कंपनी के मालिकों पर जहाज़ तूतीकोरिन कंपनी को पट्टे पर न देने और जहाज़ वापस लेने का ज़ोर डाला। चिदंबरम ने इसके बाद श्रीलंका से एक बड़ा मालवाहक पोत पट्टे पर लिया। इसके बाद उन्होंने कंपनी के लिये दो जहाज़ ख़रीदे।

1890 के दशक में तूतीकोरिन पोर्ट | विकिमीडिआ कॉमन्स 

फ़्रांस से ख़रीदे गए दो जहाज़ एस.एस. गलेओ और एस.एस. लावो मई सन 1907 में अलग अलग समय पर तूतीकोरिन बंदरगाह पर पहुंचे । ये पूरे देश के लिये बड़े गर्व की बात थी और देश भर में चिदंबरम की सराहना हुई। पहला जहाज़ एस.एस गलेओ बाल गंगाधर तिलक और अरबिंदो घोष की मदद से ख़रीदा गया था। कहा जाता है कि ये जहाज़ तूतीकोरिन और कोलंबो के बीच चलता था और इसमें एक बार में 1300 यात्री तथा सामान के 40 हज़ार बैग का जहाज़ी माल जा सकते थे। जहाज़ पर एक झंडा लहराता था जिस पर वंदे मातरम लिखा होता था।

लेकिन स्वदेशी स्टीमर नेवीगेशन कंपनी की सफलता अधिक दिनों तक नहीं टिक पाई। चिदंबरम को इस कारोबार से बेदख़ल करने के लिये ब्रिटिश कंपनी ने अपना किराया बहुत कम कर दिया। कहा जाता है कि अंग्रेज़ कंपनी ने किराया घटाकर प्रति व्यक्ति प्रति यात्रा एक रुपये (16 आना) कर दिया था। जवाब में स्वदेशी कंपनी ने भी किराया कम कर प्रति व्यक्ति प्रति यात्रा 0.5 रुपये (आठ आना) कर दिया। लेकिन ब्रिटिश कंपनी कब पीछे हटने वाली थी, उसने यात्रा मुफ़्त ही कर दी।

लेकिन सब कुछ यही ख़त्म नहीं हुआ। सन 1908 में चिदंबरम पर देशद्रोह का मुक़दमा चला और उन्हें दो आजन्म कारावास (40 साल) की सज़ा मिली। इसके पहले चिदंबरम और शिवा तूतीकोरिन कोरल मिल की हड़ताल में शामिल हुये थे। उन्होंने कारख़ानों के कर्मचारियों को काम करने की ख़राब स्थिति और कम वेतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिये प्रेरित किया था। कुछ ही दिनों के बाद इन दोनों नेताओं के नेतृत्व में कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। इसके नतीजे में चिदंबरम, शिवा और अन्य राष्ट्रवादी नेताओं को ज़िले की जेल में डाल दिया गया। अगले कुछ दिनों में तूतीकोरिन में दंगे भड़क गए जिनमें चार लोगों की मौत हो गई। इसके लिये चिदंबरम के नैतिक रुप से ज़िम्मेवार ठहराया गया। जेल में उनके साथ बहुत ख़राब बर्ताव किया गया। कहा जाता है कि उन्हें कोल्हू के बैल की जगह इस्तेमाल किया गया था, वो भी चिलचिलाती धूप में।

मकबरे के गलियारे

इस बीच, कंपनी को बहुत नुक़सान पहुंचा। सन 1911 में स्वदेशी स्टीम नेवीगेशन कंपनी को भंग कर इसे उसके प्रतियोगियों को बेच दिया गया। एक जहाज़ तो उसी ब्रिटिश कंपनी को बेचा गया जो इसकी प्रतिद्वंदी थी।

चिदंबरम सन 1912 में रिहा हो गए लेकिन इसके बाद वो कुछ ख़ास नहीं कर पाए। कारोबार ख़त्म होने के बाद उनके पास कुछ नहीं बचा था। वकालत का उनका लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया था और उन्हें तिरुनेल्वेली ज़िले में उनके पैतृक शहर में भी रहने की इजाज़त नहीं थी। इसलिये वह मद्रास (चैन्नई) चले गए। इस बीच महात्मा गांधी का राजनीति में तेज़ी से उदय हो रहा था। सन 1915 में जब गांधी जी मद्रास आए तो चिदंबरम ने उनसे मिलने का समय मांगा। चिदंबरम को दक्षिण अफ़्रीका से उनके एक परिचित से 347 रुपये मिलेने थे और उसी के बारे में उनका गांधी जी के साथ लंबा पत्राचार हुआ था।

चिदंबरम के आख़िरी कुछ साल अच्छे नहीं गुज़रे थे। उनकी ख़राब माली हालत के बारे में सुनने के बाद उन्हें जेल भेजने वाले जस्टिस वैलेस ने उनका वकालत का लाइसेंस बहाल कर दिया। तब तक वैलेस मद्रास सूबे के चीफ़ जस्टिस बन चुके थे। इसके बाद चिदंबरम तूतुकुड़ी में कोविलपट्टी जाकर वहां वकालत करने लगे। चिदंबरम एक बड़े तमिल विद्वान भी थे। उन्होंने अपना ज़िंदगी के बाक़ी के साल में जीवन-यापन करने के लिये तमिल में किताबे लिखीं। इस बीच वह बीमार पड़ गए और 18 नवंबर सन 1936 में उनका निधन हो गया।

चिदंबरम का एक स्टाम्प  | विकिमीडिआ कॉमन्स 

हालंकि स्वदेशी स्टीम नेवीगेशन कंपनी ने भारत के समुद्री इतिहास में एक छाप छोड़ी लेकिन ये पहली स्वदेशी जहाज़ कंपनी नहीं थी। जुलाई सन 1905 में चट्टगांव के मुस्लिम व्यापारियों और जंमींदारों ने बंगाल स्टीम नेवीगेशन कंपनी बनाई थी जिस पर एक लाख रुपये की पूंजी लगी थी। इसी तरह सन 1905 और सन 1930 के दौरान और भी कई स्वदेशी जहाज़ कंपनियां सामने आईं थीं।

वी.ओ. चिदंबरम पोर्ट ट्रस्ट | विकिमीडिआ कॉमन्स 

वीओसी को एक महत्वपूर्ण भारतीय स्वतंत्रता सैनानी, ख़ासकर स्वदेशी आंदोलन के नेता के रुप में याद किया जाता है। उनकी समुद्री विरासत आज भी ज़िन्दा है। आज उनके सम्मान में तूतुकुड़ी में उनके नाम का एक कॉलेज वी.ओ. चिदंबरम कॉलेज भी है। वी.ओ. चिदंबरम पोर्ट ट्रस्ट (पूर्व में तूतीकोरिन पोर्ट ट्रस्ट) का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है। ये भारत के 13 महत्वपूर्ण बंदरगाहों में से एक है। उनके मतवपूर्ण योगदान के लिए उन्हें कप्पलोतिया तमीज़ान (तमिल जिसने जहाज को चलाया) के नाम से आज भी याद किया जाता है।

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