महाराजा नंदकुमार और भारत की पहली न्यायिक हत्या

महाराजा नंदकुमार और भारत की पहली न्यायिक हत्या

भारत में न्यायिक हत्या या ज्युडिशियल डैथ जैसी निंदनीय और अमानवीय घटना आमतौर प रहोती रहती है। हमारे यहां मुल्ज़िम या मुजरिम ख़ामोशी से झूठे एनकाउंटर और यातनाओं के ज़रिए मारे दिए जाते हैं। क्या आप जानते हैं कि भारत में हुई पहली न्यायिक हत्या, भारतीयों और अंग्रेज़ों की मिलीभगत से हुई थी? वह मामला आज भी एक विवाद बना हुआ है?

वह हत्या महाराजा नंदकुमार की थी, जो 18वीं शताब्दी के दौरान  हुई थी। उस वक़्त ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी पूर्वी भारत में अपने क़दम जमा चुकी थी। बहुत लोगों का मानना है, कि यह पहला मौक़ा था  जब अंग्रेज़ी शासन के दौरान  किसी भारतीय को फांसी की सज़ा दी गई थी!

नंदकुमार का जन्म सन 1705 में पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले के भद्रपुर गाँव में हुआ था। लेकिन कुछ दस्तावेज़ में उनके जनेम का साल सन 1722 लिखा मिलता है। नंद कुमार का ताल्लुक़ मुर्शिदाबाद के कुंजाघाता के ज़मींदार परिवार से था। महज़ बीस वर्ष की उम्र में उन्हें मुर्शिदाबाद के दरबार में जगह मिल गई थी। ये वो दौर था, जब मुग़लिया सल्तनत का पतन शुरु हो चुका था और बंगाल एक अलग रियासत बन चुकी थी। लेकिन बंगाल के शासकों ने मुग़लों के साथ अपने रिश्ते क़ायम रखे। उन दिनों बंगाल दुनिया की सबसे धनी और समृद्ध रियासतों में से एक था। बंगाल की दौलत, मुग़लों के ख़जाने के लिए किसी वरदान से कम नहीं थी।

इसी दौर में नंदकुमार भी दरबार-ए-बंगाल में एक प्रभावशाली व्यक्ति के तौर पर उभर रहे थे। पांचवें नवाब अलीवर्दी ख़ान के दरबार में फ़ारस से आए मुहम्मद रज़ा खान भी पहुंच गए थे। रज़ा ख़ान को चटगाँव का और नंद कुमार को हुगली का फौजदार बनाया गया था।

महाराजा नंदकुमार की पगिद, जो उन्होंने अपने फांसी के दौरान पहनी थी (आज ब्रिटिश म्यूजियम में)

सन 1757 में प्लासी की जंग के बाद, जब बंगाल पर अंग्रेज़ों ने अपना क़ब्ज़ा पुख़्ता कर लिया, तब उनके बनाए कठपुतली नवाब मीर जाफ़र के मातहत, नंदकुमार को बंगाल के कुछ इलाक़ों का कलेक्टर और क्लाईव को वकील नियुक्त किया गया था। लेकिन दरबारियों के प्रभाव में आकर जाफ़र ने रज़ाख़ान को मुर्शिदाबाद से दूर, ढाका का नायब नाज़िम बना दिया। वारेन हेस्टिंग्ज़, जाफर के दरबार में रेज़िडेंट बना दिया गया। हेस्टिंग्ज़, अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच चल रहे भ्रष्टाचार और निजी तिजारत की तहक़ीक़ात भी कर रहा था। लेकिन जिन अंग्रेज़ी अधिकारियों को इस तिजारत से फ़ायदा हो रहा था, उनमें बहुत से, कलकत्ता में कंपनी काउंसिल के सदस्य ही थे! हेस्टिंग्ज़ पर तहक़ीक़ात को ख़ारिज करने का दबाव बना गया। लेकिन वो अपने पद से इस्तीफ़ा देकर सन 1764 में इंग्लैंड वापस चला गया।

मीर जाफ़र जब दोबारा नवाब बना, तो उसने नंदकुमार को अपना दीवान बना दिया। नंदकुमार अंग्रेज़ों की चाल से, पूरी तरह वाक़िफ़ हो चुके थे। नंदकुमार ने मीर जाफ़र को सलाह दी, कि वह मुग़ल बादशाह शाह आलम-द्वितीय और अवध के नवाब शुजाउद्दौला से शाही फ़रमान हासिल करें और अंग्रेज़ों से आज़ादी का ऐलान कर दें। मुलाक़ात के दौरान, शाह आलम ने नंदकुमार को सम्मान के तौर पर ‘महाराजा’ की पदवी से नवाज़ा।

लेकिन इसका नतीजा बुरा ही निकला। सन 1764 में बक्सर की लड़ाई के बाद, अंग्रेज़ बंगाल, बिहार और ओडिशा के ना सिर्फ़ मालिक बन गए। अगले वर्ष यानी सन 1765 में, मीर जाफ़र के मरने के बाद, उसका बेटा  नज़्मउददौला गद्दी पर बैठा। अंग्रेज़ों ने अपनी चाल चली और नंदकुमार के बजाए मुहम्मद रज़ा खान को दीवान बना दिया। रज़ा ख़ान उन दिनों ढाका के नायब नाज़िम थे। वहीँ नंदकुमार को कलकत्ता में रखा गया। क्योंकि नंदकुमार कई अंग्रेज़ अधिकारियों की नज़रों में खलनायक की तरह खटक रहे थे।

प्लासी का युद्ध (चित्र में रोबर्ट क्लाईव और मीर जाफर)

इससे पहले ढाका के ख़ज़ाने से सोलह लाख रुपयों का ग़बन हो गया था। तब मीर जाफ़र ने एक दस्तावेज़ पर खान से ज़बरदस्ती दस्तख़त करवा लिए थे। ख़ान ने, मुर्शिदाबाद में अपनी जगह पाने के लिए, कंपनी के कुछ अफ़सरों को रिश्वत भी दी थी। रोबर्ट क्लाईव ने इन तमाम इल्ज़ामों को नज़रंदाज़ करके, खान को लगान और प्रशासन सम्भालने का काम सौंप दिया था। दरअसल क्लाईव रियासतों पर पूरा क़ब्ज़ा करने के साथ-साथ, कलकत्ता काउंसिल के सदस्यों और भारतीयों बीच चल रही निजी तिजारत को ख़त्म करना चाहता था। सन 1767 में जब क्लाईव इंग्लैंड वापस चला गया, तब कंपनी काउंसिल ने रज़ा खान की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए एक पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिया जिसमें सभी अंग्रेज़ ही थे।

सन 1771 में हेस्टिंग्स की कलकत्ता में वापसी हुई और अगले साल वो भारत का पहला गवर्नर जनरल बन गया। उसने कलकत्ता, बम्बई और मद्रास प्रेसिडेंसी से अंग्रेज़ी हुकूमत को एक इकाई में शासन चलाने पर ज़ोर दिया। इसके लिए उसने पांच सदस्यीय कौंसिल का गठन किया। इस दौरान नंदकुमार हेस्टिंग्स से मिले। नंदकुमार ने खान के ख़िलाफ़ पुराने इल्ज़ामों के बारे में बताया। साथ ही नंदकुमार ने अपने बेटे गुरुदास को दीवान का पद दिलवा दिया, और खान ओर शिताब राय को बर्ख़ास्त कर दिया गया। लेकिन दो साल तक चले मुक़दमें में, दोनों बेगुनाह पाए गए । उसके बाद अंग्रेज़ों के साथ उन्होंने कई पद सम्भाले।

अकालीपुर में नंदकुमार द्वारा निर्मित काली मंदिर

 

मगर नंदकुमार कहाँ चुप बैठने वाले थे! मार्च, सन 1775 में नंदकुमार ने ईस्ट इंडिया कंपनी के सदस्यों के सामने, हेस्टिंग्स पर गुरुदास को दीवान बनाने के लिए एक लाख रुपए की रिश्वत लेने का आरोप लगाया। उन्होंने हैस्टिंस पर, मीर जाफ़र की विधवा मुन्नी बेगम से ढाई लाख रुपए की रिश्वत लेने का आरोप भी लगाया गया। मुन्नी बेगम अपने बेटे मुबारकउद्दौलाह को, किशोरावस्था में ही नवाब बनवाना चाहती थीं। इस मुक़दमे में बाक़ी चार सदस्यों में से तीन हेस्टिंग्स के ख़िलाफ़ हो गए थे और सिर्फ़ एक, बारवेल नाम का सदस्य हेस्टिंग्स के समर्थन में था। कम्पनी के कुछ वरिष्ठ अधिकारीयों की सलाह पर नंदकुमार ने ये आरोप कलकत्ता काउंसिल के सामने पेश किए। काउंसिल ने हेस्टिंग्स को दोषी पाया, लेकिन उसे  कोई दंड नहीं दिया।  लेकिन 3 लाख 54 हज़ार, 105 रुपए का जुर्माना ज़रूर लगाया।

हेस्टिंग्स ने बदले की कार्रवाई के तौर पर नंदकुमार को कलकत्ता की अदालत में घसीट लिया। उस अदालत का जज हेस्टिंग्स का बचपन का दोस्त एलिया इम्पी था। लार्ड मैकॉले के शब्दों में, इम्पी एक रिश्वतख़ोर और बददिमाग़ जज था। हेस्टिंग्स ने नंदकुमार पर साज़िश के आरोप लगाए और साथ ही सन 1770 में हुई किसी जालसाज़ी से उनका नाम जोड़ दिया। ये मामला दरअसल बुलाकी दास नाम के एक बैंकर से जुड़ा था। आरोप था कि बुलाकत़ी दास ने किसी बांड के लिए जाली दस्तावेज़ पेश किए थे। इन दोनों आरोपों के लिए, फ़र्ज़ी गवाह भी पेश किए गए थे, जिनमें कई भारतीय भी शामिल थे!

इम्पी ने अपने दोस्त हेस्टिंग्स को बाइज्ज़त बरी कर दिया और नंदकुमार पर लगाए गए आरोपों को सही ठहरा कर,उन्हें दोषी क़रार दे दिया। लेकिन जो झूठे  इल्ज़ाम नंदकुमार पर लगाए थे, वह तब के थे जब अदालतों का गठन हुआ ही नहीं था। सन 1728 का जालसाज़ी क़ानून, जिसके तहत नंदकुमार पर इल्ज़ाम लगाए जा रहे थे, उसके बारे में किसी को जानकारी थी ही नहीं। फिर भी, रास्ते में कांटे की तरह चुभ रहे नंदकुमार के लिए फांसी की सज़ा को मुनासिब समझा गया। कई अंग्रेज़ अधिकारीयों ने इसके ख़िलाफ आवाज़ ज़रूर उठाई, लेकिन उनकी आवाज़ों को अनसुना कर दिया गया। नंदकुमार के बचाव के लिए किंग जॉर्ज-तृतीय को अर्ज़ियां भी भेजी गईं। लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। आख़िरकार 5 अगस्त सन1776 को नंदकुमार ने सज़ा क़ुबूल कर ली। जिस कुएं पर नंदकुमार को फांसी पर चढ़ाया गया था, वो कुआं आज भी कलकत्ता में मौजूद है। कई अंग्रेज़ी दस्तावेज़ से पता चलता है, कि फांसी लगते वक़्त नंदकुमार के चेहरे पर सुकून था। कई लोगों का मानना है, कि नंदकुमार को दी गई फांसी, अंग्रेजी शासन के दौरान भारत में फांसी दिए जाने की पहली घटना थी। कई लोग इसे भारत की पहली न्यायिक हत्या मानते हैं।

एलिया इम्पे

लेकिन हेस्टिंग्स की मुश्किलें कम होने के बजाय़ बढ गईं थी। ख़ुद को बेक़सूर साबित करने के लिए हेस्टिग्स ने सन 1773 में अपने हुक्मरानों को एक ख़त लिखा। जिसमें उसने कहा था, कि उसने अपना काम पूरी ईमानदारी और अंग्रेज़ी परम्पराओं के मुताबिक़ किया था। उसका हर फ़ैसला ब्रिटिश साम्राज्य के हितों के लिए था। सन 1786 में ब्रिटेन के एक सांसद एडमंड बुर्के ने  हेस्टिंग्स पर रिश्वतख़ोरी, क्रूरता, जालसाज़ी, पद के ग़लत इस्तेमाल और अन्याय के आरोप लगा दिए थे। बुर्के ने ये भी कहा, कि हेस्टिंग ने ख़ुद को आरोपों से बचाने के लिए नाटक रचा था। उसी नाटक के तहत महाराजा नंदकुमार को फांसी दी गई थी। बुर्के का कहना था, कि भले ही हेस्टिंग्स ने प्रशासन में कितना ही अच्छा काम किया हो, लेकिन उनके हाथों से, नंदकुमार के ख़ून के दाग़ कभी मिट नहीं पाएंगे।

ये मुक़दमा लगभग दस साल चला और हेस्टिंग्स निर्दोष पाया गया। लेकिन बावजूद इसके कई अंग्रेज़ इतिहासकार हेस्टिंग्स को मुजरिम और नंदकुमार को निर्दोष क़रार देते हैं। आज भी भारतीय और ब्रिटिश इतिहासकार, हेस्टिंग्स और नंदकुमार के मामले में बंटे हुए हैं। नंदकुमार पूरे बंगाल में आज हीरो की हैसियत रखते हैं। यह नंदकुमार का हौसला ही था कि उन्होंने अंग्रेज़ों पर जालसाज़ी का इल्ज़ाम लगाया और एक बहुत बड़ी मिसाल क़ायम की। इतना ही नहीं, कई दस्तावेज़ से पता चलता  हैं, कि वो कम्पनी राज को वित्तीय तौर पर अपाहिज करके, देश से बाहर निकालना चाहते थे। बताया जाता है कि उन्होंने पोंडिचेरी में फ्रांसिसी अधिकारियों और नज़्मउददौला के साथ इस मामले में बातचीत भी की थी।

 

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नंदकुमार की जन्मस्थली यानी बीरभूम ज़िले के भद्रपुर में उनके नाम पर ‘भद्रपुर महाराजा नंदकुमार हाई स्कूल’ है। उसी के क़रीब अकालीपुर गाँव में उनके स्थापित किए काली मंदिर में भक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। पूरबा मेदिनीपुर ज़िले में उनके नाम पर बनाया गया कॉलेज ‘महाराजा नंदकुमार महाविद्यालय’ है, जो कोलकाता के विद्यासागर विश्वविद्यालय के अंतर्गत आता है। वहां पर नंदकुमार के नाम पर एक गली भी है। बड़ानगर में उनके नाम की एक सड़क भी है! सन 1988 में श्याम बेनेगल के धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में नंदकुमार के जीवन पर प्रकाश डाला गया था। उनका किरदार दिग्गज कलाकार राजेन्द्र गुप्त ने निभाया था। मुहम्मद रज़ा खान का किरदार अमरीश पुरी ने अदा किया था।

शीर्षक चित्र साभार: चंदीचरण सेन/ नबपत्र प्रकाशन/ smplazza

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