उदयगिरि क़िला: भारतीय शक्ति और यूरोपीय वास्तुकला का गवाह

उदयगिरि क़िला: भारतीय शक्ति और यूरोपीय वास्तुकला का गवाह

कई भारतीय क़िलों पर विभिन्न शक्तियों का कब्ज़ा रहा है।इन्होंने या तो क़िलों में तब्दीलियॉ कीं, या फिर उनपर कब्ज़ा करके उन्हें नष्ट किया। लेकिन क्या आप जानते हैं, कि एक ऐसा भी क़िला है, जिसे भारतीयों और यूरोपीयों ने संयुक्त रूप से बनवाया है?

उदयगिरी क़िला,कन्याकुमारी ज़िले (तमिलनाडु) के तिरुवनंतपुरम-नागरकोइल राष्ट्रीय राजमार्ग पर बना हुआ है। इस क़िले का निर्माण एक भयंकर युद्ध में यूरोपीयों की हार के बाद हुआ था। इसे वेनाड शासकों (9वीं-18 वीं सदी) और डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने मिलकर बनवाया था।

उदयगिरि क़िले का दृश्य | ब्रिटिश लाइब्रेरी

यह क़िला,शुरु में क्षेत्र की क़िलेबंदी के रुप में मिट्टी से बनवाया गया था। क़िला वेनाड राजा श्री वीर रविवर्मा (सन 1565-1607 ) के शासनकाल के दौरान सन 1600 में बनवाया गया था । उदयगिरी क़िले का मक़सद धानके बेशकीमती खेतों और बेतरतीब बस्तियों की बाहरी हमलों से रक्षा करना था । कहा जाता है, कि क़िले का नाम श्री वीर के वंशज चेरा उदय मार्तंड वर्मा (सन 1383-1444 ) के नाम पर रखा गया था, जिन्हें वेनाड साम्राज्य तिरुनेलवेली क्षेत्र (वर्तमान तमिलनाडु) के भीतर तक फैलाने का श्रेय दिया जाता है। ये क़िला वेनाड शासकों को प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता था, जिनका महल पद्मनाभपुरम में 13 किलोमीटर पर स्थित है। इस समय के दौरान पश्चिमी तट में व्यापार ख़ूब फल-फूल रहा था, और व्यापार के लिये यूरोपीय व्यापारी यहां आते थे। इन लोगों के बीच समुद्री व्यापार को लेकर लड़ाई-झगड़े भी होते रहते थे।

सीरिया के ताम्बे पलट से मिला वेनाड़ शासकों का चिन्ह | विकी कॉमन्स

एक सदी से अधिक समय के बाद मार्तंड वर्मा (सन1729-1758) 24 साल की उम्र में सिंहासन पर बैठे। वह नायर सरदारों का प्रभाव कमज़ोर होने के बाद अपने राज्य का विस्तार करना चाहते थे। इस बीच डच ईस्ट इंडिया कंपनी का भारतीय प्रायद्वीप में प्रभाव बढता जा रहा था, और सारे विश्व में मसालों के व्यापार पर उसका वर्चस्व था। डच ईस्ट इंडिया कंपनी ख़ासतौर पर मालाबार से अपना व्यापार करती थी। मार्तंड वर्मा की विस्तारवादी नीति से कंपनी चिंतित हो गई, क्योंकि इस क्षेत्र में उसके ‘शांतिपूर्ण तरीके’ से चल रहे व्यापार के लिये ख़तरा पैदा हो गया था।

कंपनी की चिंता तब और बढ़ गई, जब मार्तंड वर्मा ने ओदंड साम्राज्य (वर्तमान अलाप्पुझा,केरल) की राजधानी कायमकुलम पर निशाना साधा जो अपने काली मिर्च उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थी। राजा ने मालाबार क्षेत्र में व्यापार अधिकारों के संबंध में अंग्रेजों के साथ एक संधि भी की हुई थी। सीलोन के डच गवर्नर, गुस्ताफ़ विलेम वैन इम्हॉफ़ ने मार्तंड वर्मा से मुलाक़ात की, और उन्हें कायमकुलम पर हमला करने के परिणामों के बारे में चेतावनी दी। लेकिन मार्तंड वर्मा ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया, और इस तरह उन्होंने, डच को युद्ध के लिये उकसा दिया।

मार्तंड वर्मा

सन 1741 की शुरुआत में कैप्टन यूस्टाचियस बेनेडिक्टस डीलैनॉय (1715-1777 ) के नेतृत्व में कोल्लम और कायमकुलम की सेनाओं के साथ डच पद्मनाभपुरम पर कब्ज़ा करने के लिए सीलोन से कन्याकुमारी के पास कोलाचेल क़िले में पहुंचे। आसपास के गांवों पर कब्ज़ा करने के बाद, वे आगे बढ़ने लगे, और शाही महल के पास पहुंच गये। लेकिन मार्तंड वर्मा के भाग्य से जब डच को जीते गये क्षेत्रों पर क़ाबू पाने के लिए अतिरिक्त सैनिकों की ज़रूरत थी, तब उन्हें सीलोन और बटाविया से अतिरिक्त सेना नहीं मिल सकी, क्योंकि वह उस समय जावा युद्ध (1740-41 ) में व्यस्त थी।

कोलाचल

मई सन 1741 के अंत तक मानसून आया, जो मार्तंड वर्मा के लिये वरदान साबित हुआ। मानसून की वजह से डच को अतिरिक्त फौजी नहीं मिल पाये, और वे अपनी बारूद को भी गीले होने से नहीं बचा सके। इस सुनहरे अवसर का फ़ायदा उठाते हुए मार्तंड वर्मा ने डच जहाज़ों पर हमला करने के लिए अपनी नौकाओं को तैनात किया, और कोलाचेल क़िले को घेर लिया। उसके बाद, तोपें दाग़कर डच के शस्त्रागार और खाद्य आपूर्ति को नष्ट कर दिया। आख़िरकार भूख और गोला-बारूद ख़त्म हो जाने की वजह से 10 अगस्त, सन 1741 को डच ने आत्मसमर्पण कर दिया।जनरल डीलैनॉय को इस शर्त पर बख़्श दिया गया, कि वह मार्तंड वर्मा की सेना को यूरोपीय युद्ध-कला में प्रशिक्षण देगा।

डीलैनॉय मार्तण्ड वर्मा के सामने आत्मसमर्पण करते हुए

भारतीय प्रायद्वीप में बढ़ते यूरोपीय प्रभाव को देखते हुए, मार्तंड वर्मा ने अपने राज्य के क़िलों को मज़बूत करने का फैसला किया। किलेबंदी के बारे में डीलैनॉय को अच्छा ज्ञान था। यह बात जानते हुये मार्तंड वर्मा ने डीलैनॉय को क़िलेबंदी और किलों की मरम्मत करवाने का आदेश दिया। इस तरह सन 1741 के अंत में उदयगिरि क़िले की दोबारा तामीर का काम शुरू हुआ।

उदयगिरी क़िला ग्रेनाइट और बड़े-बडे चोकोर पत्थरों से बनाया गया, जिसकी दीवारें लगभग 270 फ़ुट तक ऊंची थीं। क़िले में सेना का गढ़ भी बनाया गया । यहां एक शस्त्रागार भी बनाया गया, जहां बड़े पैमाने पर हथियार और गोला-बारूद बनाया जाता था। लगभग 85 एकड़ के क्षेत्र में फैले क़िले में दस बुर्ज थे, जिनमें से पांच बुर्ज पर तोपें लगाई गईं थीं, और बाक़ी पर सिपाही तैनात किये गये। क़िले में तैनात सैनिकों के लिए बैरक बनाये गये। साथ ही डच सैनिकों के लिए एक रोमन कैथोलिक चर्च भी बनाया गया था।यहीं पर डीलैनॉय ने मार्तंड वर्मा के सैनिकों को यूरोपीय युद्ध शैली की ट्रैनिंग दी थी। इस तरह त्रावणकोर नायर ब्रिगेड का आधार तैयार हुआ। डीलैनॉय के प्रयासों की वजह से क़िला स्थानीय लोगों में दिलनई कोट्टई (डीलैनॉय का क़िला) के नाम से प्रसिद्ध हो गया । लैनॉय को वालिया कप्पीतन (महान सेनापति) का ख़िताब भी दिया गया।

उदयगिरि किले में मौजूद जानकारी देती एक शिला

मार्तंड वर्मा ने काली मिर्च के व्यापार पर अपना एकाधिकार कर लिया था, और डच को कमज़ोर कर दिया था। उन्होंने काली मिर्च के अन्य उत्पादक क्षेत्रों पर विजय प्राप्त की, जिससे उनका प्रांत ख़ुशहाल हो गया। सन 1750 में उन्होंने भगवान पद्मनाभास्वामी के चरणों में अपना ख़ज़ाना अर्पित कर दिया, और इस तरह उन्हें ‘श्रीपद्मनाभदास’ या ‘भगवान के सेवक’ की उपाधि मिल गई। उनकी राजधानी का नाम भगवान पद्मनाभास्वामी के नाम पर ही रखा गया था। त्रावणकोर के शासक पीढ़ियों तक इस परंपरा का पालन करते रहे। सन 1758 में उनकी मृत्यु के बाद भी त्रावणकोर साम्राज्य की फौजी ताक़त लगातार बढ़ती रही। साम्राज्य का मुख्यालय उदयगिरि क़िले में ही रहा। डीलैनॉय सन 1777 में अपनी मृत्यु तक, अपने मालाबार आक़ाओं की सेवा में रहे। उदयगिरी किले के अंदर ही लैनॉय का मक़बरा है। वहीं उनके परिवार के सदस्यों की क़ब्रें भी हैं। मक़बरे पर पत्थर का क्रॉस बना हुआ है, जिस पर तमिल और लातिन भाषा में कुछ लिखा हुआ है।

उदयगिरि क़िले में मौजूद डीलैनॉय की कब्र

सन 1795 में त्रावणकोर साम्राज्य के साथ सहायक गठबंधन के तहत, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने साथ त्रावणकोर और उसके आसपास नायर ब्रिगेड के साथ अपनी सेना तैनात कर दी थी। सेना का एक हिस्सा सन 1858 तक उदयगिरी क़िले में तैनात रहा था। ब्रिटिश सरकार के भारत का प्रशासन अपने हाथ में लेने के बाद क़िला वीरान हो गया। सन 1818 में नायर ब्रिगेड को पुनर्गठित किया गया था । सन 1935 में नायर ब्रिगेड, ब्रिटिश भारतीय सेना का हिस्सा बनीं और फिर, सन 1947 में भारत के आज़ाद होने के बाद नायर ब्रिगेड, मद्रास रेजिमेंट की 9वीं और 16वीं बटालियन बन गई।

उदयगिरि क़िला अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में है। हाल ही में तमिलनाडु सरकार और एशियन डेवलपमेंट बैंक के सहयोग से इसकी मरम्मत करवाई थी। क़िले में अब एक जैव-विविधता पार्क भी है, जो तमिलनाडु वन विभाग की देखरेख में है। ये क़िला अब भारतीय शक्ति और यूरोपीय वास्तुकला की प्रतिभा का गवाह है।

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