कालिंजर क़िला और इसका अद्भुत इतिहास

खजुराहो के मंदिर अपनी उत्तेजक मूर्तियों और तांत्रिक विद्या लिये सारे विश्व में प्रसिद्ध हैं लेकिन इनके इतिहास के साथ ही अभेद्ध कालिंजर के क़िले का भी इतिहास जुड़ा हुआ है जो खजुराहो से क़रीब 120 कि.मी. दूर है। 800 फ़ुट ऊंची पहाड़ी पर स्थित इस क़िले पर पिछले 1500 सालों से किसी न किसी का कब्ज़ा रहा है। तीसरी सदी में में इस पर गुप्त राजवंश का कब्ज़ा था जबकि सन 1857 के विद्रोह के दौरान ये अंग्रेज़ों का सैन्य गढ़ हुआ करता था। इस क़िले को हथियाने की कोशिश में अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी मारा गया था और यहां कभी अकबर के विश्वासपात्र “ दरबार-रत्न” बीरबल भी रहा करते थे। भारत में ऐसे बहुत कम क़िले हैं जिनका इतना पुराना इतिहास हो या जो ढेर सारी ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा हो।

क़िले की उत्पत्ति

हमें ये तो नहीं पता कि क़िला कब बना था लेकिन आगरा और अवध की ज़िला विवरणिका के अनुसार गुप्त राजवंश के राजा समुद्रगुप्त ने वर्ष 336 में कालिंजर क़िला जीता था। लेकिन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के जनक एलेक्ज़ेंडर कनिंघम ने अपनी किताब “बुंदेलखंड एंड रीवा”- (1883-1884) में दावा किया है कि इस क़िले का निर्माण क़रीब वर्ष 249 के आसपास हुआ था। इसका नाम कालिंजर कैसे पड़ा इसे लेकर कनिंघम के पास एक दिलचस्प क़िस्सा है। उनका मानना है कि इसका इस्तेमाल शैव संप्रदाय के योगी शरण स्थल के रुप में करते होंगे और उन्होंने इसका नाम कालंजराद्री या कालिंजर पहाड़ी रखा होगा। कालिंजर भगवान शिव का एक नाम है जिसका मतलब होता है समय का क्षय (काल-समय, जर-क्षय)। कनिंघम इसकी तुलना ग्वालियर के क़िले से करते हैं जिसका नाम शैव योगी “ग्वालिप” के नाम पर रखा गया था जिन्होंने पहाड़ पर साधना की थी।

कालिंजर को प्रसिद्धी चंदेल राजवंश के शासन के दौरान मिली जिन्होंने 9वीं से लेकर 13वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर राज किया था। चंदेल साम्राज्य को जेजाकभुक्ति कहा जाता था जिसमें आधुनिक बुंदेलखंड के हिस्से आते थे। ये चंदेल राजवंश के संस्थापक राजा यशोवर्मन ही थे जिन्होंने कालिंजर क़िला जीता था लेकिन हमें ये नहीं पता कि उन्होंने कब और किससे ये क़िला जीता था। यशोवर्मन ने सन 925 और सन 950 के दौरान शासन किया था। खजुराहो उनकी राजधानी हुआ करती थी और कहा जाता है कि उन्होंने प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर उन्होंने ही बनवाया था।

मेहमूद ग़ज़नी का हमला

सन 1019 में कालिंजर एक बार फिर सुर्ख़ियों में तब आया जब मेहमूद ग़ज़नी ने भारत पर अपने दसवें हमले के दौरान चंदेल सम्राज्य ख़ासकर कालिंजर पर धावा बोला। इस संबंध में कनिंघम, अकबर के दरबार के प्रमुख इतिहासकार निज़ामउद्दीन अहमद (1551-1621) का हवाला देते हैं:

“सुल्तान जब अपने शिविर पहुंचा तो उसने अपना एक दूत राजा नंदा के पास भेजा और उससे उसके (ग़ज़नी) के प्रति निष्ठा जताने और इस्लाम धर्म क़बूल करने को कहा। नंदा ने ऐसा करने से इनकार कर दिया और युद्ध की तैयारी करने लगा। सुल्तान ने ऊपर से जब नंदा की बड़ी सेना देखी तो उसे अफ़सोस हुआ कि वह इतनी दूर तक क्यों आ गया। उसने ख़ुदा के सामने सजदा कर कामयाबी और जीत की दुआ मांगी। जब रात हुई तो नंदा के दिल में डर पैदा हो गया और वह सब कुछ छोड़कर अपने कुछ ख़ास लोगों के साथ भाग गया। इस बारे में जब सुल्तान को पता चला तो वह अकेले घोड़े पर सवार होकर निरीक्षण पर निकल पड़ा। जब उसे विश्वास हो गया कि कोई घात लगाकर नहीं बैठा है और इसके पीछे कोई साज़िश नहीं है, तो उसने लूटपाट और मारकाट शुरु कर दी। ग़ज़नी की फ़ौज के हाथों ख़ूब माल लगा। वह नंदा के 580 हाथी भी अपने साथ ले गए जो पास के जंगलों में थे। कामयाबी औऱ जीत के बाद सुल्तान वापस ग़ज़नी लौट गया।”

लेकिन इस घटना के बारे में वास्तविक हमले के सैंकड़ों सालों के बाद लिखा गया था और हो सकता है कि ये पूरी तरह सही न हो। इस घटना में जिस राजा नंद का ज़िक्र किया गया है वह गंधदेव था जिसने 11वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में चंदेल साम्राज्य पर शासन किया था।

शेर शाह सूरी की मृत्यु

चंदेल राजवंश ने कालिंजर पर सन 1202 तक राज किया। सन 1202 में क़ुतुबउद्दीन ऐबक की सेना ने परमारदी देव से कालिंजर क़िला जीत लिया और चंदेल राजवंश का शासन हमेशा के लिये ख़त्म कर दिया। इस तरह क़िला दिल्ली सल्तनत का हिस्सा बन गया। लेकिन जल्द ही इस पर चंदेलों का फिर कब्ज़ा हो गया। शायद सन 1210 से सन 1211 के बीच आराम शाह की कमज़ोर होती सत्ता के कारण ये जल्दी ही वापस चन्देलों के हाथ आ गया। चन्देलों का ये परिवार अपने वंश की चोटी-सी शाखा थी जिसने कालिंजर के आस पास छोटे से इलाक़े पर राज किया था।

नवंबर सन 1544 में, दिल्ली के अफ़ग़ान शासक शेर शाह सूरी ने कालिंजर पर हमला किया। तब कीरत राय चंदेल राजा हुआ करते थे जिनकी पुत्री रानी दुर्गावती का विवाह गढ़-मंडला के राजा दलपत के साथ हुआ था। शेर शाह सूरी द्वारा घेराबंदी के दौरान कीरत राय की, शक्तिशाली गोंड साम्राज्य ने सहायता की। यह घेराबंदी एक साल से ज्यादा समय तक चली। कालिंजर की दीवारें बहुत मज़बूत थीं। इसे तोड़ने के लिये 22 मई सन 1545 को मिज़ाइल की तरह का एक गोला दाग़ा गया जो दीवार से टकराकर वापस और बारुद के एक ढेर पर गिर गया जो शेर शाह सूरी के पास ही था। विस्फोट में शेर शाह सूरी बुरी तरह जलकर ज़खॉमी हो गया और उसी दिन उसकी मृत्यु हो गई।

बीरबल और छत्रसाल का घर: कालिंजर क़िला

शेर शाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह ने उसी साल क़िले पर कब्ज़ा कर लिया और क़िले के अंदर रहने वाले सभी लोगों की हत्या करने का आदेश दिया। सन 1569 में अकबर ने क़िले पर कब्ज़ा कर लिया और जागीर के रुप में इसे अपने प्रिय वज़ीर बीरबल को दे दिया। बीरबल (1528-1586) का असली नाम महेश दास था और वह बुंदेलखंड के कालपी क्षेत्र के थे जो कालिंजर से क़रीब 200 मील दूर है। बीरबल सन 1586 तक यानी अपने निधन तक इसी क़िले में रहे। बीरबल को दौर में, कालिंजर मे क्या स्थितियां रहीं इसके बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।

सन 1688 में बुंदेला हीरो राजा छत्रसाल ने मुग़लों से क़िला छीन लिया। राजा छत्रसाल ने बुंदेलखंड में अपने लिये एक साम्राज्य बना लिया था। मस्तानी उनकी बेटी थीं जिन्होंने मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम से शादी की थी। औरंगज़ेब के पुत्र और उत्तराधिकारी बहादुर शाह ने आधाकारिक रुप से कालिंजर राजा छत्रसाल को सौंप दिया था।

ये क़िला बुंदेलों के पास सन 1812 तक रहा। इस बीच अंग्रेज़ों को लगा कि क़िला बहुत महत्वपूर्ण है औऱ इसे भारतीयों के हाथों नहीं छोड़ा जा सकता। इस पर कब्ज़े के लिये अंग्रेज़ों ने कर्नल मार्टिनडेल के नेतृत्व में एक सेना भेजी जिसने क़िले पर बमबारी की। आख़िरकार 8 फ़रवरी सन 1812 में बुंदेलों ने हथियार डालकर क़िला अंग्रेज़ों को सौंप दिया।

क़िले पर कब्ज़ा करने के बाद अंग्रेज़ों ने इसे सेना का ठिकाना बना दिया। सन 1857 की बग़वत के दौरान भारतीय स्वतंत्रता सैनानियों ने क़िला जीतने के कई प्रयास किये लेकिन क़िले की मज़बूत दीवारों की वजह से ये संभव नहीं हो सका। बांदा ज़िले में यही एकमात्र जगह थी जो अंग्रेज़ों के कब्ज़े में थी। विडंबना ये है कि जिस दीवार ने अंग्रेज़ सेना को बचा कर रखा था उसे अंग्रेज़ों ने सन 1866 में तुड़वा दिया ताकि भविष्य में कोई विद्रोह न हो।

कनिंघम ने जब यहां खुदाई करवाई तब क़िले के प्राचीन होने का एहसास हुआ था। सन 1904 से ये क़िला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में है।

आज क़िले में मंदिर, जलाशय, मस्जिद, मक़बरे, प्रवेश-द्वार और महल जैसे कई स्मारक हैं। क़िले की तरफ़ जाने वाला प्रवेश-द्वार अद्भुत है। क़िले का मुख्य आकर्षण नीलकंठ मंदिर है जिसे बुंदेला राजा परमारदी देव (1165-1203) ने बनवाया था। मंदिर एक गुफा के अंदर है जिसमें दो काले लिंग हैं- प्रत्येक लिंग शिव और उनकी पत्नी पार्वती का प्रतीक है। मंदिर के सामने मंडप पर सुंदर नक़्क़ाशी है। इसी तरह काल भैरव की 24 फ़ुट ऊंची मूर्ति भी दिलचस्प है। इसमें काल भैरव के 18 हाथ हैं। इसका उल्लेख अबुल फ़ज़ल के आईन-ए-अकबरी में भी मिलता है। यहां एक बड़ा जलाशय है जिसे कोटी-तीर्थ कहते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि इसमें स्नान करने से कुष्ठ रोग ठीक हो जाता है।

कालिंजर क़िले में परत दर परत इतिहास दबा पड़ा है लेकिन हर साल खजुरहो जाने वाले सैलानी इस क़िले में आने की ज़हमत नहीं उठाते हैं जो कभी बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था।

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