विक्टोरिया-युगीन मुंबई 



इस चित्रकथा में हम आपको विक्टोरिया-युगीन मुंबई के सफर पर ले जा हैं, जिसका निर्माण ब्रिटिश वास्तुकार ने बड़े ही शान-ओ-शौकत से किया।

<b>रानी विक्टोरिया की प्रतिमा</b>
रानी विक्टोरिया की प्रतिमा|डी.के. आर्काइव्स

रानी विक्टोरिया की प्रतिमा का 1872 में उद्द्घाटन हुआ। ये बड़ौदा के गायकवाड़ का तोहफ़ा था। इसके शिल्पकार थे माथ्यू नोबल और इस 8 फुट 6 इंच के बुत को इटली के ख़ास संगमरमर से बनाया गया था।

इस प्रतिमा को पहले मुंबई के विक्टोरिया बाग़ में स्थापित किया था, बाद में इसे एस्पलेनैड रोड पर रखा गया, जिसे आज महात्मा गाँधी रोड कहते हैं। आज़ादी के बाद उसका स्थायी निवास एक बार फिर बना भायखला का भाऊ दाजी लाद संग्रहालय।

<b>विक्टोरिया टर्मिनस</b>
विक्टोरिया टर्मिनस|डी.के. आर्काइव्स

1887 में रानी विक्टोरिया के शासन के 50 वर्ष पूरे हुए। वास्तुकार फ्रेडेरिक विलियम स्टीवेंस ने इस घटना को सम्मानित करने के लिए एक विशाल स्मारक बनाया जो था विक्टोरिया टर्मिनस, जिसने बोरी बंदर स्टेशन का स्थान लिया। आज ये स्मारक मुंबई के सबसे मशहूर इमारतों में से एक हैं, ये विक्टोरियन गोथिक शैली में बनी हैं। इमारत का सर्वोत्कृष्ट बिंदु मुख्य गुंबद है। इस पर एक विशाल महिला की आकृति (16 फुट 6 इंच) है। उसके दाहिनी हाथ में एक ज्वलंत मशाल है, जो ऊपर की ओर इशारा करता है, बाएँ हाथ में एक कमानीदार पहिया है जो 'प्रगति' का प्रतीक है। स्टेशन के प्रवेश पर दो पुतले हैं, एक शेर और एक बाघ, जो ब्रिटेन और भारत के प्रतीक हैं।

<b>मलाबार हिल से नज़ारा, 1880 </b>
मलाबार हिल से नज़ारा, 1880 |डी.के. आर्काइव्स

ये ख़ूबसूरत दृश्य मुंबई के मलाबार हिल का हैं। नीचे समुद्र निम्न ज्वार में नज़र आ रहा हैं, उसके दाहिनी ओर मछली पकड़ने के जाल। इस इलाके को आज हम गिरगॉम चौपाटी कहते हैं, जहाँ से मरीन ड्राइव की शुरुआत होती हैं।

<b>अपोलो होटल, 1873 </b>
अपोलो होटल, 1873 |डी.के. आर्काइव्स

अंग्रेज़ों को मुंबई शहर को एक आधुनिक और योजनाबद्ध नगर बनाने का बड़ा गर्व था। इस तस्वीर में नज़र आ रहा हैं अपोलो होटल, जिसका 1873 में निर्माण हुआ था, अपोलो बंदर के मशहूर ताज होटल के लगभग तीस साल पहले। आज इस इमारत को अपोलो हाउस कहते हैं, इसमें लोकप्रिय कैफ़े मोंडेगार और कैफ़े लियोपोल्ड मौजूद हैं।

<b>फ़्लोरा फाउंटेन, 1896 </b>
फ़्लोरा फाउंटेन, 1896 |डी.के. आर्काइव्स

1864 में बनाया गया फ़्लोरा फाउंटेन एक बड़ा ही ख़ूबसूरत स्मारक हैं, जो इस शहर के बहुत महत्त्वपूर्ण चौराहे पर बना हैं, जिसके आसपास के इलाकों में अंग्रेज़ों ने कई नयी इमारतें बनायीं थी। यह फाउंटेन इस इलाके की प्रगति का एक प्रमाण था। फाउंटेन के बाहिने तरफ हैं कथीड्रल हाई स्कूल जो कि 1885 में स्थापित किया गया था। इस इमारत को बाद में ओरिएण्टल लाइफ अशुरन्स को बेचा गया जिन्होंने इसे नए सिरे से बनाया।

<b>केंद्रीय टेलीग्राफ़ कार्यालय और फ़्लोरा फाउंटेन, 1873</b>
केंद्रीय टेलीग्राफ़ कार्यालय और फ़्लोरा फाउंटेन, 1873|डी.के. आर्काइव्स

फ़्लोरा फाउंटेन के पास केंद्रीय टेलीग्राफ़ कार्यालय हैं, जो एक समय पर इस व्यवसाय इलाके का विशेष केंद्र था। यहाँ सेकड़ो लोगो को रोज़गारी मिली थी, जो चौबीस घंटे सूचनाओं को संचारित करते। हो सकता हैं कि इसी को नज़र रखते कई बैंकों और व्यवसायकारो ने इस इलाके में अपने अपने दफ़्तर खोले थे। टेलीग्राम के दिन तो समाप्त हो गए, पर इस पुनरुद्धार गोथिक शैली में बनायीं गयी इमारत को आप आज भी हुतात्मा चौक पर पाएंगे।

<b>ओवल मैदान के आसपास की इमारतें, 1885</b>
ओवल मैदान के आसपास की इमारतें, 1885|डी.के. आर्काइव्स

ओवल मैदान के आसपास नज़र आती इमारतें अंग्रेज़ों के बेहतरीन नगर आयोजन का प्रमाण हैं। मुंबई उच्च न्यायालय की इमारतें, शानदार राजबाई क्लॉक टावर और अन्य इमारतें उन्नीसवीं सदी के आख़िरी चतुर्थांश में बनायीं गयी थी।

<b>बोरा बाज़ार, कोलिन मर्रे, बॉर्न एंड शेफर्ड के लिए, 1870-1871</b>
बोरा बाज़ार, कोलिन मर्रे, बॉर्न एंड शेफर्ड के लिए, 1870-1871|डी.के. आर्काइव्स

फ़ोर्ट के उत्तर दिशा में उपस्थित बोरा बाज़ार एक प्रख्यात बाज़ार था, जिसका नाम पड़ा था उसके संस्थापकों के बाद जो कि बोहरा मुस्लिम थे, जो व्यापारी थे। बाज़ार में दुनियाभर के व्यापारी अपना माल बेचने यहाँ आते थे।

मुंबई की अधिकांश तरक्की व्यापार और परिवहन से हुई थी। उस समय बंदरगाह के सुन्दर चित्र, जिनमे नाव और समुद्र नज़र आते थे, बहुत लोकप्रिय थे। बॉम्बे हारबर के इस दृश्य में नए कारखाने और इमारतें हैं जो इस बढ़ती हुई नगरी की गवाही देती नज़र आ रही हैं।

दीप्ति शशीधरन 19वि सदी की फोटग्राफी पर काम करती हैं और लिखती हैं। वह फुलब्राइट और फुंदाकाओ ओरिएंटे स्कॉलर और संग्रहालय विज्ञान के क्षेत्र में काम करती हैं। वर्तमान में वह एका आर्काइविंग सर्विसस के साथ काम कर रही हैं।

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