भारत के 5 खोये हुए किले 

क्या आपको पता है पूरे भारत में 1000 से भी ज़्यादा किले हैं जो हमे भारत के गौरवशील ऐतिहास के बारे में बताते हैं। वैसे तो सबसे ज़्यादा किले महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे बड़े राज्य में हैं लेकिन आपको भारत के कोने-कोने में किलों के अवशेष मिलेंगे। राजा महाराजा किलों का निर्माण विदेशी आक्रमणकारियों से सुरक्षा के लिए करवाते थे।

हर किले में अपनी ख़ास वास्तुकला और संस्कृति होती हैं जो इन्हे और भी दिलचस्प बनाती है । आज हम आपको ऐसे ही भारत के 5 किलों के बारे में बताते हैं।

1- मुंगेर का क़िला, बिहार

इसने न सिर्फ़ बिहार-बंगाल-ओडिशा , बल्कि दिल्ली-सल्तनत के तख़्तो-ताज की लड़ाइयां भी देखी हैं । सलतनत और मुग़ल-काल की घटनाओं का जिक़्र करते हुए इतिहासकार डॉ.क़यामुद्दीन अहमद बताते हैं कि उत्तर भारत में, शुरुआती दौर में बिहार के इसी क्षेत्र में अपनी ताक़त दिखा कर शेर शाह दिल्ली के तख़्त पर आसीन हुआ था। शाह शुजा और मीर क़ासिम के दौर में मुंगेर को बंगाल की राजधानी बनने का मौक़ा मिला था।

इसने न सिर्फ़ बिहार-बंगाल-ओडिशा , बल्कि दिल्ली-सल्तनत के तख़्तो-ताज की लड़ाइयां भी देखी हैं । सलतनत और मुग़ल-काल की घटनाओं का जिक़्र करते हुए इतिहासकार डॉ.क़यामुद्दीन अहमद बताते हैं कि उत्तर भारत में, शुरुआती दौर में बिहार के इसी क्षेत्र में अपनी ताक़त दिखा कर शेर शाह दिल्ली के तख़्त पर आसीन हुआ था। शाह शुजा और मीर क़ासिम के दौर में मुंगेर को बंगाल की राजधानी बनने का मौक़ा मिला था।अंग्रेज़ों के समय में भी इस क़िले का उपयोग सैनिक छावनी के रूप में किया गया था।

क़िले के अहाते में स्थित दो में से एक टीले पर महाभारत-कालीन योद्धा अंगराज कर्ण के नाम से जुड़े ‘कर्णचौरा’ के बारे में हे मिस्टर बुकानन बताते हैं कि यहां पर किसी राजा कर्ण के भवन के अवशेष पर अंग्रेज़ अधिकारी जनरल गोड्डार्ड ने अपने कमांडिंग ऑफ़िसर के लिये एक बंगले का निर्माण करवाया था।

इस क़िले की ख़ास अहमियत होने के दो प्रमुख कारण हैं : पहला है क्योंकि यह मुग़ल-काल में दिल्ली और बंगाल के बीच प्रमुख मार्ग पर स्थित है। बंगाल अभियान के दौरान बादशाह हुमायूं का क़ाफ़िला इसी रास्ते से गूज़रा, तो सन1573 और सन 1575 में इसने अकबर की फ़ौज की चहलक़दमी भी देखी। डॉ.बीपी.अम्बष्ट ‘बिहार इन द् एज आफ़ द ग्रेट मुग़ल अकबर ” में बताते हैं कि मुंगेर, बिहार सूबे के पूरब में स्थित अंतिम क्षेत्र था और बंगाल और बिहार सूबों की सीमा का रोल अदा करता था। मुंगेर से मात्र 130 किमी की दूरी पर तेलियागढ़ी का क़िला मौजूद है जिसे पार करके ही, उन दिनों, बंगाल की सीमा में प्रवेश किया जा सकता था। ‘आईन-ए-अकबरी’ के अनुसार बादशाह अकबर के समय में बिहार प्रांत सात ‘सरकारों’ में बंटा था जिसमें एक मुंगेर था।

‘मुंगेर सरकार’ में 31 ‘महाल’ थे जो सूरजगढ़ा के पश्चिम क्यूल नदी से लेकर बंगाल की सीमा तेलियागढ़ी तक फैले थे।और पढ़ें

2- असीरगढ़ का क़िला, मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश की दक्षिणी सीमा के पास, ताप्ती नदी घाटी के पूर्वी किनारे पर जो क्षेत्र है, वह खानदेश कहलाता है।और खानदेश के मैदानी इलाके में 900 फीट ऊँचा उठता एक किला है, जिसे असीरगढ़ के नाम से जाना जाता है। हालांकि असीरगढ़ आज एक भूली बिसरी जगह हो चुकी है लेकिन इसका एक शानदार इतिहास रहा है और यहां कई राजवंशों ने राज किया है।

असीरगढ़ की कहानी को समझने के लिये पहले उसके भूगोल को समझना होगा। हरे-भरे सतपुड़ा पर्वतमाला से घिरे असीरगढ़ को दक्कन का द्वार भी कहा जाता है क्योंकि प्राचीन समय से ही, उत्तरी भारत से दक्कन प्लेटू पहुंचने के लिये, असीरगढ़ होकर ही जाना होता था।

दक्कनी इतिहास के माहिर पुष्कर सोहोनी हमें बताते हैं, “ऐतिहासिक रूप से, असीरगढ़ उन दो मार्गों में से एक था जिनके माध्यम से दक्षिण भारत को उत्तर से पहुँचा जा सकता था। दूसरा था मांडू।” असीरगढ़ ने उत्तर भारत और दकान के बीच प्रमुख व्यापार मार्ग को भी नियंत्रित कर राखा था। “ऊंची पहाड़ी पर बना यह मज़बूत क़िला दूर से ही अपनी उपस्थिति का अहसास दिला देता है। साथ ही आसपास के मैदानी इलाक़ों पर नज़र रखने में भी मदद करता है।”और पढ़ें

3- बेंगलुरु किला, कर्नाटक

बंगलुरु को आज भारत की आईटी राजधानी माना जाता है जहां देश भर से लोग पढ़ने और नौकरी करने आते हैं। लेकिन यहां रहने वाले और बाहर से आने वाले ज़्यादातर लोगों को बंगलुरु क़िले और इसके अद्भुत इतिहास के बारे में कोई ख़ास जानकारी नहीं है। पेश है बंगलुरु क़िले के बारे में 5 ऐसी बातें जो शायद आपको भी न मालूम हों।

सन 1537 में विजयनगर साम्राज्य के स्थानीय प्रमुख हिरिया केंपे गौड़ा ने अपनी राजधानी के लिए एक जगह चुनी थी। जिसे आज हम बंगलुरु के नाम से जानते हैं। केंपे गौड़ा ने राजधानी केचारों तरफ़ मिट्टी की दीवारें बनवाईं गई थीं । इस तरह बंगलुरु का पहला क़िला वजूद में आया था। ये दीवारें क़रीब 2.24 स्क्वैयर कि.मी. में फैली हुईं थीं। मिट्टी के क़िले के अंदर गौड़ा ने जनता के लिए सड़कें और बाज़ार आदि बनवाए। उनके बनवाए कई बाज़ार आज भी मौजूद हैं। इसके अलावा पत्थर के सात में से चार बुर्ज, लालबाग़ में, बांदी महाकाली मंदिर के पीछे, मेखरी सर्किल के पास केंपेगौड़ा टॉवर पार्क और उल्सूर नहर के पास आज भी देखे जा सकते हैं।

बेंगलुरु के पहले क़िले के निर्माण के दौरान दीवार का एक हिस्सा लगातार गिर रहा था । ऐसा माना गया कि किसी बड़ी दुर्घटना को रोकने के लिए और भगवान को प्रसन्न करने के लिये, किसी गर्भवती महिला का बलिदान करना होगा। लेकिन केंपे गौड़ा ने इसकी इजाज़त नहीं दी। इस विकट स्थिति से केंपे गौड़ा को बचाने के लिए उनकी गर्भवती बहू लक्ष्मी देवी ने आधी रात को घर से निकलकर आत्महत्या कर ली। कैंपे गौड़ा ने, अपनी बहू की स्मृति में, कोरामंगला में लक्ष्मीअम्मा मंदिर बनवाया जो आज भी मौजूद है।

हालंकि हमारी जानकारी के अनुसार ये मंदिर ज़्यादातर समय बंद ही रहता है और स्थानीय लोग यहां कूड़ा-कचरा फेंकते रहते हैं। पास में ही BBMP पार्क में लक्ष्मी देवी का एक स्मारक भी है।और पढ़ें

4 – बठिंडा क़िला, पंजाब

पंजाब का बठिंडा आज एक ऐसा आधुनिक शहर है जो बेहद संपन्न है । लेकिन क्या आपको पता है कि ये उन प्राचीन शहरों में से एक है जिसका इतिहास बहुत दिलचस्प है ? इसके व्यस्त धोबी बाज़ार के बीचों बीच है क़िला मुबारक जो सोलह सौ साल पुराना है । ये वही क़िला है जहां सन १२४० में तुर्की दरबारियों से हारने और दिल्ली सल्तनत गंवाने के बाद रज़िया सुल्तान को क़ैद में रखा गया था।

क़िले का ज़्यादातर इतिहास हालंकि गुमनामी के अंधेरे में डूबा हुआ है लेकिन प्राप्त जानकारी के अनुसार तीसरी सदी में राजपूत वंश, जिसे भाटी कहा जाता है, यहां आकर बसा था। उनके पहले ये इलाक़ा जंगल हुआ करता था ।

माना जाता है कि इसी समय बठिंडा क़िले की नींव रखी गई थी । इस दौरान बठिंडा पर क़ब्ज़े के लिए भाटी और एक अन्य राजपूत वंश बरार के बीच लगातार लड़ाईयां होती रहीं और आख़िरकार बरार ने बाज़ी मार ली । चूंकि बठिंडा लाहौर और दिल्ली के रास्ते में पड़ता था, इसलिए समय के साथ इसका सामरिक और व्यावसायिक महत्व बढ़ गया था।

इसके बाद बठिंडा शहर ११ वीं सदी में तब चर्चा में आया जब मेहमूद ग़ज़नी ने तब के हिंदू शाही शासकों पर हमला किया । ग़ज़नी को १000 ई. और १०२६ ई. के बीच भारत पर १७ बार हमले करने के लिए जाना जाता है। उसे सोमनाथ का मंदिर तोड़ने के लिए भी जाना जाता है । ग़ज़नी ने उत्तर भारत पर चढ़ाई करते हुए १००४ ई. में बठिंडा के क़िले पर भी कब्ज़ा कर लिया था ।और पढ़ें

5- कोलाबा किला, महारष्ट्र

अरब महासागर के किनारे खड़ा है शक्तिशाली और शानदार कोलाबा क़िला। महारष्ट्र के अलीबाग में स्तिथ यह किला कभी व्यापारियों और नौसेना के बेड़ों का केंद्र रहा यह बंदरगाह महान मराठा सरखेल कान्होजी आंग्रे का मुख्यालय हुआ करता था। और जानने के लिए देखें यह दिलचस्प वीडियो

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