अंग्रेज़ों के  ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाली कित्तूर की रानी चेनम्मा

अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत करने वाली कित्तूर की रानी चेनम्मा

23 अक्टूबर सन 1824 को अंगरेज़ सेना ने बेलगाम (कर्नाटक) के पास कित्तूर के क़िले पर हमला किया। हमले का जवाब घोड़े पर सवार कित्तूर की रानी चेनम्मा दे रही थीं। हम सब अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ जंग में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी के बारे में जानते हैं लेकिन क्या आपको पता है कि रानी चेनम्मा उन पहली महिला शासकों में से थीं जिन्होंने अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला था। हम यहां आपको बताने जा रहे हैं एक छोटे से शहर कित्तूर की एक बहादुर यौद्धा के बारे में जिन्होंने अपना साम्राज्य बचाने के लिये अंगरेज़ों से जमकर लोहा लिया था।

लेकिन इसके पहले कि हम आपको उनकी कहानी बताएं, पहले कित्तूर के राजनीतिक इतिहास को समझ लिया जाये। कित्तूर कर्नाटक के बेलगाम ज़िले की एक छोटी सी तहसील है। रानी चेनम्मा जिन्हें कित्तूर चेनम्मा भी कहा जाता है, की वजह से ही इतिहास में कित्तूर को याद किया जाता है। कित्तूर राजवंश की शुरुआत सन 1585 में हुई थी। इसकी स्थापना मैसूर में सागर शहर के दो भाईयों हिरे मल्लशेट्टी और चिक्का मल्लशेट्टी ने की थी। उन्हें कित्तूर, बीजापुर के आदिल शाही शासकों से तोहफ़े में मिला था। दोनों भाइयों ने आदिल शाही शासकों की वर्षों तक सेवा की थी।

शिवलिंग की पूजा करते हुए श्री राम और सीता का चित्र

पांचवें शासक अलप्पागौडा सरदेसाई (1660-1691) के शासनकाल में कित्तूर परिवार सन 1682 में अपनी राजधानी संपागांव से (उनकी राजधानी जो अब बेलगांव ज़िले में है) कित्तूर आ गया था। उस समय इस जगह को गिजगना हल्ली (बुनकर पक्षी गांव) कहा जाता था। अलप्पागौड़ा सरदेसाई के शासनकाल में ही कित्तूर क़िला बना था जो बाद में अंगरेज़ो के ख़िलाफ़ लड़ाई का केंद्र बना।

कित्तूर राजवंश के शासनकाल में समृद्धी और शांति थी। छठे शासक मुडिमलप्पागौडा सरदेसाई (1691-1696) के शासनकाल के दौरान मुग़ल बादशाह औरंगज़ैब ने आदिल शाही को हराकर बीजापुर पर कब्ज़ा कर लिया। औरंगज़ैब ने क्षेत्र के सूबादार रऊफ़ ख़ान को सवनूर का नवाब नियुक्त कर दिया। इस क्षेत्र में कित्तूर इलाक़ा भी आता था।

लेकिन सन 1746 में सवनूर के नवाब के हाथों कित्तूर और कुछ अन्य क्षेत्र निकलकर मराठों के हाथों में चले गए और कित्तूर राजवंश सवनूर के नवाब को छोड़कर पूना (पुणे) के पेशवाओं का वफ़ादार बन गया।

सन 1782 में राजा मलसरजा राजगद्दी पर बैठा। कित्तूर राजवंश के तमाम शासकों में मलसरजा सबसे शक्तिशाली और सफल शासक था।

कित्तूर के इतिहास में उसका शासनकाल उठापटक वाला था। उसके समय पेशवा और मैसूर के हैदर अली के बीच लगातार लड़ाईयां होती रहती थीं और इसमें कित्तूर जैसी छोटी रियासत पिसती रहती थी। सन 1778 में मैसूर के हैदर अली ने बेलगाम ज़िले के मलप्रभा नदी वाले सारे दक्षिणी और बीजापुर ज़िले के गोदावरी नदी के भी सारे दक्षिणी क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया। हैदर अली नियमित शुल्क के बदले कित्तूर राजवंश का शासन जारी रखने पर सहमत हो गया। लेकिन सन 1785 में हैदर अली के पुत्र और मैसूर के सुल्तान टीपू ने धारवाड़ में कित्तूर, नारगुंड और रामदुर्ग पर कब्ज़ा कर कित्तूर में सेना का एक शक्तिशाली जत्था तैनात कर दिया।

बाद में फरवरी सन 1792 में श्रीरंगपट्टनम संधि के तहत कित्तूर की ज़मीन एक बार फिर मराठा साम्राज्य का हिस्सा बन गई। संघि के पहले इस ज़मीन पर टीपू सुल्तान का कब्ज़ा था। संधि के तहत पेशवाओं ने अंगरेज़ों का आधिपत्य स्वीकार्य कर लिया और पेशवाओं की देखा-देखी कित्तूर भी अंगरेज़ों का वफ़ादार हो गया।

रानी चेनम्मा, राजा मलसरजा की दूसरी पत्नी थीं। उनकी पहली पत्नी का नाम रानी रुद्राम्मा था। चेनम्मा का जन्म बेलगाम ज़िले के ककाती गांव में सन 1778 में हुआ था। वह लिंगायत समुदाय की थीं और उनकी पैदाइश देसाई परिवार में हुई थी। कहा जाता है कि बचपन से ही उन्हें घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और तीरंदाज़ी की ट्रेनिंग मिली। मलसरजा राजनीतिक और सैन्य समर्थन जुटाने देसाई और दक्कन के प्रमुखों से मिलने आये थे और तभी उनकी मुलाक़ात चेनम्मा से हुई थी।

रानी चेन्नम्मा की मूर्ती   | विकिमीडिआ कॉमन्स  

सदाशिव वोडेयार अपनी किताब “रानी चेनम्मा-1977 ” में लिखते हैं कि उस समय चेनम्मा 22 साल की थीं और मलसरजा से जल्द विवाह होने के बाद वह रानी बन गईं। चेनम्मा शासन कला और प्रशासन में बहुत दिलचस्पी लेती थीं। वह अभियानों और युद्धों में मलसरजा के साथ होती थीं। ये वो समय था जब मराठा और अंगरेज़ों के बीच लड़ाई की वजह से कित्तूर का प्रशासन प्रभावित हो रहा था। जब भी सरकारी मामलों पर चर्चा होती, रानी चेनम्मा मलसरजा के साथ दरबार में बैठती थीं। कहा जाता है कि टीपू सुल्तान के ख़िलाफ़ दशनूर के युद्ध में भी रानी चेनम्मा ने हिस्सा लिया था।

मलसरजा के शासनकाल में कित्तूर बहुत फूलाफला। सदाशिव वोडेयार ने अपनी किताब में लिखा है कि मलसरजा के शासनकाल में चार लाख रुपये का सालाना राजस्व प्राप्त होता था और उनके पास एक हज़ार घुड़सवारों तथा चार हज़ार पैदल सैनिकों की फ़ौज थी। वह पेशवाओं को मुआवज़े के रुप में 70 हज़ार रुपये सालाना दिया करते थे। कित्तूर को आंतरिक और प्रशासनिक मामलों में पूरी आज़ादी थी।

लेकिन कित्तूर की बढ़ती संपन्नता और शक्ति से पेशवाओं को ख़तरा महसूस होने लगा था। इसीलिये सन 1804 में पेशवाओं ने अंगरेज़ जनरल लार्ड वेलैसली से कित्तूर के राजा को हटाने और रियासत से बेदख़ल करने का आग्रह भी किया लेकिन जनरल ने इसे ठुकरा दिया।

हर तरह की मदद और वफ़ादारी के बावजूद पेशवाओं ने छल से मलसरजा को हिरासत में लेकर लंबे समय तक पूना में बंदी बनाकर रखा। सन 1816 में बीमार मलसरजा जेल से वापसी के बाद जल्द ही उनकी मृत्यु हो गई। उनका सबसे बड़ा पुत्र शिवलिंगरुद्र सरजा सन 1816 में उनका उत्तराधिकारी बना।

सन 1818 में अंगरेज़ों ने बेलगाम क़िले पर हमला कर दिया जो पेशवाओं के पास था। इसके बाद अंगरेज़ों ने कित्तूर सहित दक्षिण बेलगाम के पेशवा के क्षेत्र अपने अधीन कर लिये। हालंकि राजगद्दी पर शिवलिंगरुद्र था लेकिन ज़्यादातर राजनीतिक और प्रशासनिक काम रानी चेनम्मा देखती थीं। शिवलिंगरुद्र बस नाममात्र का राजा था। वह राज्य के कामकाज के बारे में शिवलिंगरुद्र को सलाह दिया करती थीं। समय के साथ रानी चेनम्मा और ताक़तवर हो गईं और एक तरह से शासक ही हो गई थीं। उनकी देखरेख में एक बार फिर कित्तूर पनपने लगा था। सितंबर सन 1824 में जब शिवलिंगरुद्र का देहांत हुआ, तब कित्तूर पर चेनम्मा का पूरा नियंत्रण हो गया और वह रानी बन गईं।

अंगरेज़ो का मुख्यालय कित्तूर से 40 कि.मी. दूर धारवाड़ में था और वे कित्तूर रियासत पर पैनी नज़र रखे हुए थे। उस समय कित्तूर दक्षिणी रियासतों में सबसे समृद्ध रियासत में से एक था जिसकी शक्ति दिन ब दिन बढ़ रही थी।

इससे अंगरेज़ विचलित हो गए। धारवाड़ का कलेक्टर और मुख्य राजनीतिक एजेंट जे. ठाकरे मौक़ा मिलते ही पहली फ़ुरसत में इस पर कब्ज़ा करना चाहता था।

चूंकि शिवलिंगरुद्र का कोई उत्तराधिकारी नहीं था और तबीयत भी बिगड़ रही थी, उन्होंने एक बेटा गोद लेने का फ़ैसला किया था। उन्होंने अपने अधिकारियों को लिंगायत समुदाय में कोई उपयुक्त लड़का तलाशने के लिये कहा। आख़िरकार बेलगाम के पास मस्तमराडी के बलप्पागौडा के पुत्र शिवलिंगप्पा को चुना गया। लेकिन शिवलिंगरुद्र की ख़राब तबीयत की वजह से गोद लेने की औपचारिक रस्म में देरी हो गई हालंकि सितंबर सन 1824 में मृत्यु के कुछ घंटे पहले लड़के को गोद ले लिया गया।

अंगरेज़ों के मुख्यालय में जब गोद लेने की ख़बर पहुंची, ठाकरे ने इसे कित्तूर पर कब्ज़ा करने का सही मौक़ा समझा। बहरहाल, गोद लेने की घटना को लेकर कई तर्क वितर्क थे। एक तर्क था कि गोद लेना अनुचित था। ठाकरे का कहना था कि कित्तूर का विलय ईस्ट इंडिया कंपनी में हो जाना चाहिये क्योंकि अगर कित्तूर पर मौजूदा शासकों का राज जारी रहा तो एक नाबालिग़ बहुत समय तक गद्दी पर रहेगा इसलिये कित्तूर का राजपाट चलाने की ज़िम्मेवारी उन्हें दे देनी चाहिये। वोडीयार अपनी किताब में लिखते है, “अंगरेज़ों ने सन 1854 तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं लाये थे जिसके तहत शाही परिवार की विधवा द्वारा किसी लड़के या लड़की को गोद लेकर उसे सत्ता पर बैठाने पर प्रतिबंध हो।“

रानी चेन्नम्मा की मूर्ती   | पिनटेरेस्ट 

लंबे समय तक, पूना (पुणे) में दक्कन के कमिश्नर विलियम चैपलिन और मुख्य सचिव विलियम न्यूनहैम के साथ बातचीत के बाद ठाकरे को राजकोष पर नियंत्रण मिल ही गया। देसाई के गार्डों को ड्यूटी पर जारी रखा। क़िले और महल पर अंगरेज़ गार्डों और सैनिका का पहरा हो गया। रानी चेनम्मा को लोगों से मिलने की इजाज़त नहीं थी। यही नहीं, ठाकरे ने दत्तक पुत्र शिवलिंगप्पा को कित्तूर से बाहर भेजने का आदेश भी दे दिया। इससे नाराज़ होकर रानी चेनम्मा ने 11 अक्टूबर सन 1824 को चैपलिन से बात करने का फ़ैसला किया और उन्हें चिट्ठियां लिखीं लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं हुआ। इस घटनाक्रम से कित्तूर में बग़ावत की पहली चिंगारी भड़क उठी। रानी चेनम्मा ने अपनी फौज के साथ इस संकट का सामना करने का फ़ैसला किया।

18 अक्टूबर को रानी चेनम्मा ने अपने सभी अधिकारियों को बुलवाया जिनका प्रमुख सरदार गुरुसिद्दप्पा था। दरबार में अपने भाषण में उन्होंने (रानी) घोषणा की, ‘किट्टूर हमारा है। हम अपनी ज़मीन के मालिक हैं। अंगरेज़ कहते हैं कि गोद लेना वैध नहीं है क्योंकि हमने उनसे इजाज़त नहीं ली थी…..हम उनसे ठाकरे और चैपलिन से कहेंगे कि हम उनके आगे नहीं झुकेंगे, चाहे जो हो जाए। कित्तूर अपने आख़िरी दम तक लड़ेगा। वे अंगरेज़ों के ग़ुलाम बनने से बेहतर मरना पसंद करेंगे।’

ये युद्ध का आव्हान था । आने वाले दिनों में कित्तूर के क़िले में यही होना था।

अंगरेज़ों की सेना से लड़ने के लिये कित्तूर के क़िले में सारे इंतज़ाम किए गए। इसी बीच, कित्तूर की सेना ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया जिनमें अंगरेज़ ख़ेमे के बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं। रानी चेनम्मा ने अपनी सेना के इस दल के सिपाहियों को पकड़कर बंद कर दिया और बच्चों तथा महिलाओं को रिहा करने का आदेश दिया। रानी के इस क़दम से ठाकरे द्रवित हो गया और उसने रानी से मिलना चाहा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। ठाकरे सेना की एक टुकड़ी के साथ कित्तूर पहुंचा था और उसने वहां अंगरेज़ सेना और अधिकारियों की खुली बग़ावत देखी। 23 अक्टूबर को जब अंगरेज़ सेना के तोपची अधिकारी गार्ड बदलने के लिये क़िले पहुंचे, तो उसने देखा कि किले का दरवाज़ा बंद था और रानी चेनम्मा के गार्डों ने अंगरेज़ अधिकारियों को भीतर नहीं आने दिया। ठाकरे ने दरवाज़ा खोलने के लिये कई संदेश भेजे लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला। उसने चेतावनी दी कि अगर 24 मिनट के अंदर दरवाज़े नहीं खोले गए तो दरवाज़े को तोप के गोले से उड़ा दिया जाएगा। 24 मिनट की मियाद ख़त्म होते ही दरवाज़ा खुला और रानी चेनम्मा की सेना अंगरेज़ सेना पर टूट पड़ी।

रानी चेनम्मा की सेना का चीफ़ कमांडर सरदार गुरुसिद्दप्पा सेना को हमला करने का आदेश दे रहा था जबकि रानी चेनम्मा क़िले की प्राचीर से सेना का संचालन कर रही थीं। कित्तूर के सैनिकों ने जितना संभव हो सकता था उतने अंगरेज़ सिपाही मार गिराए। ठाकरे घोड़े पर सवार होकर रानी की तरफ़ बढ़ रहा था तभी साधुनवर बालप्पा नामक सैनिक ने उसे गोली से उड़ा दिया। इस तरह कित्तूर सेना ने रानी चेनम्मा की कमान में पहले युद्ध में अंगरेज़ों को मात दे दी। इतिहास में अंगरेज़ों के ख़िलाफ इस युद्ध को किसी महिला यौद्धा का सबसे बहादुरी वाला कारनामा कहा जाता है। कहा जाता है कि इस युद्ध में कुछ अधिकारियों सहित अंगरेज़ को क़रीब 80 सैनिक मारे गए थे।

धारवाड़ में ठाकरे का मक़बरा  | ब्रिटिश लाइब्रेरी

बहरहाल, रानी चेनम्मा को पता था कि युद्ध समाप्त नहीं हुआ है और अंगरेज़ तैयारी करके फिर कित्तूर पर ज़ोरदार हमला करेंगे। हालंकि कित्तूर का क़िला मज़बूत और अच्छी तरह सुरक्षित था लेकिन फिर भी रानी चेनम्मा को पता था कि कित्तूर पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। रानी और अंगरेज़ प्रशासन के बीच बातचीत के कई दौर हुए लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। दिसंबर सन 1824 में कित्तूर के आसपास अंगरेज़ों के हमले शुरु हो चुके थे। उन्होंने धारवाड़, आरकोट, पूना और बैंगलोर सहित कई राज्यों से सेना की अतिरिक्त टुकड़ियां मंगवाकर अपनी सेना मज़बूत कर ली थी। 4 दिसंबर की देर रात अंगरेज़ सेना ने क़िले की दीवार तोड़ दी। क़िले के अंदर तैनात सैनिकों ने अंगरेज़ सेना को रोकने की कोशिश की मगर वे मारे गए। कुछ सिपाही भाग गए जबकि कुछ को गिरफ़्तार कर लिया गया लेकिन ज़्यादातर सैनिकों ने लड़ते लड़ते अपनी जान न्यौछावर कर दी। 5 दिसंबर को क़िले पर अंगरेज़ों का कब्ज़ा हो गया। रानी चेनम्मा और उनकी दो बहूओं ने क़िले से भागने की कोशिश की लेकिन उन्हें पकड़ लिया गया।

युद्ध के दो अन्य महत्वपूर्ण सैनिक अधिकारी सरदार गुरुसिद्दप्पा और संगोली रयन्ना को भी हिरासत में ले लिया गया। वोडियार के अनुसार युद्ध के बाद कमिश्नर चैपलिन और उसके अधिकारियों ने सारा ख़ज़ाना लूट लिया। कहा जाता है कि अंग्रेज़ सरकारी ख़ज़ाने से 16 लाख रुपये नक़द और चार लाख रुपये मूल्य के ज़ैवरात अपने साथ ले गए। सन 1828 और सन 1830 के बीच संगोली रयन्ना ने अंगरेज़ों के ख़िलाफ़ बग़ावत जारी रखी और आख़िरकार उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन उनकी बहादुरी को आज भी इतिहास में याद किया जाता है।

संगोली रयन्ना की एक मूर्ती   | विकिमीडिआ कॉमन्स  

रानी चेनम्मा को बेलगाम के बैहोंगला क़िले में क़ैद कर दिया गया था जहां पांच साल बाद यानी दो फ़रवरी सन 1829 को उनकी मृत्यु हो गई। पूरे सैनिक सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी समाधि पर एक मक़बरा बनवाया गया जो आज ख़राब स्थिति में है।

एक भारतीय स्टाम्प पर रानी चेन्नम्मा का चित्र   | विकिमीडिआ कॉमन्स  

कित्तूर क़िला, जिसे आज चेनम्मा क़िले के नाम से भी जाना जाता है, एक महिला यौद्धा की बहादुरी का साक्षी है। ये क़िला बेलगाम से 50 कि.मी. और धारवाड़ से 32 कि.मी. दूर है। यहां एक टेलिस्कोप है जिसका इस्तेमाल रानी किया करती थीं। यहां कित्तूर रानी चेनम्मा मेमोरियल गवर्नमेंट म्यूज़ियम नाम से एक पुरातत्व संग्रहालय भी है। इसकी देखरेख कर्नाटक सरकार का राज्य पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग करता है।

शिवलिंग की पूजा करते हुए श्री राम और सीता का चित्र

कित्तूर की रानी चेनम्मा की विरासत आज भी ज़िंदा है। उनके जीवन पर कन्नड में कई नाटकों के अलावा बहुत कुछ लिखा गया है। फ़िल्में भी बनी हैं। कित्तूर में हर साल 22 से 24 अक्टूबर तक कित्तूर उत्सव मनाया जाता है जिसमें चेनम्मा की विजय और बहादुरी को याद किया जाता है। 11 सितंबर सन 2007 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भारतीय संसद भवन में रानी चेनम्मा की मूर्ति का अनावरण किया था।

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