दिल्ली की क़ुतुब मीनार

आगरा का नाम आते है ज़हन में ताजमहल की तस्वीर उभर आती है। ऐसा ही कुछ दिल्ली को भी लेकर होता है जहां क़ुतुब मीनार है। बरसों से क़ुतुब मीनार दिल्ली की पहचान बना हुआ है। इसने अपने 800 साल के इतिहास में कई जंगें देखीं, कई सियासी उठापटक देखी हैं। दिल्ली की कहानी अगर कोई ऐतिहासिक स्मारक बेहतर तरीक़े से सुना सकता है तो वो है क़ुतुब मीनार।

10वीं ई. में पूरा एशिया प्रायद्वीप, फ़ारस और पश्चिम एशिया से लगे अन्य हिस्से, मिस्र तथा भूमध्यसागरीय इलाक़े, इस्लामी ख़िलाफ़त का हिस्सा हुआ करते थे। आधुनिक अफग़ानिस्तान में ख़िलाफ़त की सीमाओं पर एक सीमांत साम्राज्य हुआ करता था जहां ग़ौर के सुल्तान मोहम्मद का शासन होता था। इस दौरान मोहम्मद ग़ौरी की नज़र समृद्ध और संपन्न हिंदुस्तान पर पड़ी।

मोहम्मद ग़ौरी हिंदुस्तान में लूटपाट करना चाहता था लेकिन उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती था दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान जो लालकोट में अपनी राजधानी क़िला राय पिथोड़ा से शासन करते थे । लाल कोटा अब महरोली के नाम से जाना जाता है। सन 1191 में ग़ौरी ने पृथ्वीराज चौहान से युद्ध किया लेकिन उसे हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन एक साल बाद यानी सन 1192 में उसने भारी सेना के साथ फिर हमला किया और इस बार वह कामयाब हो गया। राजस्थान के लोक कवियों के अनुसार दूसरे हमले के कुछ पहले ही पृथ्वीराज चौहान की नयी नयी शादी हुई थी और वह इसी में मशगूल थे। ज़ाहिर है ऐसे में वह हमले के लिये बिल्कुल तैयार नही थे। ग़ौरी और चौहान तराइन (अब हरियाणा का तारोरी) में एक बार फिर आमने सामने हुए। ये वही जगह थी जहां पृथ्वीराज चौहान ने सन 1191 में ग़ौरी को करारी शिक़स्त दी थी लेकिन इस बार युद्ध का नतीजा कुछ और ही निकला और पृथ्वीराज चौहान हार की हार हुई । हार के बाद पृथ्वीराज चौहान को बंदी बनाकर ग़ौर ले जाया गया जहां उनकी हत्या कर दी गई। जीत के बाद मोहम्मद ग़ौरी अपने पसंदीदा ग़ुलाम क़ुतुबउद्दीन ऐबक को क़िला राय पिछोड़ा का सूबेदार बनाकर वापस ग़ौर लौट गया।

क़ुतुबउद्दीन ने क़िला राय पिथोड़ा (महरोली) में उत्तर भारत की पहली बड़ी जामा मस्जिद बनाई जिसका नाम उसने क़ुव्वत-उल-इस्लाम रखा जिसका मतलब होता है इस्लाम की ताक़त। मस्जिद में मिले क़तुबउद्दीन के शिला-लेखों के अनुसार ये मस्जिद 27 हिंदू और जैन मंदिरों को तोड़कर बनवाई गई थी। मस्जिद के विशाल अहाते में उत्तर, दक्षिण और पूर्व दिशा की तरफ़ तीन विहार हैं और पश्चिम दिशा में एक तीन मेहराब है। बीच की मेहराब सबसे ऊंची है और इसकी दिशा मक्का की तरफ़ है यानी इस दिशा में नमाज़ पढ़ी जीती है।

सन 1193 में क़ुतुबउद्दीन ने क़ुव्वत-उल-इस्लाम के दक्षिण-पश्चिम की तरफ़ एक विशाल मीनार बनाने का काम शुरु किया। उसने इसका नाम क़ुतुब मीनार रखा। सन 1206 में मोहम्मद ग़ौरी का निधन हो गया और क़ुतुबउद्दीन ने भारतीय प्रांतों पर कब्ज़ा कर ख़ुद को सुल्तान घोषित कर दिया। इस तरह से भारत में इस्लामिक राज और ग़ुलाम वंश की शुरुआत हुई।

क़ुतुब मीनार के साथ कई क़िस्से-कहानियां जुड़ी हुई हैं। एक क़िस्से के अनुसार ये मीनार पृथ्वीराज चौहान ने बनवाई थी ताकि यहां से उनकी पत्नी यमुना के दर्शन कर सके। लेकिन इस कथा का कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। कुछ लोगों का ये भी मानना है कि पृथ्वीराज ने विजय के प्रतीक के रुप में ये मीनार बनवाई थी लेकिन इसका भी इतिहास में कोई उल्लेख नहीं मिलता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि क़ुतुब मीनार विशुद्ध रुप से इस्लामिक अवधारणा है। क्योंकि यहां जगह जगह क़ुरान की आयतें लिखी हुई हैं और कई शिला-लेख भी हैं। कुछ ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि क़ुतुब मीनार का नाम क़ुतुबउद्दीन ऐबक के नाम पर नहीं बल्कि सूफ़ी संत क़ुतुबउद्दीन बख़्तियार काकी के नाम रखा गया था हालंकि ये भी इतिहास सम्मत नहीं है।

क़ुतुब मीनार 72.5 मीटर ऊंचा है और विश्व में ये आज भी ईंट और पत्थर की बनी सबसे ऊंची ईमारत है । क़ुतुब मीनार पांच मंज़िला है। नीचे की तीन मंज़िलें लाल बलुआ पत्थर की हैं जबकि ऊपर की बाक़ी दो मंज़िलें संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर की बनी हैं। इसके निचले हिस्से का व्यास 14.3 मीटर है और चोटी के हिस्से का व्यास 2.7 मीटर है।

क़ुतुब मीनार की डिज़ाइन तुर्की के वास्तुकारों ने तैयार की थी और भारतीय शिल्पियों ने मीनार का निर्माण किया था। क़ुतुब मीनार,मीनार-ए-जाम (सन 1192 ) और ग़ज़नी (आरंभिक एवं मध्य 12 ई.) की मीनारों से प्रेरित है। जाम औऱ ग़ज़नी दोनों शहर अफ़ग़ानिस्तान में हैं। क़ुतुब मीनार की देखा देखी भारत में कई और मीनार बनाये गये हैं जैसे दक्षिण में दौलताबाद का चांद मीनार। क़ुतुब मीनार के उभरे हुए कोणीय किनारे तो ग़ज़नी के मानारों की हुबहू नक़ल है।

क़ुतुब मीनार की अभी एक ही मंज़िल बन पाई थी कि क़ुतुबउद्दीन ऐबक का निधन हो गया। उसके उत्तराधिकारी और ग़ुलाम इल्तुतमिश ने बाक़ी तीन मंज़िलें बनवाईं । जी हां, क़ुतुब मीनार पहले चार मंज़िला ही थी। मीनार के किनारों पर कारीगरी की हुई है जो नीचे तीन मंज़िलों तक देखी जा सकती है। हर मंज़िल में एक बालकनी है। मीनार के किनारों पर क़ुरान की आयतें लिखी हुई हैं । इसके अलावा किनारों पर फूल, घंटियां और घुंघरु की भी नक़्क़ाशी है जो हिंदू मूल भाव को दर्शाते हैं । इससे साबित होता है कि मीनार हिंदू शिल्पियों ने बनाया था। सबसे नचली मंज़िल के गोल और कोणीय दोनों तरह के किनारे हैं। दूसरी मंज़िल के सिर्फ़ गोल किनारे हैं जबकि तीसरी मंज़िल के किनारें सिर्फ़ कोणीय हैं । सभी बालकनियों में मधुमक्खी के छत्ते की तरह ख़ूबसूरत नक़्क़ाशीदार जालियों की रैलिंग लगी हुई हैं । ये रैलिंग इस्लामिक वास्तुकला अल-हलिमत अल-औलिया का शानदार नमूना है। सन 1369 में ज़बरदस्त बिजली गिरने की वजह से मीनार की सबसे ऊंची चौथी मंज़िल गिर गई थी। इस घटनाके बाद दिल्ली और उत्तर तथा मध्य भारत के शासक सुल्तान फ़ीरोज़शाह तुग़लक ने बलुआ पत्थर और संगमरमर से टूटी हुई मंज़िल फिर बनवाई और ऊपर गुंबद बनवाया।

क़ुतुब मीनार दिल्ली का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है । सन 1505 में जब भूकंप से इसे नुक़सान पहुंचा तब लोधीवंश के शासक सिकंदर लोधी ने इसकी मरम्मत करवाई थी। 16वीं शताब्दी में शेर शाह सूरी (1538-1545) ने क़ुतुब मीनार का प्रवेश द्वार बनवाया था और बाद में मुग़लों ने यहां चार-बाग़ और सराये बनवाईं। अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र ने मीनार-परिसर में प्रवेश के लिये एक द्वार बनवाया था जहां से आज भी लोग अंदर प्रवेश करते हैं। क़ुतुब-परिसर में इल्तुतमिश का मक़बरा भी है। इसके अलावा यहां अधूरी अलाई मीनार और मदरसा है जो अलाउद्दीन ख़िलजी (1267-1316) ने बनवाया था। यहीं वह भी दफ़्न है। सन 1300 में अलाउद्दीन ख़िलजी क़ुतुब मीनार से दोगुनी ऊंची का अलाई मीनार बनाना चाहता था लेकिन सन 1316 में उसके निधन की वजह से ये मीनार अधूरा रह गया।

अलाउद्दीन ख़िलजी ने क़ुव्वत-उल-इस्लाम के दक्षिण की तरफ़ अलाई दरवाज़ा भी बनवाया था। यहां आपको क़ुव्वत-उल-इस्लाम के इमाम ज़ामिन का मक़बरा मिलेगा। ज़ामिन मुग़ल बादशाह हुमांयू के शासनकाल में इसके इमाम हुआ करते थे। पूरे इस्लामिक दौर में क़ुतुब मीनार परिसर का महत्व रहा था।

सन 1803 में एक बार फिर भूकंप आया जिसमें क़ुतुब मीनार का गुंबद नीचे गिर गया था। अंग्रेज़ सरकार ने क़ुतुब की मरम्मत करवाने का फ़ैसला किया और उन्होंने कई शिला-पट्टियां बदल दीं जिन पर लिखाई को खुरच दिया गया था। सन 1823 में मेजर स्मिथ ने क़ुतुब मीनार के लिये एक नया गुंबद बनवाया लेकिन ये इतने फूहड़ तरीक़े से बना था कि इसे क़ुतुब मीनार से हटाना पड़ा। ये गुंबद परिसर में ही पड रखा है जिसे स्मिथ की मूर्खता के नाम से जाना जाता है। हालंकि शिला-लेखों को बदलने की अंग्रेज़ों की मंशा ठीक थी लेकिन ये काम उन्होंने ठीक से नहीं किया और वो सुंदर अभिलेख जो कभी मीनार की शोभा बढ़ाते थे अब बेमतलब और अस्पष्ट दिखआई देते हैं। मीनार के बाहर एक बड़ा शिला-लेख है लेकिन किसी ने भी इसकी ठीक से व्याख्या नहीं की है।

आज दिल्ली और भारत की धरोहरों में क़ुतुब मीनार एक सुंदर नगीने के समान है। ये भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षित स्मारकों की सूची में है। ये विभाग ही इसका रखरखाव करता है। क़ुतुब मीनार लोगों क् लिये एक लोकप्रिय और ऐतिहासिक स्थल है जहां हर रोज़ हज़ारों लोग आते हैं। सन 1980 में मीनार के अंदर भगदड़ मच गई थी जिसमें कई बच्चों की मृत्यु हो गई थी। इस घटना के बाद से मीनार की ऊपरी मंज़िल पर जाने की मनाही कर दी गई थी। इसके बावजूद आज भी यहां स्कूल, कॉलेज के छात्र, कलाकार, फ़ोटोग्राफ़र, इतिहास में दिलचस्पी रखने वाले लोग, वास्तुकार और इतिहासकार बड़ी संख़्या में हर रोज़ आते हैं।

सन 1993 में यूनेस्को ने क़ुतुब मीनार को अपनी विश्व धरोहर की सूची में शामिल कर लिया था।

शीर्षक चित्र: यश मिश्रा

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