अमृतसर का क़िला गोबिंदगढ़ अपने भीतर आज भी कई ऐसे एतिहासिक तथ्य तथा रहस्य समाए बैठा है, जिन पर न तो कभी कोई चर्चा की गई और न ही उनके बारे में इतिहास के विद्वानों को जानकारी है। चलिए जानते हैं क़िला गोबिंदगढ़ से संबंधित कुछ ऐसे ही तथ्य जो इसके इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होने के बावजूद अभी तक सार्वजनिक नहीं हो सके हैं।
शमशेर सिंह ठेठर ने किया था क़िला गोबिंदगढ़ का निर्माण
जहां आज क़िला गोबिंदगढ़ हैं वहां सन 1809 से पहले ‘क़िला गुज्जर सिंह भंगी’ हुआ करता था। जिसे भंगी मिसल के चीफ़ स. गुज्जर सिंह भंगी (नत्था सिंह संधू निवासी गाँव भौरी का सुपुत्र) ने सन 1783 में, लाहौर से अमृतसर आने वाले मुख्य मार्ग पर , क़िला लोहगढ़ से थोड़ी दूरी पर ईंट-चूने से बनवाया था। महाराजा रणजीत सिंह ने अमृतसर को अपने अधिकार में लेने के बाद सन 1809 (बैरून चाल्र्स हूगल, ‘ट्रैवलर्ज़ इन कश्मीर एंड पंजाब’, पृष्ठ 390 के अनुसार, किला गोबिंदगढ़ सन 1808 में बनना शुरू हुआ और सन 1809 में मुकम्मल हुआ) में इस क़िले का नव-निर्माण करवाया था ।
इस क़िले का निर्माण सरदार जोध सिंंह रामगढ़िया ने हूबहू क़िला रामगढ़ की तरह करवाया था । उनके विदेश मंत्री फ़क़ीर अज़ीज़उदीन के छोटे भाई फ़क़ीर इमामउद्दीन की निगरानी यह क़िला सरदार शमशेर सिंह से बनवाया गया था।सरदार शेरसिंह गांव ठेठर, जिला लाहौर का निवासी था । उसका देहांत सन् 1824 में हुो गया था। क़िला तैयार होने पर उन्हें पहला किलेदार नियुक्त किया गया और पूरे 8 माह तक यहां सेवाएं देने के बाद उन्हें क़िला नूरपुर का क़िलेदार नियुक्त कर दिया गया था। उनके बाद फ़क़ीर इमामउद्दीन सन1840 तक इस क़िले के सिविल गर्वनर रहे। ग्रिफ़न एंड मैसे, चीफ़्स एंड फ़ैमेलीज़ आफ़ नोट, पृष्ठ 421 के अनुसार महाराजा रणजीत सिंह के देहांत के बाद फ़क़ीर इमामउद्दीन की जगह सरदार लहिणा सिंह मजीठिया को क़िला गोबिंदगढ़ का सिविल गर्वनर नियुक्त किया गया।
क़िले के निर्माण पर खर्च हुए साढ़े तीन लाख रूपए
क़िला गोबिंदगढ़ के निर्माण से पहले अंदाज़ा लगाया जा रहा था कि इसके निर्माण में कम से कम तीन वर्ष लगेंगे। जबकि हज़ारों कारीगरों से दिन रात काम करवाते हुए इसका निर्माण क़रीब 11 माह में ही ,दिसम्बर 1809 में मुकम्मल हो गया था। क़िले के निर्माण पर कुल 3 लाख 50 हज़ार रूपए खर्च हुये। शुरूआत में क़िले की सुरक्षा के लिए यहां 200 सैनिकों के रहने का प्रबंध किया गया था।
महाराजा ने रखा था क़िले का नाम
जब क़िला पूरी तरह से तैयार हो गया तो इसके उदघाटन के लिए विशेष दरबार का आयोजन किया गया। जिस में गुरू ग्रंथ साहिब का अखंड पाठ की हो जाने के बाद महाराजा रणजीत सिंह ने क़िले का नामकरण करने की इच्छा व्यक्त की। लंबे विचार-विमर्श के बाद रणजीत गढ़, कोट खड़क गढ़ तथा शेर गढ़ नाम मुख्य तौर पर पेश किए गए। सबकी राय सुनने के पश्चात महाराजा ने कहा कि क़िले का नाम गुरू गोबिंद सिंह जी के नाम पर ‘क़िला गोबिंदगढ़’ रखा जाएगा।
बैरून चाल्र्स हूगल, ‘ट्रैवलर्ज़ इन कश्मीर एंड पंजाब’ के पृष्ठ 340 पर लिखते हैं कि मंदिर (हरिमंदिर साहिब) की सुरक्षा के लिए क़िला बनवाना बहुत ज़रूरी हो गया था। लाहौर को जाने वाले मुख्य मार्ग पर स्थित होने के कारण, इस क़िले से दुश्मन का मुकाबला किया जा सकता था। स्टीन बाॅश ने अपनी पुस्तक ‘दी पंजाब’ के पृष्ठ 5 पर लिखा है कि महाराजा के लिये, अपने राज्य की ताक़त क़ायम रखने के लिए इस क़िले का निर्माण बहुत ज़रूरी हो गया था। इसलिए महाराजा ने चाल्र्स मैटकाॅफ़ के जाने के बाद क़िले की सुरक्षा की तरफ़ विशेष ध्यान देते हुए क़िले की मज़बूती पर लाखों रूपए खर्च किए थे।
जिसके पास क़िला गोबिंदगढ़, वही सल्तनत का मालिक
मराठा प्रमुख जसवंत राय होल्कर, अंग्रेज़ों से पराजित होने के बाद अपनी जान बचाने के लिये महाराजा रणजीत सिंह की शरण में अमृतसर आए थे। तभी उन्होंने महाराजा को सलाह दी थी कि वह अपना ख़ज़ाना इसी क़िले में रखें । महाराजा रणजीत सिंंह जब भी अमृतसर आते थे , अपना कोहे नूर हीरा भी इसी क़िले में, मिसर बस्ती राम के पास रखते थे। जिसकी बाक़ायदा उन से रसीद प्राप्त की जाती थी। महाराजा का पूर्ण विश्वास था कि जिसके पास क़िला गोबिंदगढ़ है, वही सल्तनत का मालिक है। ख़ालसा राज्य के दौरान ज़्यादा देशी और विदेशी महमानों को क़िला बाहर से ही दिखाया जाता था। अन्दर जाने की मंज़ूरी सिर्फ़ महाराजा के कुछ प्रमुख जरनलों को ही थी। दस्तावेज़ों में दर्ज है कि जब सन 1823 में महाराजा रणजीत सिंह बीमारी की हालत में रामबाग में आराम कर रहे थे, तो इस स्थिति का फ़ायदा उठाते हुए बुध सिंह संधावालिया सहित कुछ अन्य स्वार्थी लोग क़िले के अन्दर जाना चाहते थे। परन्तु जमादार दयाराम और क़िलेदार इमामउदीन ने उनकी कोशिशों को कामयाब नहीं होने दिया।
कमांडर इन चीफ़ सर हैनरी फ़ैन को 6 मार्च 1837 में यह क़िला अन्दर से दिखाया गया और उन्हें तोपों की सलामी भी दी गई थी। अर्ल आफ़ आकलैंड के मिलिट्री सचिव डब्लयू.जी. उस्बर्न अपनी पुस्तक ‘दी कोर्ट एंड कैंप आफ़ रणजीत सिंह’ के पृष्ठ 218 पर लिखते हैं कि जब सन 1839 में उन्होंने क़िला गोबिंदगढ़ अन्दर से देखा तो क़िले में 12 करोड़ का खज़ाना मौजूद था। सिख राज्य के समय क़िले के भीतर ही तांबे तथा चांदी के सरकारी सिक्कों की टकसाल हुआ करती थी।
बोसवर्थ स्मिथ अपनी पुस्तक ‘द लाईफ़ आफ़ लाॅर्ड लाॅरैंस ’ के पृष्ठ 138 पर सन 1857 में पैदा हुई स्थिति के मद्देनज़र लिखा था कि अगर ब्रिटिश यह चाहते कि पंजाब उनके हाथों से न निकल पाये तो उनके लिये क़िला गोबिंदगढ़ पर काबू रखना बहुत ज़रूरी है। उक्त बयान से पता चलता है कि ब्रिटिश भी इस हक़ीक़त से वाक़िफ़ हो चुके थे कि जिस के पास किला गोबिंदगढ़ है, वही सल्तनत का मालिक है।
क़िले के बाहर हुआ करती थी मोती झील
सन 1850 से पहले क़िला गोबिंदगढ़ के सामने ‘मोती झील’ हुआ करती थी, जो क़िले से शुरू होकर शहर के दरवाज़ा रामबाग़ तक जाती थी। डब्ल्यू.एल.एम. जोरज़ ‘हिस्ट्री आफ़ द सिख्स’, अंक एक,पृष्ठ 19, पर लिखते हैं कि मोती झील से पानी लेकर गोबिंदगढ़ क़िले की बाहर वाली खाई में भरा जाता था। क़िले के अंदर इस्तेमाल में लाया जाने वाला पानी भी इसी झील से लिया जाता था। जेम्स कोले ‘लाॅर्ड हारडिंंग्ज़ टूर’ के पृष्ठ 104 पर लिखते हैं कि क़िले की परछाईं झील में नज़र आती थी। जिससे बाहर से आए दुश्मन को आसानी से ये पता चल जाता था कि किले में कितनी सेना और कितने हथियार हैं। इसी लिए बाद में इस झील को मिट्टी से भर दिया गया।
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