उज्जैन: आस्था, इतिहास और विज्ञान की नगरी

उज्जैन: आस्था, इतिहास और विज्ञान की नगरी

उज्जैन शहर अपने प्राचीन अतीत और पवित्र मंदिरों के लिए भारत के सबसे पावन शहरों में से एक माना जाता है। लेकिन कम ही लोग जानते हैं , कि यह शहर भारतीय खगोल विज्ञान में भी एक विशेष स्थान रखता है, जिसके कारण इसे “भारत का ग्रीनविच” भी कहा जाता रहा है।

माना जाता है, कि एक समय में पूरे विश्व का समय या काल उज्जैन से ही तय होता था। ग्रीनविच की व्यवस्था बाद में शुरू हुई।

मध्यप्रदेश में, शिप्रा नदी के पूर्वी तट पर आबाद उज्जैन कई ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा है। प्राचीन काल में इसे अवंतिका और उज्जयनी के नाम से जाना जाता था।

उज्जैन का एक दृश्य | LHI

गरुड़ पुराण के एक श्लोक में उज्जैन को सप्तपुरी (हिंदू धर्म में 7 पवित्र तीर्थ स्थल) में से एक के रूप में उल्लेख किया गया है। अन्य तीर्थ स्थल हैं-अयोध्या, माया (हरिद्वार), मथुरा, कांचीपुरम, काशी (वाराणसी) और द्वारका। कथाओँ के अनुसार, किसी ज़माने में उज्जैन पर हैहय राजवंश का शासन था, जो पांच कुलों का एक संघ था। ये कुल पौराणिक राजा यदु के वंश से सम्बंध होने का दावा करते थे। माना जाता है, कि यदु श्रीकृष्ण के पूर्वज थे।

छठी सदी ई.पू. में,दूसरे शहरीकरण के कारण 16 महाजनपदों (साम्राज्यों) का उदय हुआ। दूसरा शहरीकरण भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि इस दौरान सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद, पहली बार पूरे भारत में बड़े-बड़े शहर उभरे थे। इन 16 में से कुछ महत्वपूर्ण महाजनपद थे- मगध, कोशल, वत्स और अवंती। उज्जैन अवंती महाजनपद की राजधानी बन गई थी। पुराना उज्जैन शहर गढ़कालिका नामक पहाड़ी के आसपास स्थित था, जो मिट्टी के प्राचीरों और ख़ंदक़ों से घिरा हुआ था।

16 महाजनपद में अवंती महाजनपद और उसकी राजधानी उज्जैनी | LHI

प्राचीन काल से ही उज्जैन का खगोल विज्ञान में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है।भारतीय खगोल विज्ञान के अनुसार, कर्क रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है। कर्क रेखा खगोलीय अवलोकन करने के लिए एक उपयुक्त स्थान है, और ये सबसे उत्तरी बिंदू की तरफ़ है, जिसके ऊपर सीध में सूर्य होता है। कहा जाता है, कि उज्जैन में कर्क रेखा मंगलनाथ मंदिर के आवर्त से होकर गुजरती है। हिंदू भूगोलवेत्ता इस शहर को देशांतर की पहली 0° देशांतर रेखा मानते हैं।

प्राचीन भारत में उज्जैन खगोल विज्ञान और गणित का केंद्र था। कहा जाता है, कि 12वीं शताब्दी के गणितज्ञ और खगोलशास्त्री भास्कर-द्वितीय उज्जैन में एक खगोलीय वेधशाला के प्रमुख थे।

एक पवित्र और खगोलीय दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल होने के अलावा, उज्जैन का आर्थिक और राजनीतिक महत्व भी था। यह एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग के केंद्र में स्थित था, जो पश्चिमी बंदरगाहों को भीतरी इलाक़ों के बाज़ारों से जोड़ता था। बौद्ध ग्रंथों में दक्कन में प्रतिष्ठान (पैठन) से श्रावस्ती तक एक व्यापार मार्ग का उल्लेख है।पहली शताब्दी के ग्रीको-रोमन ग्रंथ पेरिप्लस ऑफ़ एरिथ्रियन सी में उज्जैनका उल्लेख “ओज़ीन”नाम से किया गया है, जो एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में बैरीगाज़ा (भरूच) के पूर्व में एक शहर है।

“इस जगह से अंतर्देशीय- और पूर्व में ओज़ेन नामक शहर है।एक पूर्व शाही राजधानी,इस जगह से बैरीगाज़ा देश की ख़ुशहाली के लिए आवश्यक सभी चीजें, और हमारे व्यापार के लिए बहुत-सी चीजें: गोमेद और इंद्रगोप, भारतीय मलमल और मैलो कपड़ा और बहुत सामान्य कपड़ा।

-पेरिप्लस ऑफ एरिथ्रियन सी

इसमें कोई ताज्जुब नहीं है , कि उज्जैन को कई राजवंश पसंद करते थे। शहर का सबसे पहला प्रमाण चंद्रगुप्त मौर्य (शासनकाल 321-297 ई.पू) के पुत्र बिंदुसार (शासनकाल 297-268 ई.पू.) के शासन काल से मिलता है। बिंदुसार ने उज्जैन पर क़ब्ज़ाकर, इसे मौर्यों के अधीन एक प्रांत बना दिया था। उसने अपने पुत्र अशोक (शासनकाल 269-232 ई.पू.) को उज्जैन का वायसराय या सूबेदार बनाया था। यह शहर हिंदुओं, बौद्धों और जैनियों के शिक्षा केंद्र के रूप में भी विकसित हुआ था। “उज्जैन” नामक पुस्तक के लेखक केशव राव बलवंत डोंगरे के अनुसार, अशोक के शासनकाल में उज्जैन में खगोल विज्ञान के स्कूल भी हुआ करते थे। दुर्भाग्य से इस बारे में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

मौर्य के बाद, उज्जैन पर शुंगों (शासन काल184-75 ई.पू), सातवाहनों (द्वितीय ई.पू-तीसरी ई.) और पश्चिमी क्षत्रपों (35-405 ई.) ने शासन किया। पश्चिमी क्षत्रपों की एक शाखा कार्दमक राजवंश की स्थापना 78ई. में उज्जैन के क्षत्रप (गवर्नर) चष्टन ने की थी। यूनानी भूगोलवेत्ता और खगोलशास्त्री टॉलमीने अपने ज्योग्रेफ़िया (भूगोल) में चष्टन के क्षेत्र का वर्णन करते हुए उज्जैन (ओज़ीन) का अपनी राजधानी शहर के रूप में उल्लेख किया है। सन130 में उनका पोता रुद्रदामन-प्रथम उनका उत्तराधिकारी बना, जो कार्दमक वंश का सबसे शक्तिशाली राजा था। कार्दमक राजवंश के शासक महाक्षत्रप के नाम से जाने जाते थे। क्षत्रपों के शासनकाल में उज्जैन एक बड़े व्यापार और शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित हुआ था। इन शासकों ने खगोलीय अध्ययन को भी प्रोत्साहन दिया था।

कहा जाता है, कि विक्रम संवत (57 ईसा पूर्व से शुरू होने वाला हिंदू कैलेंडर) से संबंधित महान राजा विक्रमादित्य और प्रसिद्ध संस्कृत कहानियों के नायक वेताल पंचविमशती, जिन्हें विक्रम-वेताल के नाम से जाना जाता है, ने उज्जैन से शासन किया था।

राजा विक्रमादित्य की एक मूर्ती | LHI

गुप्त-शासकों के शासनकाल में उज्जैन में बहुत ख़ुशहाली थी। चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने अपने सफ़रनामे में उज्जैन के लोगों का वर्णन किया है। संस्कृत साहित्य के महान साहित्यकार कालिदास, भास और शूद्रक, सभी ने अपने लेखन में उज्जैन का उल्लेख किया है।ऐसा भी माना जाता है, कि कालिदास और भास दोनों लंबे समय तक इस शहर में रहे होंगे। कालिदास की कालजयी कृति मेघदूत में उज्जैन शहर का सजीव वर्णन है।

कालिदास | विकिमीडिआ कॉमन्स

उज्जैन में लगभग छठी-सातवीं सदी में खगोल विज्ञान का विकास हुआ और यह खगोलीय अनुसंधान का केंद्र बन गया। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री और बहुश्रुत वराहमिहिर उज्जैन के ही थे।उनकी सब से उल्लेखनीय रचनाएँ बृहत्संहिता और पंच सिद्धांतिका थीं। बृहत्संहिता एक विश्वकोश है, जिसमें ग्रहों की गति, ज्योतिष, समय-पालन, ग्रहण से लेकर वास्तुकला, इत्र और कृषि तक जैसे विषय शामिल हैं।पंच सिद्धांति का एक गणितीय खगोल विज्ञान ग्रंथ है, जो पांच प्राचीन ग्रंथों सूर्य सिद्धांत, रोमका सिद्धांत, पौलिसा सिद्धांत, वशिष्ठ सिद्धांत और पितामह सिद्धांत का सारांश है।

कन्नौज के हर्षवर्धन ने 7वीं सदी में उज्जैन पर नियंत्रण कर लिया था। उसी के बाद, शहर में अस्थिरता आ गई। ये अस्थिरता 9वीं सदी में परमार शासकों के आने के बाद ख़त्म हुई। परमार शासकों ने 12वीं सदी तक यहां शासन किया।

सन 1235 में इल्तुतमिश (शासनकाल 1211-1236) ने शहर में लूटपाट की और परमार साम्राज्य के पतन के बाद दिल्ली सल्तनत ने उज्जैन की बागडोर अपने हाथ में ले ली। 16वीं सदी में मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल के दौरान, उज्जैन यानी मालवा सूबा (मुग़लों के 12 शाही प्रांतों में से एक) एक सत्ता केंद्र बन गया।

18वीं सदी में उज्जैन में मराठा शक्ति का उदय हुआ। सिंधिया परिवार ने अपने संस्थापक रानोजी सिंधिया के नेतृत्व में सन 1750 में शहर पर कब्ज़ा कर लिया और इसे अपनी राजधानी बना लिया। हालांकि सन1801 में दो मराठा ख़ानदानों में, सिंधिया और होल्कर के बीच वर्चस्व के संघर्ष की वजह से उज्जैन का युद्ध हुआ, जिसमें सिंधिया की हार हुई। लेकिन दौलत सिंधिया (शासनकाल 1794-1827) की सैन्य मदद से सिंधिया ने उज्जैन पर दोबारा क़ब्ज़ा कर लिया और सन 1810 तक यह उनकी राजधानी रहा। इसके बाद ग्वालियर सिंधिया की राजधानी बन गया। अंत में, 19वीं सदी में होल्कर और सिंधिया के, ब्रिटिश आधिपत्य स्वीकार करने के बाद, उज्जैन ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया।

उज्जैन जैसे जीवंत शहर में विशेष महत्व के स्मारक होना तो तय है। इस शहर के खगोलीय महत्व का प्रमाण है, स्थापत्य अजूबा जंतर मंतर, जिसे आमेर के शासक महाराजा सवाई जय सिंह-द्वितीय (शासनकाल 1686-1743), ने बनवाया था। जय सिंह- द्वितीय एक विद्वान राजा थे, जिनकी वास्तुकला, खगोल विज्ञान और गणित में गहरी रुचि थी।

महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय | विकिमीडिआ कॉमन्स

उन्होंने उस समय फ़ारसी और अरबी भाषाओं में खगोल विज्ञान और गणित की पुस्तकों का अध्ययन किया था, और यूक्लिड के एलिमेंट्स ऑफ ज्योमेट्री का संस्कृत में अनुवाद भी किया था। मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह (शासनकाल 1719-1748) के दौर में, जब जय सिंह-द्वितीय को मालवा का सूबेदार बनाया गया, तब उन्होंने सन 1725 में उज्जैन में जंतरमंतर (शाब्दिक अर्थगणना यंत्र) बनवाया था। जंतर मंतर एक वेधशाला है, जिसमें खगोलीय यंत्र होते हैं और जिनका उपयोग दिन के समय को नापने, सूर्य और अन्य ग्रहों की अधोगति और अन्य खगोलीय अध्ययनों के लिए किया जाता है।

वेधशाला (जंतर मंतर), उज्जैन | LHI

उज्जैन के अलावा जय सिंह-II ने जयपुर, दिल्ली, वाराणसी और मथुरा, यानी चारों शहरों में ऐसे जंतर-मंतर बनवाये थे, क्योंकि वह ग्रहों की सही-सही गणना में विश्वास रखते थे। इनमें से मथुरा के जंतर-मंतर को छोड़कर सभी, आज भी काम कर रहे हैं। मथुरा का जंतर मंतर बहुत पहले समाप्त हो गया था।

शहर का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण संभवतः महाकालेश्वर मंदिर है, जो शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है ।सभी12 ज्योतिर्लिंग, शिव के सबसे पवित्र मंदिर माने जाते हैं। भारतभर में स्थित ये 12 मंदिरों के नाम पीठासीन देवता के नाम पर हैं, जिन्हें शिव के विभिन्न रूप माना जाता है।

महाकाल मंदिर | विकिमीडिआ कॉमन्स

दिलचस्प बात यह है, कि महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों की एकमात्र दक्षिण मुखी (दक्षिण दिशा की ओर) मूर्ति है।यह पांच मंज़िला मंदिर भूमिजा, मराठा और चालुक्य वास्तुकला शैलियों का मिश्रण है।दूसरी मंज़िल पर ओंकारेश्वर महादेव की मूर्ति है, और तीसरी मंज़िल पर नागचंद्रेश्वर की मूर्ति है। तीसरी मंज़िल सिर्फ़ नाग पंचमी के त्योहार पर ही खोली जाती है। हालांकि, मंदिर-निर्माण की सही तारीख़ पता नहीं है,  लेकिन मौजूदा भवन, सन 1734 में मराठा जनरल रानोजी सिंधिया ने बनवाया था, और बाद में 18वीं सदी के अंत में महादजी सिंधिया ने इसकी मरम्मत करवाई थी।

महाकालेश्वर मंदिर | ब्रिटिश लाइब्रेरी

शहर में काल भैरव मंदिर एक और पवित्र मंदिर है, जो काल भैरव को समर्पित है। काल भैरव शिव का एक उग्र रूप है।स्कंद पुराण में इस मंदिर का उल्लेख है। मौजूदा मंदिर की वास्तुकला पर मराठा प्रभाव दिखाई देता है।इस मंदिर की दीवारों पर मालवा की चित्रकारी के हल्के निशान दिखाई पड़ते हैं। लेकिन जो बात इस मंदिर को बाक़ी मंदिरों से अलग बनाती है, वह है मूर्ति पर शराब का चढ़ावा। कई भक्त देवता को शराब चढ़ाते हैं, और इसे प्रसाद के रूप में भी भक्तों को दिया जाता है!

शिप्रा नदी के तट पर स्थित कालिया देह महल उज्जैन के सबसे प्रतिष्ठित स्थानों में से एक है। यह मालवा के 15वीं शताब्दी के सुल्तान महमूद ख़िलजी के शासनकाल के दौरान, मांडू के सुल्तान ने सन 1458 में बनवाया था। ये महल ईरानी वास्तुकला का एक सुंदर उदाहरण है।

कालिया देह महल | LHI

19वीं सदी में अंग्रेज़ों के साथ पिंडारी (लुटेरे सैनिक) युद्ध के दौरान पिंडारियों ने महल को क्षतिग्रस्त कर दिया था। पिंडारी 17वीं-19 वीं सदी के लुटेरे सैनिक होते थे, जो घोड़ों पर सवार रहते थे। उन्होंने पहले मुग़लों और बाद में मराठों की सहायता की थी, और अंततः बाद में ख़ुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। वे आमतौर पर अराजकता पैदा करके, और दुश्मन की स्थिति के बारे में सूचना देकर सेना की सहायता करते थे। सन 1920 में ग्वालियर के महाराजा माधोराव सिंधिया ने महल का जीर्णोद्धार करवाया था।

आज उज्जैन शहर प्रमुख पर्यटक आकर्षणों और तीर्थ स्थलों में से एक है। ये उन स्थलों में से एक है, जहाँ बारह साल में एक बार प्रसिद्ध कुंभ मेला आयोजित किया जाता है।

मुख्य चित्र: उज्जैन घाट, ब्रिटिश लाइब्रेरी

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