विक्रमशिला – प्राचीन युग का विश्‍वविद्यालय 

भारत एक आध्यात्मिक देश रहा है जहां शिक्षा केंद्रों का इतिहास हज़ारों साल पुराना है। यूं तो देश के अनेक कोनों में आज भी कई शिक्षा केंद्र दफ़्न हैं लेकिन बिहार शायद इस मामले में सबसे बड़ी कब्रगाह है जिसकी परतें अब धीरे धीरे खुल रही हैं। अगर बात करें गुप्तकाल की तो सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने 415-454 ई.पू. में यहां नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की थी। यहां पढ़ाई के लिए जावा, चीन, तिब्बत, श्रीलंका और कोरिया से छात्र आते थे। इतिहास में नालन्दा विश्‍वविद्यालय का अपना एक मुक़ाम है। इसके क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद यानी आठवीं शताब्दी में राजा धर्मपालने विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय की स्थापना की जो भागलपुर ज़िले के अंतीचक गांव में था। इसे हम आधुनिक युग का ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय कह सकते हैं। इसकी एहमियत का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उस समय यहां प्रवेश पाना न सिर्फ़ विदेशी बल्कि भारतीय छात्रों के लिए भी बेहद कठिन होता था। छात्रों को यहां के विद्वान पंडितों की कसौटी पर ख़रा उतरना होता था जो ज़ाहिर है, आसान नहीं होता था।

तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ ने अपनी किताब ‘लामा तारानाथ्स हिस्ट्री ऑफ बुद्धिज्म’ में लिखा है कि राजा गोपाल के पुत्र धर्मपाल ने कामरूप, गौड़, तिरहुत आदि क्षेत्रों पर 64 साल तक शासन किया था। घर्मपाल बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। उन्होंने विक्रमशिला विहार के केन्द्र में 108 मंदिरों के बीच एक विशाल मंदिर बनवाया था जहां शिक्षा देने का भी काम चलता था। इस काम के लिए वहां 100 से अधिक आचार्य और 1000 से ज़्यादा विद्यार्थी थे। इनके खानेपीने और रहने का भी इंतज़ाम वहीं था। लेकिन प्रो.राधाकृष्ण चौधरी ने अपनी किताब ‘द् यूनिवर्सिटी ऑफ़ विक्रमशिला’ में आचार्यों की संख्या 160 और स्थानीय तथा बाहर से आए छात्रों की संख्या क़रीब 10,000 बताई है। विक्रमशिला बौद्ध महाविहार स्थापना से क़रीब चार शताब्दियों तक, धर्म और आध्यात्म के मामले में पूरब के एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र के रूप माने जाने लगा था जिसकी ख्याति न केवल भारत बल्कि दक्षिण-पूर्व एशिया, ख़ासकर तिब्बत तक फैल चुकी थी जहां से बड़ी संख्या में छात्र यहां पढ़ने आते थे।

इसकी प्रतिष्ठा का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसका स्तर नालंदा से भी बड़ा माना जाता था।

विहार का मुख्य सभागार विज्ञान-कक्ष कहलाता था जिसमें छह शाखाएं या महाविद्यालय थे जहां महायान, तंत्र-मंत्र, योग, काव्य, व्याकरण, न्याय आदि विधाओं में पारंगत छात्र अलग-अलग विद्वानों से ज्ञान प्राप्त करते थे। लामा तारानाथ के अनुसार इन महाविद्यालयों के प्रथम केन्द्रीय द्वार पर रत्नव्रज, द्वितीय केन्द्रीय द्वार पर ज्ञानश्री मित्र, उत्तरी द्वार पर भट्टारकनरोपम, दक्षिणी द्वार पर प्रज्ञाकर मति, पूर्वी द्वार पर रत्नाकर शांति तथा पश्चिमी द्वार पर वागीश्वर कीर्ति द्वार-पंडित के रूप में नियुक्त थे। ये द्वार पंडित ही छात्रों की परीक्षा लेते थे और इसमें पास होने पर ही लमहाविहार में दाख़िला मिलता था।

विक्रमशिला हमेशा से ही पाल राजाओं के क़रीब रहा और यही वजह है कि वह नालंदा, सोमपुरा व ओदंतपुरी महाविद्यालयोंकी तुलना में हमेशा अच्छी स्थिति में रहा। नालंदा की चर्चा करते हुए प्रो.जे.एन. समाद्दार ने अपनी किताब ‘द ग्लोरीज़ ऑफ़ मगध’ में लिखा है कि चूंकि विक्रमशिला राजा ने बनवाया था इसलिए इसके साथ राजशाही की उपाधि लगी रही। राजा ही इस महाविहार के चांसलर हुआ करते थे और दीक्षांत समारोह में उपाधियां भी देते थे। राजा ही पंडितों और अन्य आचार्यों की नियुक्ति करते थे।

राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय ख्याति वाले विश्वविद्यालय का तिब्बत के साथ ख़ास संबंध था। तिब्बती छात्रों के लिये यहां अलग से छात्रावास की व्यवस्था थी जिसके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। सुकुमार दत्त अपनी किताब ‘बुद्धिस्ट मांक्स एण्ड मोनास्टरीज़ ऑफ़ इंडिया’ में लिखते हैं कि चीनी दस्तावेज़ों में जिस शानदार तरीक़े से नालंदा महाविहार की चर्चा की गयी है, उसी अंदाज़ में तिब्बतियों ने अपने ग्रंथों में विक्रमशिला का ज़िक्र किया है। नालंदा के काल में चीन और भारत के बीच गहरे सांस्कृतिक संबंध थे जो 8 वीं शताब्दी के मध्य में विक्रमशिला का काल आते-आते तिब्बत की तरफ़ मुड़ गए। यही कारण है कि कई मामलों में नालंदा की तुलना में इसकी एहमियत काफ़ी बढ़ गई। प्रो.राधकृष्ण चौधरी के अनुसार विक्रमशिला की श्रेष्ठता और भव्यता का अंदाज़ा इसीसे लगाया जा सकता है कि जहां नालंदा में एक प्रवेश-द्वार था, वहीं विक्रमशिला में छह प्रवेश-द्वार थे। नालंदा की तुलना में यहां ज्यादा संख्या में विदेशी छात्र आते थे। विक्रमशिला की शिक्षा के उच्च स्तर के बारे में हुए खुदाई कार्य का नेतृत्त्व करने वाले ए.एस.आई. के निदेशक रहे डॉ.बी.एस. वर्मा (अंतीचक एक्सकावेशंस-2/1971-1981) के अनुसार जिस तरह आज के विश्वविद्यालयों के संचालन के लिए परिषद या सीनेट होती है, वैसे ही तब भी शैक्षणिक गतिविधियों के संचालन के लिए शिक्षकों का एक बोर्ड होता था। शायद यही वजह है कि राजा धर्मपालने ख़ुद को दोनों महाविहारों का प्रधान नियुक्त कर दिया था।

विक्रमशिला की स्थापना के बारे में तिब्बती ग्रंथों में लिखा है कि राजा एक बार अंतीचक-पत्थघट्टा घूमने गए थे और वहां गंगा के किनारे के ख़ूबसूरत नज़ारे पर इतना फ़िदा हो गए कि उसी समय उन्होंने यहां एक विहार बनाने का फ़ैसला कर लिया। प्राचीन काल में यहां की पहाड़िओं और गुफ़ाएओं में साधु-संत तथा योगी-ऋषि तपस्या करते थे। बंगाल, असम व सुदूर पूर्व के मार्ग पर स्थित होने के कारण पूरब व पश्चिम के बीच पत्थरघट्टा जो अब बटेश्वर स्थान के नाम से प्रसिद्ध है, की ऐतिहासिक महत्व रहा है। यही कारण है कि चीनी यात्री ह्वेन संग (प्रारंभिक 7 वीं शताब्दी), तिब्बती बौद्ध भिक्षु नागस्तो (1039), धर्मस्वामी (1234) व लामा तारानाथ (1575-1634) से लेकर विलियम होजेज़ (1780-1784), फ़्रांसिस बुकानन (1810), विलियम फ़्रैंकलिन (1811-1813) जैसे विद्वानों ने इस क्षेत्र की यात्रा कर यहां की प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर का ज़िक्र किया है।

आला दर्जे की पढ़ाई-लिखाई के कारण अपने समय में विक्रमशिला देश के सांस्कृतिक तथा बौद्ध-ज्ञान का प्रमुख केन्द्र बन गया था। यहां दूर दराज़ से विद्वान जमा होते थे और शैक्षिक एवं दार्शनिक विषयों पर चर्चा करते थे। यहां का पाठ्यक्रम एक बौद्ध विश्वविद्यालय की आवश्यकताओं के अनुसार था। पठन-पाठन के लिये निजी कक्षाएं यानी ट्यूटोरिल क्लासेस और सामूहिक कक्षाएं दोनों सिस्टम प्रचलित थे। दाख़िला मिलने के बाद शुरु में हर छात्र को कुछ समय के लिये एक-एक भिक्षु की देख-रेख में रखा जाता था। बौद्ध परंपरा के अनुसार गुरू के लिए शिष्य पुत्र समान होता था।

बुद्ध ज्ञानपद विक्रमशिला के संस्थापक शिक्षक थे और उनके समय से ही विक्रमशिला में बेहद ज्ञानी आचार्य और विद्वान नियुक्त किए गए थे।

वारेन्द्र के जेतारी, कश्मीर के रत्नव्रज और शाक्यश्री, बनारस के बागीश्वर, नालंदा के वीरोचन, ओदंतपुरी के रत्नाकर यहां के प्रतिष्ठित आचार्य थे। तिब्बतियों ने यहां रत्नाकर शांति, ज्ञानश्री मित्र, नरोपन्त, वीरव्रज, विद्या कोकिल सहित दीपंकर श्रीज्ञान अतिश जैसे आचार्यों का ज़िक्र किया है। विक्रमशिला के विद्वानों की मंडली में आचार्य दीपंकर सबसे बड़े विद्वान माने जाते थे जिनके पास ज्ञान का ज़ख़ीरा था। भारत में उन्हें बौद्ध धर्म का अंतिम प्रमुख आचार्य माना जाता है। तिब्बत के राजा के आमंत्रण पर उन्होंने 13 साल तक वहां रहकर बौद्ध धर्म में त्रुटियों को सुधारने और घर्म के पुर्नस्थापन का काम किया और इसी कारण बौद्ध धर्म के इतिहास में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। तिब्बत में वे बुद्ध के दूसरे अवतार के रूप में पूजे जाते हैं।

विक्रमशिला में बौद्ध धर्म की पढ़ाई-लिखाई के अलावा व्याकरण, आध्यात्म, तर्कशास्त्र, हेतु विद्या, चिकित्सा विद्या, सांख्य, शिल्प-स्थान विद्या आदि की भी पढ़ाई होती थी। इसके संस्थापक राजा धर्मपाल की, आठ हज़ार श्लोकों वाले महायान बौद्ध ग्रंथ प्रज्ञा में, विशेष आस्था थी और यही वजह है कि उन्होंने जो 55 बौद्ध केन्द्र स्थापित किए थे उनमें में से 35 प्रज्ञापारमिता के अध्ययन के केन्द्र थे। विक्रमशिला की मान्यता मंत्रयान के एक प्रमुख केन्द्र के रूप में रही है। भारतीय इतिहासकार रोमिला थापर के मुताबिक़ बौद्ध मत पर तंत्रवाद के अत्यधिक प्रभाव के कारण ईसा के बाद सातवीं शताब्दी में एक नयी शाखा ’वज्रयान’ का जन्म हुआ जिसका केन्द्र पूर्वी भारत में था। ‘द वंडर दैट वाज़ इंडिया’ के लेखक इतिहासकार ए.एल. बासम का मानना है कि 8 वीं शताब्दी में पूर्वी भारत में वज्रयान के नाम से एक तीसरे ’यान’ का जन्म हुआ जिसे बेहतर रुप में बौद्ध महाविहार विक्रमशिला के आचार्यों ने तिब्बत में स्थापित किया।

धर्म और शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के साथ-साथ विक्रमशिला ने स्थापत्य और मूर्तिकला के क्षेत्र में भी अपनी ख़ास पहचान बनायी। बंगाल के साथ यहां के भिक्षुओं ने धार्मिक भवनों की सजावट और मूर्ति निर्माण की एक नयी शैली बनाई जो पूर्वी भारत की ’मगध-बंग शैली’ के नाम से जानी जाती है। नालंदा की तरह यहां भी पाण्डुलिपि-चित्रण के विशिष्ट प्रतीक विकसित हुए। यहां अनुवाद का काम भी बड़े पैमाने पर होता था। सुकुमार दत्त के अनुसार तिब्बती धर्म सूत्र संग्रहों में मौलिक अथवा संस्कृत से अनुवादित ग्रंथों की अच्छी-ख़ासी संख्या है जिसका श्रेय विक्रमशिला के आचार्य दीपंकर सहित यहां के अन्य 13 आचार्यों को जाता है। यहां पाण्डुलिपियों को विशेष पद्धति से वातानुकूलित पुस्तकालय में सहेज कर रखा जाता था जो ज़ाहिर है वहां के तकनीकी कौशल को दर्शाता है।सुदूर तिब्बत की पहाड़ी कंदराओं और गुफाओं में संरक्षित रह गईं इन पाण्डुलिपियों के कारण ही लुप्तप्राय-सा विक्रमशिला और बौद्ध धर्म का इतिहास फिर विश्व के सामने आ गया।

विक्रमशिला आठवीं शताब्दी में अपनी स्थापना के बाद क़रीब चार सौ वर्षों तक धर्म, आध्यात्म और ज्ञान के क्षितिज पर अप्रतिम ज्योति बिखेरने वाला यह महाविहार पूर्वी भारत के अपने समकालीन नालंदा, ओदंतपुरी और जगदल्ला की तरह मठवासीय विश्वविद्यालय यानी मोनास्टिक यूनिवर्सिटी का अंतिम उत्कृष्ट उदाहरण था, लेकिन विडंबना ये है कि 12 वीं शताब्दी के अंत में तुर्कों के आक्रमण से ये पूरी तरह नष्ट हो गया। क़रीब 800 वर्षों तक ये पृथ्वी के गर्भ में इस तरह खो गया कि विद्वान इसके नाम-ओ-निशान को लेकर महज़ क़यास लगाने पर मजबूर हो गए। इस तरह लंबे अंतराल तक उपेक्षित पड़े रहने के बाद 1960 से 1969 तक पटना विश्वविद्यालय के डॉ.बीपी वर्मा और उसके बाद 1971-72 से लेकर 1982 तक की अवधि में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ए.एस.आई.) के निदेशक डॉ.बी.एस. वर्मा के नेतृत्त्व में की गई खुदाई के बाद ही पूरी दुनिया के सामने ये फिर प्रकट हो सका। अभी तक इसके मुख्य स्तूप की ही खुदाई हो सकी है और इसका विशाल रूप अभी भी ज़मीन के सीने में दबा रौशनी की राह देख रहा है।

शिव शंकर सिंह पारिजात, उप जनसंपर्क निदेशक (अवकाश प्राप्त), सूचना एवं जनसंपर्क विभाग, बिहार सरकार/’विक्रमशिला बौद्ध महाविहार के महान आचार्य दीपंकर श्रीज्ञान अतिश’ सहित आधा दर्जन पुस्तकों के लेखक।