कुष्ठ रोग, गांधी और परचुरे शास्त्री

कुष्ठ रोग, गांधी और परचुरे शास्त्री

महाराष्ट्र के सेवाग्राम गांव का ज़िक्र आते ही शांति का अनुभव होने लगता है। ऐसा लगता है मानो महात्मा गांधी अभी भी यहां हैं। उत्तर-पूर्व महाराष्ट्र में वर्धा ज़िले में स्थित सेवाग्राम गांव में गांधी जी सन1936 से……..तक रहे थे। सेवाग्राम महात्मा का मध्य भारत में एक ठिकाना था जिसमें कई कुटियाएं और उनकी ज़रुरत के मुताबिक़ अन्य कक्ष थे।

सेवाग्राम में परचुरे कुटी | jamnalalbajajfoundation.org

इन्हीं कक्षों में बांस का एक कैबिन है जिस पर लिखा है “परचूर कुटी”। घासफूंस की चटाई और छप्पर वाली कुटिया “बापू कुटिया” के पास है जहां ख़ुद बापू रहते थे। ये महात्मा के मित्र, संस्कृत के विद्वान, कवि और स्वतंत्रता सैनानी परचुरे शास्त्री का आवास था।

अस्पृश्यता और जातिगत भेदभाव के ख़िलाफ़ महात्मा गांधी के संघर्ष को सब जानते हैं लेकिन इस कुटिया में उन्होंने कुष्ठ रोग से ग्रस्त परचुरे शास्त्री की ख़ुद सेवा कर अस्पृश्यता के ख़िलाफ़ एक अलग तरह की लड़ाई लड़ी।

उस समय समाज में कुष्ठ रोग के मरीज़ों को न सिर्फ़ अछूत समझा जाता था बल्कि इस बीमारी का धार्मिक संबंध भी था। हिंदु शास्त्रीय परंपराओं के अनुसार कुष्ठ रोग इस जन्म या फिर पूर्व जन्म के पापों का फल होता है। इस परंपरा के मुताबिक कुष्ठ रोगी के सामाजिक तिरस्कार की इजाज़त है और इस तरह वे हिंदु समाज में अपनी पहचान भी खो देते हैं।

गांधी जी का मानना था कि साधारण मगर शक्तिशाली करुणा भाव से की जाने वाली सेवा से इस प्राचीन और घिनौनी परपंरा के प्रति लोगों का नज़रिया बदला जा सकता है। परचुर शास्त्री सन 1939 में सेवाग्राम में आए थे और सन 1942 तक वहां रुके थे। उनके आगमन के पहले दिन से ही बापू उनके घावों को धोकर उनकी तीमारदारी करने लगे थे।

सेवाग्राम आश्रम में परीक्षित शास्त्री का परीक्षण होते हुए  | कनु गांधी द्वारा फोटो, gandhimedia.org

सन 1932 में गांधी के नमक सत्याग्रह के दौरान कई नेताओं को गिरफ़्तार किया गया था और उनमें शास्त्री भी थे। इन लोगों को पुणे की यरवाडा जेल में रखा गया था लोकिन चूंकि शास्त्री को कुष्ठ रोग था इसलिए उन्हें अलग कोठरी में रखा गया था। गांधी जी उनसे मिलने की दरख़्वास्त करते थे लेकिन उसे हमेशा ख़ारिज कर दिया जाता था। फिर बापू उन्हें ढांढ़स बंधाने के लिये पत्र लिखने लगे थे।

गांधी जी ने 20 सितंबर से 26 सितंबर सन 1932 तक आमरण अनशन किया था और जब उन्होंने ये अनशन ख़त्म किया तब उनके क़रीबियों में दो लोग थे, रविंद्रनाथ टैगोर और शास्त्री। आमरण अनशन के बाद पुना संधि हुई थी और इसके पहले शास्त्री ने उपनिषद के श्लोकों का पाठ किया था।

परचुरे की सेवा करते हुए गांधी - 1940 | कनु गांधी द्वारा फोटो, gandhimedia.org

शास्त्री जब सेवाग्राम आए थे तब उनका कुष्ठ रोग बहुत बढ़ चुका था लेकिन गांधी जी की तीन साल की सेवा के बाद उनकी सेहत न सिर्फ़ ठीक हो गई बल्कि उन्होंने ख़ुद सेवाग्राम में रहकर लोगों की सेवा की और इस दौरान कई विवाह भी करवाये।

महात्मा गांधी नर्सिंग पैराचर शास्त्री का कैरिकेचर | mkgandhi-sarvoday.org

Caricature of Mahatma Gandhi nursing Parchure Shastri (Source: mkgandhi-sarvoday.org)

महात्मा गांधी के निजी सचिव महादेव देसाई के पुत्र नारायण देसाई ने अपनी किताब “बापू की गोद में” (1969) में महात्मा गांघी और शास्त्री के बीच संबंधों के बारे में एक दिलचस्प बात लिखी है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि दूसरे विश्व युद्ध में भारतीय सेना को भेजने के मसले पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और अंग्रेज़ सरकार के बीच तनातनी चल रही थी। कांग्रेस, वायसराय लिनलिथगो के एक तरफा फ़ैसले का विरोध कर रही थी जिसने भारतीय नेताओं से परामर्श किये बग़ैर भारत को भी युद्ध का हिस्सा घोषित कर दिया था। इस वजह से गंभीर राजनीतिक संकट पैदा हो गया था। इस संकट के समाधान के लिये महात्मा गांधी और वाइसराय के बीच शिमला में सन 1939 में एक बैठक का आयोजन किया गया।

सेवाग्राम में बापू कुटी | विकिमीडिया कॉमन्स

महात्मा और अन्य नेता तथा कांग्रेस कार्यकर्ता शिमला पहुंच गए पर बैठक एक हफ़्ते के लिये स्थगित कर दी गई। बाक़ी लोग जहां पहाड़ों के ख़ूबसूरत नज़ारों का लुत्फ़ लेने के लिये वहीं रुक गए, गांधी जी ने वापस सेवाग्राम वापस जाने का फ़ैसला किया। जब उनके साथियों ने उनसे उनके इस फ़ैसले के बारे में पूछा और कहा कि शिमला और सेवाग्राम के बीच जितना फ़ासला है उसे देखते हुए वह (गांधी जी) सेवाग्राम में सिर्फ़ दो दिन ही रुक पाएंगे। इस पर बापू ने कहा कि कम से कम वह सेवाग्राम में दो दिन तो बिता पाएंगे।

जब साथियों ने गांधीडी से पूछा कि ऐसा क्या ज़रुरी काम है कि वह शिमला से वर्धा जा रहे हैं और फिर वहां से वापस आएंगे तो गांधी जी ने जवाब में एक सवाल पूछा, “मुझे लगता है कि आप भी परचुरे शास्त्री की सेवा करने को एक महत्वपूर्ण काम मानते हैं”। इस घटना पर टिप्पणी करते हुए नारायण देसाई ने कहा है कि गांधी की नज़र में परचुरे शास्त्री की सेवा करना उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि देश हित में वाइसराय से बात करना।

महात्मा गांधी को हमेशा इस बात का खेद रहा कि देश ने परचुरे शास्त्री की प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल नही किया क्योंकि कुष्ठ रोग की वजह से उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया गया था। शास्त्री को 21 जून 1944 को लिखे एक पत्र में गांधी जी ने कहा,” मुझे दुख है कि देश ने अपके ज्ञान का पूरा लाभ नहीं उठाया।“

परचुरे कुटी | Jamnalalbajajfoundation.org

परचुरे शास्त्री का पांच सितबंर सन 1945 को निधन हो गया। सेवाग्राम में वह जो कुटिया छोड़ गए थे वो याद दिलाती है कि करुणा और प्रेम मानव मस्तिष्क जैसी हठी चीज़ को भी बदल सकता है।

ऐसा नहीं है कि गांधी जी का शास्त्री की सेवा के दौरान कुष्ठ रोग से पहली बार सामना हुआ हो। प्रागजी दोसा लिखते हैं कि दक्षिण अफ़्रीका में सत्याग्रह आंदोलन के दौरान नाटल इंडियन कांग्रेस की स्थापना के मौक़े पर महात्मा गांधी नाटल में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। सभा स्थल पर उन्होंने देखा कि कुछ दूरी पर कुछ लोग एक पेड़ के नीचे खड़े होकर उन्हें ध्यान से सुन रहे हैं। गांधी जी ने उन्हें पास आने को कहा लेकिन वे नही नही आए तो गांधी जी ने ख़ुद उनके पास जाने का फ़ैसला किया। लेकिन गांधी जी जैसे ही उनकी तरफ़ बढ़ने लगे उनमें से एक ने चीखकर कहा “गांधी भाई हमारे पास मत आओ हम कुष्ठ रोगी हैं।”

इस बात को अनदेखी कर गांधी जी उनके पास गये। उनमें से कुछ लोगों की उंगलियां गल चुकी थीं, कुछ के पंजे और कुछ के बाल उड़ गये थे। गांधी जी ने जब उनसे उनके इलाज के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “कोई डॉक्टर हमारा इलाज नहीं करना चाहता है, हम कड़वे नीम से ख़ुद अपना इलाज करते हैं।” जब बापू ने पूछा कि इससे कोई फ़ायदा होता है तो उन्होंने कहा नहीं और ये कि वह धीमी मौत मर रहे हैं।

ये सुनकर महात्मा गांधी इतने द्रवित हो गए कि उन्होंने कुष्ठ रोगियां की सेवा करना अपना ध्येय बना लिया। इसे उन्होंने अपने 18 सूत्रीय कार्यक्रम में भी शामिल किया। इस संदर्भ में उन्होंने कहा, “अगर भारत एक नये जीवन की प्रतीक्षा कर रहा है, अगर हम जल्द से जल्द अहिंसा और ईमानदारी से आज़ादी मिलने के प्रति उत्साहित हैं तब भारत में कोई ऐसा कुष्ठ रोगी या भिखारी नही होगा जिसकी देखभाल नही होगी।”

भारत को आज़ादी मिले 73 वर्ष हो चुके हैं जिसके लिये अंतत: गांधी जी को अपना जीवन गंवाना पड़ा लेकिन जो संदेश ये महान नेता हम भारतीयों को देना चाहता था वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उस समय था जब गांधीजी अपने दोस्त के सिरहाने बैठकर करुणा और प्रेम के साथ उसकी सेवा कर रहे थे। बापू ने जो हमें संदेश दिए हैं उनमें शायद दया और प्रेम का संदेश सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण है।

हम आपसे सुनने को उत्सुक हैं!

लिव हिस्ट्री इंडिया इस देश की अनमोल धरोहर की यादों को ताज़ा करने का एक प्रयत्न हैं। हम आपके विचारों और सुझावों का स्वागत करते हैं। हमारे साथ किसी भी तरह से जुड़े रहने के लिए यहाँ संपर्क कीजिये: contactus@livehistoryindia.com

आप यह भी पढ़ सकते हैं
Ad Banner
close

Subscribe to our
Free Newsletter!

Join our mailing list to receive the latest news and updates from our team.

Loading