शानदार जयपुर 



जयपुर, राजस्थान राज्य की ख़ूबसूरत और ऐतिहासिक राजधानी जो 2019 में यूनेस्को द्वारा ‘वर्ल्ड हेरिटेज सिटी’ घोषित की गयी, राजपूत वंश के शानो-शौकत और शौर्य का प्रतीक रही हैं। आइये हम आपको दिखाते हैं सौ साल पहले कैसा लगता था ये ख़ूबसूरत शहर।

<b>हवा महल, बॉर्न एंड शेफर्ड, 1885</b>
हवा महल, बॉर्न एंड शेफर्ड, 1885|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

हवा महल को सन 1798 में महाराजा सवाई प्रताप सिंह ने बनवाया था। गुलाबी बलुआ पत्थर वाला ये महल, राजघराने की महिलाओं के लिए बनाया गया था, ताकि वो महल की 953 खिडकियों से दुनिया की नज़रो में आये बिना बाहर की दुनिया को देख सके। महल की अद्भुत वास्तुकला दुनियाभर में प्रख्यात हैं।

<b>सड़क की झलक, गोविंदराम उदेराम, 1895 </b>
सड़क की झलक, गोविंदराम उदेराम, 1895 |राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

जयपुर का अर्थ है - जीत का नगर। इस शहर की स्थापना १७२८ में आमेर के महाराजा जयसिंह द्वितीय ने की थी, उस समय का यह प्रथम नगर था जो योजनाबद्ध ढ़ंग से बसाया गया था। ये दृश्य हैं त्रिपोलिया बाज़ार का जो आज की तरह ही खरीद्गारो और व्यापारियों से भरा पड़ा नज़र आता हैं।

<b>चंद्र महल, सिटी पैलेस परिसर, बॉर्न एंड शेफर्ड, 1885</b>
चंद्र महल, सिटी पैलेस परिसर, बॉर्न एंड शेफर्ड, 1885|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

चंद्र देव के नाम पर बना सात मंज़िला चंद्र महल जयपुर के राजाओं का निवासस्थान रहा है। यह सिटी पैलेस परिसर के पश्चिमी हिस्से में स्थित सबसे महत्वपूर्ण कमांडिंग भवन के रूप में माना जाता है। यह अद्भुत दृश्य हैं महल के ख़ूबसूरत बाग़ का।

<b>बड़ी चोपार, दीन दयाल, 1885</b>
बड़ी चोपार, दीन दयाल, 1885|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

त्योहारों के दिन शाही जुलूस निकलते, शहर की ख़ास सजावट होती थी और उत्साह का माहौल बन जाता था। तस्वीर में दिख रहा हैं कैसे लोग शाही जुलूस को बड़ी चोपार से गुज़रते देखने किसी भी छज्जे या चट्टान पर चढ़ गए हैं, फिर चाहे वह मंदिर हो या कोई ईमारत। लोगो की धैर्यशील उत्सुकता महसूस की जा सकती हैं, बैचेन बैलगाड़ियों के बीच।

<b>गणेश पोल, सिटी पैलेस, फोटोग्लोब ज़ूरीक, 1890</b>
गणेश पोल, सिटी पैलेस, फोटोग्लोब ज़ूरीक, 1890|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

यह तस्वीर फोटोक्रोम तकनीक द्वारा रंगी गयी हैं जो रंगीन फोटोग्राफी के आविष्कार से पहले इस्तेमाल की जाती थी। यहाँ सिटी पैलेस का एक द्वार नज़र आ रहा हैं जिसकी नक्काशी रंग में और भी विस्तृत रूप में देख पा रहे हैं। यह इतना वास्तविक हैं कि लोगो का आना-जाना हम महसूस कर पा रहे हैं।

<b>आमेर दुर्ग, गोविंदराम उदेराम</b>
आमेर दुर्ग, गोविंदराम उदेराम|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

यह आश्चर्यजनक दृश्य सौ साल पहले की परिस्थिति को बखूबी दर्शा रहा हैं। ऊंचाई पर नज़र आ रहा हैं जयगढ़ क़िला और नीचे की ओर हैं आमेर दुर्ग जो बलुआ पत्थर से बनाया गया था। आगे की हैं माओता झील जो इस रेगिस्तान की जीवनरेखा थी।

<b> आमेर दुर्ग का प्रवेशद्वार, कोलिन मर्रे, बॉर्न एंड शेफर्ड के लिए, 1885</b>
आमेर दुर्ग का प्रवेशद्वार, कोलिन मर्रे, बॉर्न एंड शेफर्ड के लिए, 1885|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

आमेर दुर्ग के सात द्वार में से एक हैं गणेश पोल। इस पर गणेश देवता की छब्बी बनी हैं और यहाँ से महल के निजी क्षेत्र में प्रवास होता हैं। इस्लाम शैली के गुम्बद और सुन्दर झरोखे, राजपूत और इस्लाम वास्तुकला का अद्भुत मिश्रण दर्शाती हैं।

<b>आमेर क़िले से जयपुर नज़ारा, 1885</b>
आमेर क़िले से जयपुर नज़ारा, 1885|राजीव रावत - मंगलम आर्ट्स

आमेर के कछवाहा वंश ने जयपुर की नयी नगरी का निर्माण किया पर उसे पहले चार सौ साल तक उन्होंने संगमरमर और बलुआ पत्थर से बने आमेर दुर्ग से राज्य किया था। यहाँ से नज़र आती हैं अरावली पर्वतमाला की चढ़ते-उतरते पहाड़, उन पर बनायीं गयी जयगढ़ की गढ़बंधी और बीच में बसी इमारतें।

दीप्ति शशीधरन 19वि सदी की फोटग्राफी पर काम करती हैं और लिखती हैं। वह फुलब्राइट और फुंदाकाओ ओरिएंटे स्कॉलर और संग्रहालय विज्ञान के क्षेत्र में काम करती हैं। वर्तमान में वह एका आर्काइविंग सर्विसस के साथ काम कर रही हैं।

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