कहानी नामधारी सिखों के संघर्ष की

कहानी नामधारी सिखों के संघर्ष की

14 जून, सन 1871…देर रात का समय रहा होगा। दस नामधारी (कूका) सर्वश्री लहिणा सिंह, बहीला सिंह संधू नारली, फ़तह सिंह भाटड़ा, हाकम सिंह पटवारी, झंडा सिंह ठट्टा, लहिणा सिंह लोपोके और लाल सिंह सिपाही आदि,दबे पांव अमृतसर के श्री दरबार साहिब की दीवार के साथ सटे क़साईखाने (कसाईयों के अस्थाई निवास के लिए बनाए क्वार्टर) में पहुँचे और वहां क़त्ल करने के इरादे से बंधी गायों के रस्सियां खोलकर उन्हें रिहा कर दिया। आवाज़ सुनकर जब क़साईयों की नींद खुली, तो उन्होंने नामधारी सिखों  पर हथियारों से हमला बोल दिया। नामधारी सिख हमले से बचाव के लिए पहले से ही तैयार थे। इसी वजह से उनमें से एक-दो सिंहों को महज़ थोड़ी बहुत चोटें ही आईं, जबकि इस लड़ाई में चार क़साई पीरा, जियूना, शादी और अमामी मारे गए और अन्य तीन क़र्मदीन, इलाही बख्श तथा खीवा बुरी तरह से ज़ख्मी हो गए।

इसमें शक नहीं है, कि इन चारों क़साईयों की हत्या, क़साईखाने में गायों की रक्षा के लिए पहुँचे नामधारी सिखों के हाथों ही हुई थी। इसी जुर्म की वजह से नामधारी सिखों में से कुछ को फांसी और कुछ को कालेपानी की सज़ा भी हुई थी। लेकिन सच यह है, कि इसके लिए ज़िम्मेदार न तो क़साई थे, और न ही नामधारी सिख। इस घटना के लिए अगर कोई क़सूरवार था, तो वह थी अंग्रेज़ हुकूमत। इसका पहला बड़ा कारण यह था,  कि शहर के हिन्दू,सिखों और मुसलमानों के बार-बार मना करने के बावजूद, अंग्रेज़ी सरकार ने अमृतसर के लाहौरी गेट के बाहर गौ-वध के लिए बूचड़खाना खोल दिया था। दूसरा बड़ा कारण यह था, कि श्री दरबार साहिब की बाहरी दीवार के साथ घंटा घर पुलिस चौकी के पास, क़साईयों की रिहायश के लिए मकान बनाए गए थे। इस तरह से उन्होंने हिंदू और सिखों की धार्मिक भावनाओं  की खिल्ली उड़ाने का जोखिम उठाया था।

इतिहास पर नज़र डालने पर पता चलता है, कि शेरे-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने जब अंग्रेज़ों के साथ संधि की थी, तो उसमें एक शर्त यह भी थी, कि उनकी रियासत में ब्रितानवी फ़ौजी गौ-वध नहीं करेंगे। इसी वजह से सिख हुकूमत के दौरान किसी ईसाई या मुसलमान ने गौ-हत्या नहीं की थी। लेकिन पंजाब में सिख रियासत समाप्त होने के साथ ही ब्रितानवी हुकूमत का षडयंत्रकारी दौर शुरू हो गया, और उन्होंने पंजाब की जनता के सामने अपनी घिनौनी सोच ज़ाहिर करनी शुरू कर दी।

अपने आर्थिक स्वार्थ और हिंदू,सिखों और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक दूरी बढ़ाने के उद्देश्य से पंजाब प्रशासनिक बोर्ड ने 5 मई,सन 1849 को एक आदेश  जारी किया, जिसके तहत, पंजाब के सभी ज़िलों में मुसलमानों और ईसाइयों को गौ-वध की अनुमति दे दी गई। हालांकि इस पत्र के साथ यह भी हिदायत दी गई थी, कि बूचड़खाने शहर से बाहर खोले जाएंगे और गौ-मांस शहर में आम दुकानों पर सरेआम या गलियों-बाज़ारों में आवाज़ें लगाकर नहीं बेचा जाएगा। इस आदेश का पालन न करने वालों के खिलाफ़ सख़्त कार्रवाई की बात भी कही गई थी।

लेकिन वह हिदायत बे-मानी साबित हुई, और इस पर कोई ख़ास अमल नहीं किया गया। बल्कि इस आदेश के दो सप्ताह बाद ही गवर्नर जनरल ने, 20 मई,सन 1849 को एक और हुक्म जारी कर दिया, जिसमें कहा गया कि जिन रीति-रिवाजों को पड़ोसी का धर्म इजाज़त देता है, उस में किसी अन्य को दख्लअंदाज़ी की अनुमति नहीं होगी। इस आदेश के ज़रिए, एक तरह से मुसलमानों को खुले आम गौ-वध की मान्यता मिल गई थी। इसके बावजूद हिंदू और सिखों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखते हुए शहर के मुसलमानों ने अमृतसर शहर में कोई बूचड़खाना नहीं खोला। इसी के साथ देश की हर फ़ौजी छावनी के पास बूचड़ख़ाने, शराबख़ाने और तवायफ़ों के कोठे खुलवाए गए।

जब अमृतसर में मुसलमानों ने बूचड़खाने नहीं खोले, तो अंग्रेज़ी हुक्मरानों ने उसे एक तरह से सरकारी नीति का विरोध माना । हाई कमान के आदेशों का पालन करते हुए अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर एल. सांडरस  ने अमृतसर के चौधरी राय तख़त मल और शहर के अन्य हिन्दू पंचों के साथ मीटिंग करके, सरकारी शर्तों के अधीन उन्हें लाहौरी गेट के बाहर किला गोबिंदगढ़ की फ़ौजी छावनी के पास बूचड़खाना खोलने के लिए राज़ी कर लिया। कुछ वर्ष पहले तक वहां बक्कर मंडी हुआ करती थी। इस बूचड़खाने के शुरू होते ही सरकारी आदेशों की धज्जियां उड़ाते हुए शहर की गली-बाज़ारों में सरेआम आवाज़ें लगाकर रेहड़ियों पर गौ-मांस बिकने लगा। जिसके लिए क़साईयों और गौ-मांस बेचने वालों के विरूद्ध वक़्त-वक़्त पर डिप्टी कमिश्नर एल. सांडरस की अदालत में, डी.सी. जे. डेनिसन, और डी.सी. फ्रेडरिक हेनरी कूपर की अदालत में और इसके बाद अलग-अलग अदालतों में मुक़द्दमे दर्ज कराए गए, लेकिन दोषियों के विरूद्ध सरकार का रूख़ नर्म ही रहा और उनके ख़िलाफ़ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई।

सन 1871 तक इसी तरह मुक़द्दमेबाज़ी और अंग्रेज़ सरकार की सरपरस्ती में शहर के गली-बाज़ारों में गौ मांस बेचने का दौर चलता रहा। उन्हीं दिनों यह अफ़वाह फैल गई कि अंग्रेज़ सरकार अमृतसर में तीन-चार और बूचड़ख़ाने खोलने जा रही है, जिनमें से एक श्री दरबार साहिब के बाहर भी खोला जाएगा। बताते हैं, कि उसी दौरान बाबा बीर सिंह नौरंगाबादी के सेवक भाई देवा सिंह को श्री दरबार साहिब की परिक्रमा में एक हड्डी पड़ी मिली। जिसे देख उनका मन विचलित हो उठा। उन दिनों श्री दरबार साहिब की परिक्रमा में आमतौर पर कुत्ते, भैंसें, गाय तथा आवारा पशु घूमते देखे जाते थे। हो सकता है, वह हड्डी कोई जानवर या उड़ता हुआ पक्षी  वहां फेंक गया होगा। दुखी और परेशान होकर जब भाई देवा सिंह ने बूचड़ख़ाने के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई, तो उन्हें लोगों को उकसाने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया गया, और तीन साल क़ैद की सज़ा सुना दी गई।

इसके बाद 8 मई,सन 1871 को जब शहर के हिंदुओं ने गौ-वध करने वाले और गौ मांस बेचने वाले मुसलमानों को समझाने की कोशिश की, तो अगले दिन शहर के 22 हिंदुओं को, मुसलमानों को डराने-धमकाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।अमृतसर की आबो-हवा में फैल रही इस बेअमनी को भाँपते ही अमृतसर डिवीजन के कमिश्नर डब्ल्यू. जी. डेविस ने 22 मई,सन 1871 को अमृतसर के टाऊन हाल में, शहर की म्यूनीसिपल कमेटी के सदस्यों की एक मीटिंग बुलाई। शहर में हिंदू-मुस्लिम तनाव ख़त्म करने के लिए, कमेटी के हिंदू-मुस्लिम सदस्यों ने एकमत से सलाह दी, कि कम से कम एक वर्ष के लिए बूचड़खाने बंद कर दिए जाने चाहिए। उनका यह मशवरा डेविस की सोच से बिल्कुल हट कर था, क्योंकि उसकी योजना तो इन दोनों क़ौमों को भड़काने की थी। लिहाज़ा उसने मुसलमानों की आज़ादी का ज़िक्र करते हुए कहा, कि अंग्रेज़ी हुकूमत किसी को भी, किसी दूसरे के धर्म में दख्लअंदाजी नहीं करने देंगे। इस लिए बूचड़खाने ज्यों के त्यों क़ायम रहेंगे। उसके इस एक-तरफ़ा फ़ैसले से हिंदू-मुसलमान दोनों बिल्कुल सहमत नहीं थे, लेकिन उन्हें मजबूरन इस सरकारी फ़ैसले की हिमायत करनी पड़ी।

एक ओर जहां शहर के हिंदू-सिख शहर में गौ-वध और गौ मांस की बिक्री को लेकर सरकार से ख़फ़ा थे, वहीं अंग्रेज़ी सरकार ने उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने के लिए सन 1860 से सन 1870 के दौरान अमृतसर में ईसाई धर्म के प्रचार के लिए, एक के बाद एक कई ईसाई धर्म से जुड़ी इमारतों का निर्माण शुरू कर दिया। इसी के तहत सन 1862 में श्री दरबार साहिब की परिक्रमा में मौजूद महाराजा रणजीत सिंह के पौत्र कंवर नौनिहाल सिंह के बुंगों और इसके साथ वाले एक अन्य बुंगे को तोड़कर वहां वहां 145 फ़ुट ऊँचा गिरजाघर-नुमा, लाल रंग का घंटा-घर बनवा दिया। इस भवन का निर्माण, अमृतसर की म्यूनीसिपल कमेटी के चीफ़ इंजीनियर जॉन गार्डन से करवाया गया था।

रेड टॉवर/घंटा-घर की तस्वीर

शहर के हिंदू-सिखों ने घंटा-घर के निर्माण का जमकर विरोध किया। लेकिन उसे नज़रअंदाज़ करते हुए अंग्रेज़ी हुकूमत ने इस स्मारक का निर्माण कार्य तो जारी रखा, लेकिन वहां गिरजाघर बनाने का इरादा बदल दिया। सन 1874 में इस रेड् टॉवर के आगे बने थड़े को बड़ा करने और इसके साथ पुलिस चौंकी बनवाने के लिए परिक्रमा में मौजूद तीन अन्य बुंगों; बुंगा संगतपुरिया, बुंगा भाई तारा सिंह पठानकोटिया और बुंगा माली सिंह चिरागी को भी गिरा दिया गया।

इस रेड टॉवर को, श्री दरबार साहिब में मौजूद बेरी बाबा बुढ़ा जी के बिल्कुल पीछे क़रीब 10 फ़ुट ऊँचे थड़े पर बनाया गया था। इसकी सीढ़ियां श्री दरबार साहिब की परिक्रमा तक पहुंचती थीं ,और इसके बनने के बाद ज़्यादातर श्रद्धालु इसी रास्ते दरबार साहिब में माथा टेकने पहुँचते थे। रेड टॉवर का मुख्य-द्वार बाज़ार कटरा आहलुवालिया के बिल्कुल सामने था। इस के सामने तांगा स्टैंड था, और दाएं हाथ पर हलवाईयों की दुकानें थीं, जिनपर से श्री हरिमंदिर साहिब में चढ़ाने के लिए कड़ाह-प्रसाद मिलता था। यह सारी भूमि म्यूनीसिपल कमेटी की मलकियत बन चुकी थी।

उसी दौरान शहर के लाहौरी गेट के बाहर बनाए गए बूचड़ख़ाने में काम करने वाले क़साईयों की रिहायश का प्रबंध इसी रेड टॉवर से सटी एक पुरानी सराय में किया गया। बूचड़खाने में काम करने वाला कोई भी क़साई अमृतसर का निवासी नहीं था। बल्कि उन्हें मलेरकोटला, सहारनपुर तथा अन्य शहरों से महज़ इसी काम के लिए यहां बुलाया गया था। उन दिनों लाहौरी गेट के आस-पास कोई रिहायशी आबादी नहीं थी। इसी वजह से उनकी रिहायश और गायों को रखने के लिए वहां कोई उचित जगह नहीं थी। हो सकता है, कि इस बात को ध्यान में रखते हुए क़साईयों के रहने और उन्हें सुरक्षा देने के लिए, घंटा-घर पुलिस चौकी के साथ सटी सराय में उनके रहने का बंदोबस्त किया होगा।

क़साईयों के वहां रहने के कारण ही उस सराय को क़साईख़ाना कहा जाने लगा होगा। उस दौर की जो भी   तस्वीरें उपलब्ध हैं, उनमें श्री दरबार साहिब की परिक्रमा, रेड टॉवर के थड़े और रेड टॉवर के साथ सटे बाज़ार में हर जगह गायें घूमती दिखाई देती हैं। हो सकता है, वह क़साईयों की गाये ही रही होंगीं।

रेड टॉवर के थड़े पर बैठे लोग और गायों की तस्वीर

खैर, 14 जून सन 1871 की रात नामधारी सिखों ने क़साईयों पर श्री दरबार साहिब की दीवार के साथ सटी इसी इमारत पर हमला किया था और वहां बंधी गायों की रस्सियां काटकर उन्हें आज़ाद कर दिया। इस हमले में कई क़साई मारे गए और कुछ ज़ख्मी हो गए थे। जब हमले के असल दोषियों का पता न चल पाया, तो 12 निर्दोष लोगों को गिरफ़्तार किया गया, और अंग्रेज़ों की अदालत ने उन्हें फांसी की सज़ा सुना दी। लेकिन नामधारी सतगुरू बाबा राम सिंह जी के आदेश पर इस केस के असल ज़िम्मेदार नामधारी सिख डिप्टी कमिश्नर की अदालत में पेश हो गए।

उस समय अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर की अदालत महाराजा रणजीत सिंह के रामबाग़ (कंपनी बाग) स्थित समर पैलेस में हुआ करती थी। जब यह लोग ख़ुद अदालत में पेश हो गए, तो अदालत ने इसे अपनी तौहीन माना और नामधारी सिखों के विरूद्ध झूठे गवाह खड़े करके मुक़द्दमा चलाया गया। उसके बाद, एक विशेष हुक्म जारी करके चार नामधारी सिखों सरदार लहिणा सिंह नामधारी, बहीला सिंह नारली, हाकम सिंह पटवारी और फ़तह सिंह को, 15 सितम्बर,सन 1871 को फांसी पर लटकाए जाने और अन्य दो सिखों को कालेपानी की सज़ा सुनाई गई।

जब नामधारी सिखों को फांसी देने से पहले उनकी आखिरी इच्छा पूछी गई, तो उन्होंने दो फ़रमाइशें सामने रखीं। पहली यह कि फांसी से पहले उन्हें श्री हरिमंदिर साहिब के पवित्र सरोवर में स्नान करने का मौक़ा दिया जाए । दूसरा यह, कि उनकी फांसी का रस्सा गाय की चमड़ी का न होकर रेशम का होना चाहिए।

रामबाग़ (कंपनी बाग़) के मुख्य प्रवेश-द्वार की बाहरी ड्योढ़ी के साथ मौजूद एक विशाल वट् वृक्ष के साथ सब लोगों के सामने उन्हें फांसी पर लटका दिया गया। बताते हैं, कि फांसी का वो आलौकिक नज़ारा कुछ अलग ही था। एक ओर फांसी पर चढ़ने वाले नामधारी सिखों के परिजन और अन्य लोग रूहानियत का कीर्तन कर रहे थे, और दूसरी ओर खुद गले में फंदा डालकर एक-एक कर नामधारी सिख शहादत दे रहे थे।

नामधारी स्मारक

उक्त वट् वृक्ष को ‘शहीदी बोहड़’ नाम से जाना जाता है और नामधारी सिखों की शहादत के बाद यह वट् वृक्ष एक साधारण वृक्ष न रहकर सम्माननीय, इतिहासिक और पूजनीय वृक्ष बन चुका है। इसकी पृष्ठ भूमि से परिचित होने के बाद इसके क़रीब से गुज़रने वाले राहगीरों के सिर अपने-आप श्रद्धा से झुक जाते हैं। आज समस्त प्राणियों के लिए यह एक सम्मानजनक स्थान और तीर्थ बन चुका है और आज भी यह अंग्रेज़ी हुकूमत के विरूद्ध नामधारियों की  बग़ावत की गवाही दे रहा है।

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