पटना में भी कभी चलती थी ट्राम




“वह व्यक्ति जिसे अपने इतिहास, अपने उद्गगम और अपनी संस्कृति के बारे में न पता हो, वह व्यक्ति बिना जड़ के पेड़ की तरह होता है।“ - मार्क्स गार्वी

पटना में हाल ही में आई बाढ़ के दौरान जब भी बाढ़ में डूबे अशोक राजपथ की तस्वीर टीवी स्क्रीन पर दिखाई देती थी, पटना के गौरवशाली इतिहास की यादें ताज़ा हो जाती थीं । ये वो इतिहास है जो समय की बाढ़ में डूब चुका है । दस्तावेज़ों के अभाव में इतिहास अक्सर कहानी-क़िस्सों के ज़रिये ज़िंदा रहता है । लेकिन अगर लोगों को इतिहास याद न रहे या फिर इतिहास के बारे में जानकारी न हो तो ऐसे इतिहास का समय के काल में गुम हो जाने का ख़तरा रहता है । पटना में अगर आप तीस साल की उम्र के आसपास के लोगों से ट्राम के बारे में पूछें तो आपको पता चलेगा कि पटना ट्राम की कहानी इतिहास के पन्नों में पूरी तरह खो चुकी है । बॉम्बे में तो ट्राम के वजूद के सबूत आज भी मिल जाते हैं लेकिन पटना ट्राम के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता । पटना के ज़्यादातर लोगों को पटना ट्राम के इतिहास के बारे में पता ही नहीं है ।

ट्राम के साथ भारत का डेढ़ सौ साल तक का सफ़र

भारत में ट्राम की शुरुआत 24 फ़रवरी सन 1873 में हुई थी । पहली ट्राम कोलकता में सियाल्दाह और अर्मेनियन घाट स्ट्रीट के बीच चली थी । इसी तरह चेन्नई, कानपुर, दिल्ली और मुंबई जैसे भारत के अन्य शहरों में भी ट्राम चलीं थीं । हालाँकि कोलकता में पहली बार जब ट्राम सड़कों पर दौड़ी थी तब उसे घोड़े से खींचा जाता था ।


पहली इलेक्ट्रॉनिक ट्राम चेन्नई में सन 1885 में चली थी ।

पटना में भी चलती थी ट्राम

पटना में घोड़े से खींची जाने वाली ट्राम सन 1886 में शुरु हुई थी । ये ट्राम पुराने पटना शहर और अंग्रेज़ों के बसाए बांकीपोर (मौजूदा समय में गांधी मैदान इलाक़ा ) के बीच चलती थी । ट्राम की पटरियां, पटना शहर की सरहद पर आज भी मौजूद हैं । यह पटरियां पटना शहर रेल्वे स्टेशन से लेकर, गंगा के किनारों से होते हुए, गांधी मैदान में सब्ज़ी बाग़ ट्राम स्टेशन तक बिछाई गई थीं । पटना ट्रामवे कंपनी की स्थापना सन 1886 में हुई थी । इसके मालिक अंग्रेज़ थे लेकिन पटना के रईस क़ाज़ी रज़ा हुसैन की भी कंपनी में बड़ी हिस्सेदारी थी ।

ट्राम सिस्टम की स्थापना के समय, मौजूदा पटना शहर स्टेशन, जो पुराने शहर में मौजूद है, आवाजाही का एकमात्र केंद्र था । शहर को विभिन्न स्टेशनों से जोड़ने के लिए ही ट्राम सिस्टम शुरु किया गया था । मूल योजना के तहत ट्राम को गंगा और सोन नदी पर दानापुर तक लाना था ताकि दोनों तरफ़ के व्यापारी नदी के पार स्थित छपरा और आरा के बाज़ारों में आ-जा सकें ।

पटना ट्राम सेवा का अंत

शुरु में ट्राम में बहुत भीड़ हुआ करती थी लेकिन टाँगे और यातायात के अन्य साधनों के आने के बाद ट्राम में सफ़र करने वालों की संख्या घटने लगी । सवारियां कम होने की वजह से ट्राम घाटे में चलने लगी और 1903 के अंत तक कंपनी को ट्राम सेवाएं बंद करनी पड़ीं ।

यादों को ज़िंदा रखें ताकि इतिहास ज़िंदा रहे

मुंबई में फ़्लोरा फ़ाउंटेन के आसपास ट्राम की पटरियां आज भी मौजूद हैं लेकिन पटना में ट्राम का कोई नामो निशान बाक़ी नहीं है । पटना में रहने वाले ज़्यादातर लोगों को ये पता ही नहीं है कि उनके शहर में कभी ट्राम सेवा होती थीं । दस्तावेज़ और स्मारकों के अभाव में पटना ट्राम का छोटा मगर गौरवशाली इतिहास कहानी क़िस्से बनकर रह गया है । बदक़िस्मती से ये कहानी-क़िस्से भी वक़्त के अंधेरे में गुम होते जा रहे हैं क्योंकि पटना के इस गौरवशाली इतिहास की यादों को सहेजने की कोई कोशिश भी नहीं हो रही है।

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