मोढेरा सूर्य मंदिर



अहमदाबाद के पास एक छोटा सा गांव है मोढ़ेरा। यूं तो आज ये गुमनामी के अंधेरों में छुपा हुआ है लेकिन किसी ज़माने में यह एक शक्तिशाली राजधानी हुआ करता था। सोलंकी राजवंश ने यहां 942 ई. से 1305 ई. तक राज किया था। सोलंकी शासकों ने मोढ़ेरा सूर्य मंदिर बनवाया था जो पश्चिम भारत के शानदार मंदिरों में से एक माना जाता है।

मोढ़ेरा सूर्य मंदिर मध्यकालीन भारत के भव्य और मनोरम मंदिरों में गिना जाता है। इसे सोलंकी साम्राज्य के राजा भीमदेव ने 11वीं शताब्दी में बनवाया था। मोढ़ेरा सूर्य मंदिर मारु-गुर्जर वास्तुकला शैली में बलुआ पत्थर का बना है। इस मंदिर के तीन मुख्य भाग हैं : गर्भ-गृह एवं गूढ़-मंडप, सभा-मंड़प एवं सूर्य-कुंड या बावड़ी।

  1. मुख्य मंदि रजिसमें गर्भ-गृह है
  2. सभा-मंडप या रंग-मंडप
  3. कुंड (रामकुंड अथवा सूर्यकुंड)

सूर्य देवता को समर्पित यह मंदिर अपनी बेहतरीन कारीगरी के लिए जाना जाता है। मध्य मंदिर और मंडप, दोनों ही चबूतरे पर बने हैं। मंदिर हालंकि 11वीं सदी में बनकर तैयार हो गया था लेकिन इसका निर्माण चरणों में हुआ था। मंदिर बनने के बाद कुंड बना था और फिर बाद में मंडप का निर्माण हुआ। यह मंदिर कर्क रेखा के ऊपर स्थापित है।


कहा जाता है कि मंदिर कुछ इस तरह से बनाया गया है कि सूर्योदय की पहली किरण पड़ते ही गर्भ-गृह में सूर्य का प्रतिबिंब दिखने लगता है लेकिन गर्मी के मौसम में सूर्य की किरणें सीधे मंदिर के ऊपर पड़ती हैं और मंदिर का साया नहीं पड़ता।

मंदिर का निर्माण 1026-27 ई. में हुआ था और इसका श्रेय राजा भीमदेव (1022-1063) को जाता है। पुरातत्ववेत्ता एच.डी. संखालिया के अनुसार मंदिर निर्माण की तारीख़ में विरोधाभास दो कारणों से है-मंदिर की पीछे की दीवार पर एक शिला-लेख है जो उल्टा लगा है। इस पर अंकित तारीख़ विक्रम संवत 1083 यानी 1026-27 ई. है लेकिन इसकी वास्तुकला दिलवाड़ा के आदिनाथ जैन मंदिर से मिलती जुलती है जिसका निर्माण 1031 ई. में हुआ था।

सभामंडप
सभामंडप

मुख्य मंदिर दो भागों में बंटा हुआ है, गर्भ-गृह और गुधा-मंडप। गर्भ-गृह 11 स्क्वैयर मीटर में बना हुआ है और यहां रखी देवी की प्रतिमा आज दुर्भाग्य से नदारद है। गर्भ-गृह के आस पास देवी की परिक्रमा के लिए प्रदक्षिण मार्ग है। प्रदक्षिण मार्ग में सूर्य देवता की सुंदर प्रतिमाएं हैं।

मंदिर की भीतरी दीवारें हालंकि सादी हैं लेकिन प्रवेश द्वार पर सूर्य देवता की मूर्तियां हैं जिनके इर्द गिर्द नृतकों और रसिक प्रेमियों के चित्र हैं। ये भी समय के साथ साथ बुरी तरह नष्ट हो चुकी हैं। मंदिर के ऊपर एक शिखर था जो समय के साथ ढह चुका है।

ज़्यादातर कलाकृतियों में सूर्यदेवता सात घोड़ों पर सवार हाथ में कमल के दो फूल लिए दिखाई पड़ते हैं। इन कलाकृतियों में दिलचस्प बात ये है कि सूर्यदेवता जूते पहने हुए हैं। इतिहासकारों का मानना है कि इसका संबंध मध्य एशिया के प्रभाव से हो सकता है।

मंदिर परिसर में स्थित भवनों में सभा-मंडप सबसे भव्य है। माना जाता है इसे सबसे बाद में बनवाया गया था। बाहरी और भीतरी दीवारों पर बहुत ख़ूबसूरती से कलाकृतियां उकेरी गई हैं और दीवारों को फूल-मालाओं से भी सजाया गया है। संखालिया का कहना है कि सभा-मंडप के किनारों को इस तरह से तराशा गया है कि मंदिर किसी तारे की तरह लगता है।

सभा मंडप की दीवारों, छतों और चौखटों पर छोटे-छोटे दृश्य अंकित हैं। संखालिया का मानना है कि ये दृश्य रामायण के हैं। अगर ये सही है तो गुजरात के प्राचीन मंदिरों में पहली बार मूर्तियों या कलाकृतियों के द्वारा रामायण की कथा कही गई है।

मंदिर और सभा-मंडप का निर्माण अलग अलग समय में हुआ था इसलिए मुख्य मंदिर और सभा-मंडप की कलाकृतियों और सजावट में कुछ अंतर दिखाई पड़ता है। मुख्य मंदिर में जहां सजावट कम दिखती है वहीं सभा में ख़ूब सजावट है। संखालिया के अनुसार मंदिर के भीतर की सादगी की भरपाई बाहरी सजावट से की गई है।

संखालिया के मुताबिक़ कुंड के पास स्थित सभा-मंडप के सामने कभी कीर्ति तोरण (विजय को दर्शाता मेहराब) हुआ करता था। दुर्भाग्य से तोरण और इसका आधार, दोनों ही अब ग़ायब हो चुके हैं और बचे हैं तो सिर्फ़ दो स्तंभ जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि तोरण कभी इस जगह होगा। इन संतभों से कुंड की तरफ़ सीड़ियां जाती हैं। संखालिया बताते हैं कि मोढ़ेरा सूर्य मंदिर का कुंड संभवत: सहस्त्रलिंग तालाब से प्रेरित होकर बनवाया गया होगा।

कुंड आयताकार पानी का टैंक है जिसके बाहर पत्थर लगे हुए हैं। कुंड के अंदर चारों तरफ़ बनी सीढ़ियों और मेड़ से कुंड की सतह तक पहुंचा जा सकता है। कुंड की दीवारों और सीढ़ियों पर कई छोटे-बड़े मंदिर बने हुए हैं।

मंदिर के वास्तुकार का भले ही कुछ पता न हो लेकिन लेकिन इसकी भव्यता को देखकर कला इतिहासकार पर्सी ब्राउन ने अज्ञात वास्तुकार को ‘सपने बुनने वाला ’ कहा है।

दिलचस्प बात ये है कि भारत में अन्य कई ऐतिहासिक जगहों की तरह मोढ़ेरा की भी पुन:खोज भी अंग्रेज़ों ने की थी। इसके बारे में सबसे पहले कर्नल एम. मोनियर-विलियम्स ने बताया था जिन्होंने 1809 में बतौर सर्वेयर जनरल अपनी रिपोर्ट में मंदिर की मौजूदगी के बारे में जानकारी दी थी। उनके बाद ए.के. फ़ोर्ब्स ने मंदिर के बारे में और जानकारी दी थी और इसकी खोज की योजना बनाई थी।

आमतौर पर माना जाता है कि मोढ़ेरा मंदिर सूर्य देवता को समर्पित है लेकिन इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता कीर्ति मंकोड़ी का कहना है कि ये मंदिर सूर्य देवता के अलावा भगवान शिव सहित अन्य देवी-देवताओं का मिश्रण है जिन्हें उस समय पूजा जाता था। इस मंदिर में आज भले ही पूजा न होती हो लेकिन ये आज भी दर्शनीय है और सोलंकी राजवंश के गौरव तथा पहली सहस्राब्दी के शुरुआती वर्षों में उनकी उपलब्धियों का गवाह है।

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