डीडवाना: मानव सभ्यता और राजस्थान के इतिहास का एक अज्ञात पहलू

डीडवाना: मानव सभ्यता और राजस्थान के इतिहास का एक अज्ञात पहलू

राजस्थान में गौरवशाली अतीत की कहानी कहने वाले, प्राचीन सभ्यताओं के अनगिनत अवशेष रेगिस्तान की रेत के टीलों में आज भी दबे पड़े हैं। लेकिन इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा, कि रेत के टीलों में दबे इन धरोहरों की खुदाई में ना तो विभाग रूचि ले रहा है और न ही पुरातत्ववेक्ता। इसीलिए इस तरह कई अति महत्वपूर्ण जगहों के मामले सरकारी फ़ाईलों में दफ़्न होकर रह जाते हैं। फिर इस काम के लिए बजट का अभाव सबसे बड़ा बहाना बन जाता है। आईये.. आज आपको एक ऐसे ही महत्वपूर्ण और प्राचीन स्थल के अनछुए पहलुओं से रूबरू करवाते हैं।

राजस्थान में आज से लगभग पांच हज़ार वर्ष पहले फली-फूली संस्कृति के निशान, राज्य में जगह-जगह हुई खुदाई के दौरान मिलते रहते हैं। इस प्रकार इन जगहों पर अभी तक हुई पुरातात्विक खोजबीन से यह बात साबित हो चुकी है, कि आज के राजस्थान ने समय के कई हैरान करने वाले प्राकृतिक परिवर्तन देखे हैं। राज्य का जो हिस्सा आज रेगिस्तान के रूप में जाना जाता है, वहां कभी घने वन हुआ करते थे। इसका सबूत जैसलमेर का काष्ठ जीवाश्म पार्क है, जो करोड़ों वर्ष के नैसर्गिक उथल-पुथल का साक्षात गवाह है। वहीं मारवाड़ की लूनी नदी-क्षेत्र में पुरातात्विक खुदाई से प्राप्त पाषाण युग के अवशेषों के भण्डार, यह सिद्ध करते हैं, कि यह भू-भाग अति-प्राचीन रहा है। यह क्षेत्र मानव सभ्यता के हर काल खंड की छाप संजोए हुए है। आईये आज नागौर ज़िले के डीडवाना में हुई खुदाई (16 आर) में मिले अवशेषों से रूबरू होते हैं।

मुख्य आस्था स्थल, जोगामण्डी | भंवर कसाणा

नागौर ज़िले का यह एक मात्र क़स्बा है, जहां आदि मानव (होमो इरेक्टस और सेपियन्स), जीवाश्म, प्रागैतिहासिक और पाषाणकाल के अलावा गुप्त, प्रतिहार से लेकर मुग़ल काल तक की जानकारियां मिलती हैं। यही क़स्बा “नाथ” सम्प्रदाय के गुरु गोरखनाथ, राजा भर्तृहरि, गोपीचंद और निरंजनी संप्रदाय के हरिपुरूष जैसे संत महात्माओं की तपोभूमि रहा है। यहीं से इतिहास के ठोस प्रमाण के रूप में ताम्रपत्र मिला है, जिसमें प्रतिहार शासकों की वंशावली अंकित है, और यहीं से श्रीहरि विष्णु की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इस प्रकार इस क़स्बे की प्राचीन गाथा, अन्य क़स्बों के मुक़ाबले ज़्यादा महत्वपूर्ण रही है।

डीडवाना और इसका समृद्ध इतिहास

डीडवाना, नागौर ज़िला मुख्यालय से 100 किमी. दूर सीकर मेगा हाईवे और डेगाना-रेवाड़ी रेल्वे मार्ग की उत्तर-पूर्व दिशा पर स्थित है। प्राचीन काल में इस क़स्बे को द्रुदवनक, डेण्डवानक और आभानगरी के नाम से भी जाना जाता था। डॉ. मोहनलाल गुप्ता बताते हैं, कि आठवीं शताब्दी में डीडवाना और उसके आस-पास का क्षेत्र प्रतिहार शासक वत्सराज के अधीन रहा था और प्रतिहारों के राज्य गुर्जर भूमि का एक ज़िला था। इसी क़स्बे के पास स्थित दौलतपुरा गांव से प्रतिहार राजा भोजदेव- प्रथम का एक ताम्रपत्र मिला है। यह ताम्रपत्र सन 843 का है। इसमें प्रतिहार शासकों की, महाराजदेव शक्ति से लेकर भोज देव-प्रथम तक की वंशावली दी गई है। यहीं से प्रतिहार कालीन योगनारायण विष्णु की बेमिसाल प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। इस क़स्बे से अन्य पुरातत्व सामग्री में मूर्तियाँ, शिलालेख, मृदभाण्डों के टूकड़े निकले हैं। जिनमें से कुछ सामग्री जोधपुर, बीकानेर, अजमेर और सीकर के राजकीय संग्रहालयों में रखी हैं।

डीडवाना झील में नमक उत्पादन | डॉ. अरूण व्यास

दसवीं शताब्दी में जैन संत जिनेश्वर सूरि ने डीडवाना में कथाकोष की रचना की थी। गुजरात के कुमारपाल चौलुक्य के गुरु, विख्यात जैन विद्वान हेमचन्द्र सूरि के गुरु श्री दत्त सूरि ने डीडवाना की यात्रा की तथा यहां के शासक यशोभद्र को उपदेश दिया था। राजा ने “चौबीस हिमालय” के नाम से एक विशाल जैन मंदिर का निर्माण करवाया, जो सन 1184 तक अस्तित्व में रहा था। सोमप्रभाचार्य ने इस जिनालय का उल्लेख भी किया है। बारहवीं सदी में सिद्धसेन सूरि के लिखे सकल तीर्थमाला में भी इस क़स्बे का सुन्दर वर्णन मिलता है। इतिहासकार श्रवण कुमार काकड़ा ने बताया, कि कई शताब्दियों तक प्राचीन इतिहास को अपने अंदर समेटे, इस आभानगरी में कई पुरातत्व-सामग्री के अलावा शैव, वैष्णव और जैन आदि सम्प्रदायों की मूर्तियां मिली हैं। यह प्राचीन क़स्बा वर्तमान जगह से कुछ दूर सिंघीबास और मेदासरबार के आस-पास बसा हुआ था। यह क़स्बा नाथ सम्प्रदाय का साधना और निरंजनी सम्प्रदाय का उद्गम स्थल माना जाता है। यहां गुरु गोरखनाथ, राजा भर्तृहरि, हरिपुरूष, भक्त शिरोमणि मीराबाई ,बुख़ारा के सुल्तान मुहम्मद इब्राहिम( हाडी भडंग ) की तपोभूमि और शिव भक्ति का प्रमुख साधना एंव आध्यात्मिक स्थल रहा है। क़स्बे में बटुक भैरव जी, झालरिया मठ, नागौरिया मठ, शीतला कुण्ड बालाजी, श्री कल्याणराय, श्याम महाराज मंदिर, किला, जामा और शाही कचहरी मस्जिद, जोगामण्डी धाम, काली माता तथा सरकी माता का 9-10वीं शताब्दी में बने इस मंदिर का गर्भगृह, शिखर, अन्तराल, सभामण्डप स्थापत्य कला और शिल्प कला की दृष्टि से बेजोड़ उदाहरण रहा है।

पीर पहाड़ी दरगाह प्रमुख धार्मिक और पर्यटन स्थल है। वहीं इस क़स्बे के प्राचीन साक्ष्य के रूप में दुर्ग, क़िला, परकोटा, महल और बावड़ी खण्डहर में तब्दील हो चुके हैं। पहले विश्वयुद्ध में यहां के वीर सैनिकों ने अपना शौर्य और पराक्रम दिखाया था। 77 वीर जवानों की शहादत को नमन करते हुए ब्रिटीश हुकूमत ने नागौरी गेट के बाहर शौर्य शिलालेख अंकित करवाया था। क़स्बे की वेटलैंड की आबोहवा फ़्लेमिंगों, कुरजां सहित कई विदेशी पक्षियों को रास आने लगी है। मैला मैदान, रामसाबास और मारवाड़ बालिया की झील इन पक्षियों की पंसदीय जगह है। यह क़स्बा वैदिक नदी सरस्वती की सहायक द्वषद्वती नदी के किनारे बसा हुआ था। विलुप्त इस नदी के जगह पर नमक की झील, छोटे तालाब बन गए है। इन्हीं जलस्त्रोतों के किनारे रेतीले टीलों के नीचे ‘‘होमो इरेक्ट्स’’ इतिहास से भी पहले आबादी के साक्ष्य मौजूद हैं।

प्राचीन देवी मंदिर | भंवर कसाणा

डीडवाना का इतिहास-पूर्व काल

इस काल का कोई लिखित सबूत उपलब्ध नहीं है। इसी काल को “पाषाण युग ” के नाम से जाना जाता है । पुरापाषाण युग में हथियारों का आविष्कार एक क्रांतिकारी घटना रही थी । मुख्य रूप से कुल्हाड़ी विदारनी( दो धारवाला औज़ार), गंडासा यह उपकरण स्फ़टिक (क्वार्टज़ाईट )से बनाए जाते थे। डीडवाना और कटौती के बीच पानी के बहाव से रगड़ खाकर, गोल-मटोल और सपाट हो गए पत्थर (पैबुल) के टुकड़े भी मिले हैं। गंडासा पैबुल पत्थर से निर्मित औज़ार है, जिसके एक ओर फलक निकालकर धार बनाई जाती थी। चापिंग (खड़क) पैबुल पत्थर के दोनों और धार बनाई जाती थी ।उत्तरी भारत में पूर्व पाषाण काल के मुख्य उत्खनन स्थल सोहन नदी घाटी, कश्मीर ,बेलन घाटी, नर्मदा घाटी और राजस्थान में चित्तौड़गढ़ के पास नदी और पहाड़ियां और नागौर ज़िले में स्थित डीडवाना क़स्बा मुख्य स्थल रहे हैं।

उत्खनन का फाईल फोटो | डॉ अरुण व्यास

 

प्राचीन सभ्यता का उत्खनन स्थल

डीडवाना में विकसित हुई प्राचीन सभ्यता सिंधु घाटी से भी पुरानी मानी गई है। डीडवाना में स्थित राजकीय बांगड़ महाविद्यालय के भूगर्भ शास्त्र विभाग के सह-आचार्य डॉ. अरूण व्यास ने बताया, कि इस क्षेत्र की सभ्यता का पेलियोलिथिक काल से संबंध रहा है। यहां डेक्कन कालेज (पुणे) के डॉ. वी.एन. मिश्रा, डॉ. एस. एन. राजगुरु, डॉ. हेमा अज्युथन और पेरिस राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय (फ़्रांस) के प्रागैतिहासिक विभाग से जुड़ी क्लेरी गेलार्ड की ओर से सन् 1980 में इंडोलाव की ढाणी, सिंघी सरोवर, बालिया की प्रोटोरोज़ोइक काल की पहाड़ियों की तलहटी, सन 1938-40 के दौरान निर्मित बांगड़ नहर के किनारे 16 आर जीवाश्मीय रेतीले टिब्बे, तिखली डूंगरी और पीर पहाड़ी क्षेत्र में एशूलियन इण्ड्स्ट्रीज की खुदाई की गई थी, जिसमें मानव निर्मित आकृतियां मिली थीं। खुदाई में (16 आर) से छोटे औज़ार, काटने के बड़े औज़ार जैसे चौपर, पोली हेण्ड्रोस, स्पेरोइडस आदि क़रीब 1300 आर्टिफ़ेक्ट्स मिले थे। आस-पास के 10 स्थालों से 301 हाथ के बनी कुल्हाड़ियां भी मिली थीं। यह पुरी सामग्री तालाब, नहर और मुरड़ की खदान से 1 से 3 मीटर नीचे मिली है। इनकी रेडियो मेट्रिक आयु 7 लाख 97 हजार वर्ष आंकी गई है। उस समय एशिया के अधिकतर क्षेत्रों में होमो इरेक्ट्स आबाद थे और भारत में एशूलियन इण्ड्स्ट्रीज़ के शिल्पकार थे।

डेक्कन कॉलेज (पुणे)द्वारा प्रकाशित शोध पत्र

होमो इरेक्ट्स (fossils of home erectus)

होमोइरेक्ट्स होमोनिन की विलुप्त प्रजाति है। जिसका उद्भव अफ्रीका में हुआ। वहां से वे जार्जिया, भारत, श्रीलंका, चीन व जावा में फैल गए। ये प्लीस्टोसीन काल में भी जीवित रहे। इनके जीवाश्म एक लाख 43 हजार से 18 लाख वर्षों तक की आयु के है। इन्हें अपराइट मैन भी कहा जाता है। वर्तमान में मानव होमो सेपियन्स कहलाते हैं। जिसका उद्भव ढ़ाई से चार लाख वर्ष पूर्व तक माना गया है। इन्हें वाइस मैन भी कहते है। इस प्रकार डीडवाना में मौजूद 16 आर विश्व पटल पर विख्यात है। मानव विकास और सभ्यता की इस धरोहर को संरक्षित करने की दरकार है।

मुख्य आवरण चित्र: योग नारायण विष्णु प्रतिमा, राजकीय संग्रहालय (जोधपुर)

हम आपसे सुनने के लिए उत्सुक हैं!

लिव हिस्ट्री इंडिया इस देश की अनमोल धरोहर की यादों को ताज़ा करने का एक प्रयत्न हैं। हम आपके विचारों और सुझावों का स्वागत करते हैं। हमारे साथ किसी भी तरह से जुड़े रहने के लिए यहाँ संपर्क कीजिये: contactus@livehistoryindia.com

आप यह भी पढ़ सकते हैं
Ad Banner
close

Subscribe to our
Free Newsletter!

Join our mailing list to receive the latest news and updates from our team.

Loading