भारत की 5 महिला अग्रणी जिन्होंने पितृसत्ता को परिभाषित किया

भारत की 5 महिला अग्रणी जिन्होंने पितृसत्ता को परिभाषित किया

100 साल से भी कम समय पहले, दुनिया भर की महिलाएं वोट देने, खुद की संपत्ति और अपने बैंक खातों का प्रबंधन करने के अधिकारों के लिए लड़ रही थीं। कुछ लोगों ने स्कूल में रहने और कॉलेज और स्नातक करने के लिए बाधाओं से जूझ लिया, केवल बाद में यह बताये जाने के लिए की कार्यस्थल उनके लिए नहीं थे। जो अपने दम पर बाहर निकल गए – डॉक्टर, वकील, वैज्ञानिक, शिक्षक – को गंभीरता से नहीं लिया गया| लेकिन यह ऐसे अग्रणी व्यक्ति थे जिनकी कृतित्व और दृष्टि के कारण महिलाओं को संसद और यहां तक कि बोर्डरूम में भी प्रतिनिधित्व किया गया।

यह कुछ भी संभव नहीं होता अगर कुछ साहसी महिलाएं व्यक्तिगत लागत की परवाह किए बिना एक उदाहरण निर्धारित करने का निर्णय नहीं लेतीं।यहां आधुनिक भारत के शुरुआती नारीवादियों और कार्यकर्ताओं की कुछ प्रेरणादायक लेकिन कम-ज्ञात कहानियों पर एक नज़र है।

1- हंसा मेहता

क्या आप जानते हैं कि गुजरात की एक महिला ने संयुक्त राष्ट्र (United Nations) को मानवाधिकार के सार्वभौमिक घोषणा-पत्र की शुरुआती पंक्तियों में पुरुष और महिलाओं को समान अधिकार देने की बात शामिल करने के लिये बाध्य कर दिया था? 1947-48 में शिक्षाविद, स्वतंत्रता सैनानी और महिला अधिकारों की वकालत करने वाली हंसा मेहता ने अनुच्छेद एक की इस इबारत ‘सभी पुरुष स्वतंत्र और एक समान पैदा होते हैं…’ को बदलावकर ‘सभी इंसान स्वतंत्र और एक समान पैदा होता है…’ करवा दिया था।

हंसा मेहता स्वतंत्रता सैनानी और महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष करने के अलावा वह सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका और सांसद भी थीं। हंसा मेहता सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा-पत्र का मसौदा तैयार करने वाली संयुक्त राष्ट्र की समिति की सदस्य भी रहीं।

हंसा मेहता | विकिमीडिया कॉमन्स

14 अगस्त सन 1947 को जब रात के बारह बजे भारत अंग्रेज़ों से आज़ाद हुआ तब वह जवाहरलाल नेहरु और राजेंद्र प्रसाद के साथ शामिल होनेवाले लोगों में मौजूद थीं। जैसे ही रात के बारह बजे राष्ट्रपति ने आज़ादी की प्रतिज्ञा ली और भारत की महिलाओं की तरफ़ से हंसा ने राष्ट्रपति को राष्ट्रीय ध्वज सौपा और कहा-“हमने केसरिया रंग पहना है, हमने संघर्ष किया है और देश की आज़ादी के लिये हम लड़े हैं और बलिदान किया है। आज हमने अपना उद्देश्य प्राप्त कर लिया। हमारी आज़ादी के प्रतीक इस चिन्ह (राष्ट्रीय ध्वज) को देते हुए हम एक बार फिर देश के प्रति हमारी सेवा की पेशकश करते हैं।”

आधी रात के सत्र में बोलते हुए हंसा मेहता | प ई ब 

हंसा का जन्म तीन जुलाई सन 1897 में गुजरात के सूरत में एक शिक्षित और धनवान परिवार में हुआ था। उनके पिता मनुभाई मेहता बड़ौदा कॉलेज में दर्शन शास्त्र के प्रोफ़ेसर थे जो बाद में बड़ौदा और फिर बीकानेर के दीवान बने। उनके दादा नंदशंकर मेहता समाज सुधारक थे और उन्होंने पहला गुराती उपन्यास “करण घेलो” लिखा था। और पढ़ें

2- इरावती कर्वे

“हम बतौर भारतीय क्या हैं, हम क्यों हैं, हम कैसे हैं?”

ये वो सवाल हैं जिसका जवाब भारत की पहली महिला मानव वैज्ञानिक इरावती कर्वे सारी ज़िंदगी तलाशती रहीं। इसे समझने के लिए कर्वे ने मानवजाति के वैज्ञानिक इतिहास का रास्ता चुना। उन्होंने न सिर्फ़ प्राचीन मानव के शारीरिक लक्षणों पर ध्यान दिया बल्कि समुदायों की क्षेत्रीय उक्ति परंपराओं का भी अध्यन किया। किसी विषय पर इस तरह से खोज ऐसा ही व्यक्ति कर सकता है जो निर्भीक हो और जिसके पास अनूठी सोच हो।

इरावती का नाम बर्मा की प्रसिद्ध नदी इरावड़ी के नाम पर रखा गया था। नदी की तरह ही वह भी घूमते हुए शिक्षा और साहित्य के विभिन्न पड़ाव से गुज़रीं। 15 दिसंबर 1905 में एक प्रगतिशील मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी इरावती ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से समाज विज्ञान में एम.ए. किया। 1928 में उन्होंने बर्लिन विश्वविद्यालय में कैसर विल्हेम इंस्टीट्यूट फॉर एंथ्रोपोलॉजी से डॉक्टर की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने वहां ‘मानव संरचना की सामान्य संरचना’ विष्य पर थीसिस लिखी। रिसर्च के लिए उन्होंने पूरक विषय के रुप में जीव विज्ञान, संस्कृत और दर्शन शास्त्र को चुना।

इरावती कर्वे | विकिमीडिया कॉमन्स

उन्होंने समाज शिक्षा, भाषा समस्या, भारतीय महिलाओं की स्थिति, क़ानून की अनुल्लंघनीयता, सांप्रदायिकता, दलितों के अधिकारों, पंचायतों के स्वरुप और लोकतंत्र तथा आज़ादी की अवधारणा जैसे विषयों पर बेहद ईमानदारी और बेबाक ढंग से लिखा। उनकी प्रमुख किताबों में ‘किनशिप ऑर्गनाइज़ेशन इंडिया’ (1953) को गिना जाता है। इस किताब में उन्होंने जाति और इसकी शब्दावली के रहस्य को तोड़ने की कोशिश की। इस किताब ने विश्व के तमाम विद्वानों का ध्यान खींच लिया। और पढ़ें

3- जानकी अम्मल

50 के दशक में द्वतीय विश्व युद्ध और सन 1943 के बंगाल आकाल के बाद भारत में वनस्पति और कृषि क्षेत्र की हालत बहुत ख़राब हो गई थी और इसे फ़ौरन ठीक करने की ज़रुरत थी। ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने बोटैनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया को पुनर्जीवित करने के बारे में सोचा और वह चाहते थे इस संस्था की ज़िम्मेदारी सबसे श्रेष्ठ वनस्पति बैज्ञानिक को दी जाए। सो, जानकी अम्मल को संस्थान का नेतृत्व करने का निमंत्रण भेजा गया। जानकी वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में देश और विदेश में अपना लोहा पहले ही मनवा चुकी थीं। जानकी भारत की पहली वनस्पति वैज्ञानिक थीं। इस पद के लिये उनसे बेहतर कोई और हो ही नहीं सकता था।

जानकी अम्मल | विकिमीडिया कॉमन्स

20वीं शताब्दी में, जब भारत में शिक्षा और विवाह के क्षेत्र में महिलाओं के अधिकारों के लिये संघर्ष चल रहा था तब जानकी नाम की लड़की वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र जुड़ चुकी थी। 30 के दशक में जानकी ने इस क्षेत्र में एक ज़बरदस्त खोज की जिसके लिये आज भी उन्हें याद किया जाता है। वह तमिलनाडु के कोयम्बतूर शहर में गन्ना उगाने वाले संस्थान के साथ काम कर रही थीं जो भारत में गन्ने की क़िस्म को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर रहा था, उस समय गन्ना दक्षिण एशिया से आयात किया जाता था। जानकी ने गन्ने की एक ऐसी क़िस्म तैयार की जो न सिर्फ़ स्वाद में ज़्यादा मीठी थी बल्कि भारत के मौसम के अनुकूल भी थी। उनके शोध ने, भौगोलिक स्थितियों के अनुसार देश के अलग अलग क्षेत्रों में, गन्ना उत्पादन के बारे में जानकारी हासिल करने में महत्वपूर्ण मदद की।

मद्रास प्रेसीडेंसी का नक्शा | विकिमीडिया कॉमन्स

जानकी केरल के एक छोटे से शहर से आईं थीं। उनका जन्म नवंबर सन 1897 में तेलीचेरी में हुआ था जो अंग्रेज़ शासन के दौरान मद्रास रियासत में हुआ करता था। उनके परिवार में 19 भाई-बहने थीं और उनका नंबर दसवां था। उनके पिता दीवान कृष्णन सब जज थे और उन्होंने प्रकृतिक विज्ञान में जानकी की रुचि पैदा करने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने अपने घर में एक बाग़ीचा लगाया था और अक्सर इस क्षेत्र की वनस्पतियों और जीवजंतुओं के बारे में जानकी से चर्चा करते थे और इस तरह जानकी की भी इनमें दिलचस्पी पैदा हो गई। और पढ़ें

4- मैडम कामा

एक सदी पूर्व 22 अगस्त सन 1907 को एक जुझारु भारतीय महिला ने स्टुटगार्ट, जर्मनी, में अंतरराष्ट्रीय सोशलिस्ट क़ॉंफ़्रेंस में भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराया जो दरअसल हमारे राष्ट्रीय ध्वज का पहला संस्करण था जिसमें बाद के वर्षों में बदलाव होते रहे और आख़िकार वो तिरंगा बन गया जिसे आज हम जानते और प्रेम करते हैं । इस सम्मेलन में दुनिया भर से हज़ारों समाजवादी और क्रांतिकारी जमा हुए थे जिसमें व्लादिमीर लेनिन भी शामिल थे। इस महिला का नाम था मैडम भीकाजी कामा जिन्हें अंग्रेज़ एक ख़तरनाक अराजकतावाली और ऐसी कुख्यात महिला मानते थे जिसके दिमाग़ में क्रांतिकारी विचारों का फितूर भरा था।

लेकिन मैडम कामा इससे कहीं अधिक दिलेर थीं। वह दो टूक बात करने वाली थी। ऐसे समय जब नरमपंथी भारत की आज़ादी के लिये संघर्ष का नेतृत्व कर रहे थे, मैडम कामा ने अमेरिका स्थित एक अख़बार को दिए साक्षात्कार में कहा- ‘संयुक्त राज्य भारत हमारा उद्देश्य है, एक नया और महान गणराज्य जिस पर भारत की जनता हुक़ुमत करेगी-ये हम चाहते हैं- अगर संभव हुआ तो शांतिपूर्ण तरीक़े से या फिर ज़रुरत पड़ने पर बल से-एक रक्तहीन क्रांति-ये हमारी इच्छा है और अगर ये संभव नहीं हुआ तो फिर रक्तरंजित क्रांति- ये हमने ठान लिया है…..’

मैडम कामा | विकिमीडिया कॉमन्स

भीकाजी कामा का जन्म बम्बई के एक संपन्न पारसी परिवार में 24 सितंबर सन1861 को हुआ था। ये वो समय था जब देश में राष्ट्रवाद की लहर चल रही थी और घरों में इस पर चर्चा होती थी। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि भीकाजी कामा अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में ही राजनीति में दिलचस्पी लेने लगीं थीं। सन 1885 में उन्होंने प्रसिद्ध वकील रुस्तमजी कामा से शादी कर ली जो समाज सुधारक और विद्वान ख़ुर्शीदजी कामा के पुत्र थे। ख़ुर्शीदजी कामा की स्मृति में मुम्बई में के. आर. कामा ओरिएंटल इंस्टीट्यूट स्थापित किया गया था जो रिसर्च के लिये समर्पित था। लेकिन भीकाजी कामा की शादी सुखद नहीं थी क्योंकि उनके पति अंग्रेज़ों के समर्थक थे जबकि कामा कट्टर राष्ट्रवादी थीं।और पढ़ें

5- अमृता प्रीतम

आज मैंने, अपने घर का नम्बर मिटाया है

और गली के माथे पर लगा, गली का नाम हटाया है

और हर सड़क की, दिशा का नाम पोंछ दिया है

पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है

अगर अमृता प्रीतम के व्यक्तित्व को एक वाक्य में बयां करना हो तो कहा जा सकता है कि वह एक ऐसी महिला थीं जिन्होंने ज़िंदगी उसी तरह जी जैसी उन्होंने कल्पना की थी।

पंजाबी की प्रमुख महिला कवयित्री, अमृता ने प्रेम, महिला और भारत के विभाजन पर लिखी कविताओं से लाखों लोगों के दिलों में जगह बनाई। दो टूक और तंज़ों-ओ-मज़ाह से भरी उनकी गंभीर कविताओं के लिये जहां उनकी तारीफ़ हुई वहीं आलोचना भी हुई। उनकी निजी ज़िंदगी को लेकर भी कई तरह की बातें कहीं जाती थीं। उन्होंने शादी किसी और से की, प्यार किसी और से और रहीं किसी तीसरे के साथ। लेकिन इसके बावजूद उन्हें पंजाबी साहित्य में वो मर्तबा मिला जिसकी वो हक़दार थीं। उनके शब्दों ने राजनीतिक, सामाजिक, जातीय और काल की सीमाओं को फ़लांगा है। हम आपको बताने जा रहे हैं एक ऐसी महिला के बारे में जिसने ऐसी किसी सामाजिक परंपरा की परवाह नहीं की जिसमें उनका दम घुटता था। उनके बेबाक और बेख़ौफ़ साहित्य ने 20वीं शताब्दी के भारतीय साहित्य पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

अमृता प्रीतम | विकिमीडिया कॉमन्स

अमृता का जन्म 31 अगस्त सन 1919 में पंजाब के गुजरांवाला प्रांत (अब पाकिस्तान में) में हुआ था और उनका नाम अमृता कौर था। उनकी मां राज बीबी स्कूल टीचर थीं और पिता करतार सिंह हितकारी धार्मिक विद्वान थे। अमृता पने माता पिता की आकलौती संतान थीं। लेकिन दुर्भाग्य से अमृता जब सिर्फ़ 11 साल की थीं, तभी उनकी मां का देहांत हो गया। अकेलेपन और ज़िम्मेदारियों के बोझ की वजह से अमृता का रुझान लेखन की तरफ़ चला गया। काग़ज़ पर अपने जज़्बात का इज़हार करने की उन्हें वो आज़ादी मिली जिनका इज़हार वो अपने क़रीबी लोगों से भी नहीं कर पाती थीं।

सन 1936 में जब अमृता 16 साल की हुईं तो उनकी शादी लाहौर में ही, होज़री के दुकानदार वाले के बेटे प्रीतम सिंह से हो गई। शादी के एक साल बाद उनकी कविताओं का पहला संकलन “अमृत लहरें” प्रकाशित हुआ। जल्द ही उनके परिवार में दो बच्चों का जन्म हुआ लेकिन वह शादी से ख़ुश नहीं थीं और वह शायरी की दुनिया डूब गईं थीं। सन1936 और 1943 के बीच उनकी कविताओं के आधा दर्जन संकलन प्रकाशित हो चुके थे।

साहिर लुधियानवी और अमृता प्रीतम  | विकिमीडिया कॉमन्स

अमृता प्रगतिशील लेखक संघ की सदस्य बन गईं और सामाजिक विषयों पर कविताएं लिखने लगीं। अमृता ने अपनी प्रेम कविताएं लिखने की शुरुआत तो निजी जीवन के ख़ालीपन से शुरु की थीं लेकिन प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़ने के बाद वह समाजिक और राजनीति के क्रूर सच के बारे में भी लिखने लगीं। उदाहरण के लिये उनके कविता संकलन “लोक पीड़ ” में उन्होंने सन 1943 में, बागाल में पड़े भयानक सूखे के बाद सामने आई बरबाद अर्थव्यवस्था की जमकर आलोचना की। और पढ़ें

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