वडनगर के भव्य और ख़ूबसूरत तोरण



गुजरात का वडनगर एक छोटा सा शहर है लेकिन इसका इतिहास बहुत वैभवशाली और समृद्ध है । यहां आज भी कई प्राचीन और मध्यकालीन स्मारक देखे जा सकते हैं । इनमें सबसे प्रेरक हैं कीर्ति तोरण जो सोलंकी साम्राज के समय के हैं ।


वडनगर प्राचीन काल और मध्यकाली की शुरुआत में बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करता था । ये संत कवि नरसिंह मेहता का भी घर रह चुका है ।

कुछ इतिहासकार और पुरातत्व विशेषग्य मानते हैं कि वडनगर 2000 साल पुराना है और इसकी स्थापना “सामान्य युग” के शुरुआती वर्षों में हुई थी । वडनगर कि खुदाई में बोद्ध समय के समृद्ध अवशेष मिले हैं जिनमें गुप्त काल की बुद्ध की एक प्रतिमा, ख़ोल चूड़ियां, कलाकृतियां और स्तूप सहित कई भवनों के अवशेष शामिल हैं।

ह्वेन त्सांग
ह्वेन त्सांग|विकिमीडिया कॉमन्स 

वडनगर का संबंध प्राचीन शहर अनार्त से बताया जाता है । क्षत्रप राजा रुद्रमन के शासनकाल में जूनागढ़ में मिले शिलालेख में इसका ज़िक्र मिलता है सन 640 और सन 644 ई.पू. के बीच चीनी भिक्षु और यायावर ह्वेन त्सांग ने जिस आनंदनगर का ज़िक्र किया है वो दरअसल वडनगर ही है । खुदाई में मिले अवशेषों से भी वडनगर और अनार्त के संबंध को बल मिलता है । 12वीं सदी में कुमारपाल राजा ने शहर के चारों तरफ़ दीवारें बनवाई थीं जिसमे ६ दरवाज़े थे । ऐसा माना जाता है कि मध्यकालीन युग में यहां तीन हज़ार से ज़्यादा मंदिर थे ।

अर्जुन बारी दरवाज़ा, वडनगर 
अर्जुन बारी दरवाज़ा, वडनगर |विकिमीडिया कॉमन्स 

वडनगर का सबसे उल्लेखनीय पहलू हैं प्रसिद्ध कीर्ति तोरण जो शर्मिष्ठा झील के तट पर स्थित हैं । बताया जाता है कि सोलंकी राजाओं ने 12वीं ई.पू. में तोरण का निर्माण करवाया था । ये शहर की उत्तरी दिशा में हैं । ये शैली और आकार में एक जैसे हैं । ये क़रीब 40 फुट लंबे हैं और लाल तथा पीले बलुआ पत्थर के बने हुए हैं ।

गुजरात में मोढ़ेरा और सिद्धपुर सहित कई जगहों पर कीर्ति तोरण देखे जा सकते हैं लेकिन वडनगर के तोरण सबसे परिपूर्ण और उत्कृष्ट हैं ।


तोरण सोलंकी साम्राज की उपलब्धियों के प्रीतक भर हैं और इसके सिवा इनका कोई मक़सद दिखाई देता । इनका उद्देश्य सिर्फ़ साज सज्जा ही था ।

सिद्धपुर के रूद्रमहालय की तोरण 
सिद्धपुर के रूद्रमहालय की तोरण |विकिमीडिया कॉमन्स 

तोरण बिना चुने या जोड़नेवाली पदार्थ से बनाए गए थे । दोनों तोरणों की बुनियाद 2.5 स्क्वैयर मीटर रखी गई थी ताकि वे सीधे खड़े रह सकें । तोरण की डिज़ायन और साज सज्जा बहुत आकर्षक है । मोढ़ेरा के सूर्य मंदिर और सिद्धपुर के रुद्र महालय तथा तोरण की साज सज्जा में काफ़ी समानता देखी जा सकती है ।

तोरण दो गोलाकार खंभे पर खड़े हैं जिन पर शिकार और युद्ध के दृश्यों के साथ ही जानवरों की कलाकृतियां बनी हुई हैं । खंबों पर फूलदार नक़्क़ाशी भी देखी जा सकती है । इन पर मानव-मूर्तियां भी बनी हुई हैं । चौखट और फ़ुटपाथ को खंबे सहारा देते हैं । तोरण के ऊपर देवताओं की मीर्तियां हैं और माना जाता है कि ये मूर्तियां शिव, गणेश और कार्तिकेय की हैं जो दो तरफ़ बनी हुई हैं । दूसरे तोरण की चौखट के नीचे अर्धचंद्राकार मेहराब है जो बिच्छू के मुंह से निकल रही है । इस पर छवियां बनी हुई हैं ।

कुछ सूत्रों के अनुसार ये तोरण एक मंदिर का हिस्सा हुआ करते थे लेकिन मंदिर समय के साथ नष्ट हो गया और बचे तो बस ये तोरण । कुछ अन्य सूत्रों का मानना है कि तोरण मंदिर का हिस्सा नहीं बल्कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित थे । कुछ का तो ये भी कहना है इन्हें सोलंकी राजाओं ने मालवा पर जीत के प्रतीक के रुप में बनाया था ।

फ़ोटोग्राफ़र हेनरी कौसन्स द्वारा ली हुई तस्वीर 
फ़ोटोग्राफ़र हेनरी कौसन्स द्वारा ली हुई तस्वीर |ब्रिटिश लाइब्रेरी 

फ़ोटोग्राफ़र हेनरी कौसन्स और ए.के. फ़ोर्ब्स जैसे अंग्रेज़ यात्रियों, लेखकों और फ़ोग्राफ़र्स के अनुसार लंबे समय तक शहर में दो तोरण थे । इसका ज़िक्र “रास माला या गुजरात के हिंदूओं का सिलसिलेवार इतिहास” नामक किताब में मिलता है जो सन 1856 में प्रकाशित हुई थी ।

बहरहाल, 20वीं शताब्दी में वडनगर आने वाले लोगों ने सिर्फ़ एक ही तोरण देखा होगा । ऐसा इसलिए क्योंकि एक तोरण को तोड़ दिया गया था और उसके हिस्से दूसरे तोरण के पास दशकों तक पड़े रहे । स्थानीय किवदंती के अनुसार बड़ोदा के महाराजा सयाजीराव तोरण को बड़ोदा ले जाना चाहते थे इसलिए उन्होंने इसके टुकड़े करवा दिए थे । लेकिन स्थानीय लोगों के विरोध की वजह से वह इसे बड़ोदा नहीं ले जा सके । इस तरह तोरण टूटी फूटी हालत में वडनगर में सदियों पड़ा रहा । इस कहानी में कितनी सच्चाई है ये कह पाना मुश्किल है ।

विकिमीडिया कॉमन्स 

सन 1960 में इन दोनों तोरणों को भारतीय पुरातत्व विभाग की संरक्षित सूची में रख दिया गया था ।

तोरण को तोड़े जाने के बाद आने वाले सालों में इसकी कुछ मूर्तियां ग़ायब हो गईं थां । अगर टूटे हुए हिस्सों को जूड़कर देखें तो साफ़ पता लगता है कि मूर्तियां ग़ायब हैं ।

सन २००५-२००६ की शुरुआत में तोरण को फिर जोड़ने के लिए भारतीय पुरातत्व विभाग को पैसा दिया गया और सन 2007 में ये काम पूरा भी हो गया । अब यहां आने पर दो भव्य तोरण नज़र आते हैं ।

वडनगर भले ही गुजरात का एक छोटा शहर हो लेकिन इसके गर्भ में मुग्ध करने वाली कई कथाएं छुपी हैं और तोरण उनमें से एक है।

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