लखनऊ की अमीरुद्दौला लाइब्रेरी

लखनऊ में अब न तो नवाब हैं और न ही उनकी शान-ओ-शौक़त लेकिन आज भी कई ऐसी शानदार इमारतें हैं जो हमें नवाबों के दौर की याद दिलाती हैं। लखनऊ अद्भुत स्मारकों और वास्तुकला के नमुनों का गढ़ है लेकिन साथ ही यहां प्रतिष्ठित शैक्षिक संस्थान और ऐतिहासिक लाइब्रेरी भी हैं जहां बरसों पुरानी किताबें, पांडुलीपियां और दस्तावेज़ रखे हुए हैं। ऐसी ही एक लाइब्रेरी है अमीरउद्दौला जो शुरूआत में यहां वहां भटकते हुए आख़िरकार क़ैसरबाग़ लखनऊ में स्थापित हो गयी। इस लाइब्रेरी में ऐसे साहित्यिक विभूतियों की किताबे हैं जिन्होंने विश्व में अपनी छाप छोड़ी है।

लखनऊ में अमीरउद्दौला पब्लिक लाइब्रेरी ऐतिहासिक “सफेद बारादरी” की पृष्भूमि में हरे-भरे पेड़ों के बीच स्थित हैं। पढ़ने के शौकीन लोगों की पसंदीदा ये लाइब्रेरी वास्तुकला की सुंदरता के मामले में क़ैसरबाग़ हेरिटेज इलाक़े की शोभा बढ़ाती है। क़ैसरबाग़ लखनऊ का दिल है और कहा जाता है कि आप इसकी घड़कन अमीरउद्दौला लाइब्रेरी से मेहसूस कर सकते हैं। इस लाइब्रेरी की स्थापना 19वीं शताब्दी में हुई थी और यहां संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, तिब्बती और बर्मी भाषाओं में लिखित पांडुलिपियों सहित लाखों किताबें हैं।

सन 1882 में अमीरउद्दौला लाइब्रेरी राज्य संग्रहालय लखनऊ का हिस्सा हुआ करती थी जिसे तब प्रांतीय संग्रहालय कहा जाता था। सन 1887 में इस लाइब्रेरी को किताबों के शीक़ीन लोगों के लिये खोल दिया गया था। सन 1907 में लाइब्रेरी की किताबों को क़ैसरबाग़ में लाल बारादरी की ऊपरी मंज़िल में शिफ़्ट कर दिया गया। लाल बारादरी भवन नवाब सआदत अली ख़ान (1798-1814) ने बनवाया था। सन 1910 में एक बार फिर किताबों को छोटा छत्तर मंज़िल में पहुंचा दिया गया जिसकी वजह पता नहीं है। यहां इसे आम लोगों के लिये खोल दिया गया। इधर उधर घूमते हुए आख़िरकार सन 1926 में किताबों को क़ैसरबाग़ में अपना स्थायी ठिकाना मिल गया।

सन 1926 में लाइब्रेरी के लिये एक ख़ास भवन बनवया गया जहां लोग पढ़ने आ सकते थे। एक लाइब्रेरी की ज़रुरत को देखते हुए ये भवन मेहमूदाबाद के राजा अमीर हसन ख़ान की आर्थिक मदद से बनवाया गया था। अवध के ताल्लुक़दारों ने लाइब्रेरी संयुक्त प्रांतों की सरकार को उपहार में दे दी थी और इसका नाम मोहम्मद अमीर हसन ख़ान के नाम पर रखा गया था जिन्हें अमीरउद्दौला का ख़िताब मिला हुआ था। महाराजा सर मोहम्मद अमीर हसन ख़ान, ख़ानबहादुर सन 1858 से लेकर 27 जून सन 1903 तक मेहमूदाबाद के राजा रहे थे और वह अंग्रेज़ों की हुक़ुमत वाले भारत में एक प्रमुख ज़मींदार थे। उनके पिता राजा मोहम्मद नवाब अली ख़ान (मृत्यु 1858) मेहमूदाबाद के तालुक़ के जागीरदार थे। मोहम्मद अमीर हसन ख़ान का जन्म अवध के सीतापुर ज़िले के अमरोहा में हुआ था। सन 1858 में पिता के निधन के बाद वह मेहमूदाबाद के राजा बन गए। मार्च सन 1867 में उन्होंने तालुक़ का प्रबंधन अपने हाथों में ले लिया। मेहमूदाबाद रियासत संयुक्त प्रांतों में बड़ी रियासतों में से एक थी। सन 1903 में उनके निधन के बाद उनकी याद में अमीरउद्दौला लाइब्रेरी बनाने का फ़ैसला किया गया था।

7 फ़रवरी सन 1904 में अंजुमन हिंद के अजीवन अध्यक्ष महाराजा सर प्रताप नारायण सिंह ने बोर्ड की आमसभा में घोषणा की कि स्वर्गीय राजा अमीर हसन ख़ान को श्रद्धांजलि देने के लिये एक स्मारक बनाया जाना चाहिये। उन्होंने कहा चूंकि राजा अमीर हसन ख़ान विद्वान, बुद्धिजीवी और शिक्षा के ज़रिये लोगों का उत्थान करते थे, इसलिये उनके सम्मान में एक लाइब्रेरी होनी चाहिये। लाइब्रेरी के स्थान और इसके लिये धन की व्यवस्था के मक़सद से एक प्रवर समिति बनाई गई। इस समिति ने एक रिपोर्ट तैयार की और लाइब्रेरी के निर्माण के लिये 67हज़ार 500 रुपये की अनुमानित राशि की सिफ़ारिश की।सन 1921 में सर हरकोर्ट बटलर ने लाइब्रेरी की आधारशिला रखी और सन 1947 में अवध के ताल्लुक़दारों के संगठन ने लाइब्रेरी के सामने एक पार्क बनाने के लिये ज़मीन देदी और इस तरह अमीरउद्दौला लाइब्रेरी की शुरुआत हुई ।

साहित्यकार भवानी शंकर शुक्ल का कहना है कि “भारत में कई पुस्तकालय हैं लेकिन अमीरउद्दौला लाइब्रेरी ख़ास है, सिर्फ़ इसलिये नहीं कि यहां आम लोग आकर पढ़कर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि इसलिये भी है कि इसका ऐतिहासिक महत्व भी है। यहां अवध से संबंधित किताबों का ख़ज़ाना है जिससे हमें उस समय के अवध की संस्कृति, कला,साहित्य और इतिहास के दर्शन करवा देती है।”

इसमें कोई शक़ नहीं कि अमीरउद्दौला लाइब्रेरी लखनऊ के इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा है। इस लाइब्रेरी में हिंदी,उर्दू, अंग्रेज़ी, बंगाली, संस्कृत, अरबी और फ़ारसी सहित सात भाषाओं में क़रीब दो लाख किताबें हैं। पांडुलीपियां संस्कृत,फ़ारसी, अरबी, तिब्बती, पाली और बर्मी भाषा में हैं। यहां खजूर के पेड़ की पत्तियों पर लिखा बौद्ध साहित्य भी है।

लाइब्रेरी में सन 1873 के समय की टेक्सटाइल डिज़ाइनिंग से संबंधित किताबें भी हैं। यही नहीं, यहां कुछ ऐसी दुर्लभ पांडुलीपियां हैं जो लगभग 1247 के समय की हैं। यहां 272 प्राचीन संस्कृत, 8 अरबी, 56 फ़ारसी और छह उर्दू पांडुलीपियां हैं। पांडुलीपियों का ये दुलर्भ संकलन सिर्फ़ अमीरउद्दौला लाइब्रेरी में ही मिलेगा। इस लाइब्रेरी में भोजपत्र (birch bark) पर लिखी प्राचीन पांडुलीपियां भी सुरक्षित रखी हुई हैं। यहां तामपत्र पर लिखी पांडुलीपियां भी हैं जैसे ईशावास्योपनिषद- संस्कृत में 18 मंत्रों का संकलन, प्रश्नोपनिषद-हिंदू धर्म से संबंधित प्रश्नों और उत्तरों का संकलन, केनापनिषद-गद्य और पद्ध में दो खंड, कठोपनिषद-नचिकेता और यमराज के बीच संवादों का संकलन, ज़ैनउद्दीन अल अमली द्वारा फ़ारसी में लिखित एश-शाहुल-लामा (इस्लाम की व्याख्या), आयती बयानात (अज्ञात लेखक द्वारा क़ुरान की आयतों का वर्णन), किताब-उल-तहारत और फ़िक़ह-हनफ़ी। इस तरह का यहां और भी कई दुर्लभ और प्राचीन साहित्य मौजूद है।

पाठकों के लिये लाइब्रेरी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है मुंशी नवल किशोर गैलरी जहां मुंशी नवल किशोर की निजीकिताबें रखी हुई हैं। इसके अलावा यहां सन 1880 की दुर्लभ प्रिंटिंग मशीने भी हैं। मुंशी नवल किशोर भारत में हिंदी और उर्दू छपाई के अग्रदूतों में से एक थे। इस गैलरी में प्राचीन किताबों के भंडार के अलावा लखनऊ के इतिहास को बयान करती तसेवीरों का भी संकलन है। इन तस्वीरों में आप समय के साथ बदलते लखनऊ शहर को देख सकते हैं।

आज इस लाइब्रेरी में छात्र, शोधकर्ता, वरिष्ठ नागरिक और पुस्तक प्रेमी आते हैं। इस लाइब्रेरी के 5334 आजन्म सदस्यऔर 266 सामान्य सदस्य हैं। अमीरउद्दौला लाइब्रेरी लखनऊ वालों के लिये महज़ एक लाइब्रेरी ही नहीं बल्कि एक ऐसी जगह है जहां वे किताबों के प्रति अपने प्रेम को आपस में बांटते हैं। दरअसल ये तीन मंज़िला अमीरउद्दौला लाइब्रेरी अपने आप में एक इतिहास है।

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