भुजोड़ि की विशिष्ट कच्छी बुनाई



कच्छ में, दक्षिण-पश्चिम भुज से क़रीब 8 कि.मी. दूर भुजोड़ि गांव में बुनाई की कई परंपराओं का मिश्रण देखने को मिलता है। ये क्षेत्र कला और हस्तकला के मामले में बहुत समृद्ध है और दोनों की अपनी ख़ास विशेषताएं हैं। भुजोड़ि के बुनकरों को वंकार कहा जाता है जिन्होंने अपनी अनोखी विरासत को आज भी ज़िंदा रखा हुआ है।

यहां की हाथ की बुनी शॉल और दुपट्टे (स्टोल) की ख़ूबसूरती उनकी सादगी वाले रुपांकन है। ये रुपांकन एक विशेष तकनीक से बनाये जाते हैं। कपड़े को प्राकृतिक रंगों से रंगा जाता है। वो बात जो इन्हें अनोखी बनाती है वो ये है कि ऊनी शॉलें और दुपट्टे सर्दियों में न सिर्फ़ गर्माहट देते हैं बल्कि इन्हें ढ़ीला बुनने पर ये गर्मी से भी राहत दिलाते हैं।

कहा जाता है कि भुजोड़ि के वंकार मूलत: राजस्थान के मेघवाल समुदाय के मारवाड़ बुनकर हैं जो पांच सौ साल से भी पहले कच्छ आकर बस गए थे। भुजोड़ि में उनकी विशेष बुनाई की परंपरा का संबंध रबारी जनजाति से है।

भुजोड़ि गाँव के वंकार समुदाय की एक महिला 
भुजोड़ि गाँव के वंकार समुदाय की एक महिला |फ्लिकर
रबारी समुदाय का एक आदमी 
रबारी समुदाय का एक आदमी |फ्लिकर

लोक-कथाओं के अनुसार रबारी जनजाति की एक लड़की का विवाह कच्छ के एक परिवार में हुआ था। अपने कपड़े बुनने के लिये उसे दहेज़ में एक बुनकर दिया गया था। एक अन्य लोककथा के अनुसार राजस्थान के हिंदू लोक देवता रामदेव पीर एक बार राजस्थान से तीर्थ-यात्रा पर कच्छ आए थे। वे उनके अनुयायियों के बनाए गए एक मंदिर की देखभाल के लिये अपने साथ एक जत्था भी लाए थे। माना जाता है कि यही जत्था बुनकर थे जो कच्छ आकर बस गए थे।

रबारी पशुपालक होते थे और माना जाता है कि वे अफ़ग़ानिस्तान के दुर्गम पहाड़ों से होते हुए राजस्थान में आकर बस गए थे। कहा ये भी जाता है कि इन्हें भगवान शिव ने पार्वती के ऊंटों की देखभाल के लिये भेजा था। भुजोड़ि के बुंकर, रबारी समुदाय के लिये, भेड़ और ऊंट के बालों से बने ऊन के बदले हाथ से कंबल और पारंपरिक घाघरे बुनते थे। इसके अलावा वे रबारी समुदाय के लिये शादी के जोड़े भी हाथ से बुनते थे। रबारी कंबल या तो कंधे के ऊपर पहनते थे या फिर लुंगी (पछेड़ी) के ऊपर कमर में लपेटते थे। इनके अलावा रबारी वंकार परिवारों को बुनाई के बदले दूध-उत्पाद और अनाज भी मुहैया कराते थे।

भुजोड़ि के वंकार हितेष दयालाल पिछले 13 साल से बुनाई का काम कर रहे हैं। ये उनका ख़ानदानी पेशा है। उन्होंने हमें रबारी जनजाति के साथ बुनाई के संबंधों के बारे में बताया।

पारंपरिक रुप से रबारी के लिये बनाई जाने वाली शॉल को स्थानीय भाषा में धबडा कहा जाता था। ये शॉल दो हिस्सों में बुनकर फिर जोड़ी जाती थी। ये शॉल सर्दी के मौसम में जंगलों में घूमने वाले रबारी लोगों को सर्दी से बचाती थी। बाद में गुजरात की पारंपरिक बांधनी और बुनकरी में अलग अलग प्रकार की शॉलें बनायी जानें लगीं।

इसके पहले भुजोड़ि के बुनकर पारंपरिक पगड़ियां भी बुनते थे जिसे धोताली कहा जाता था जो कत्थई लाल रंग और हरे रंग की होती थीं। बाद में सफ़ेद पगड़ी भी बुनी जाने लगीं। यूं तो कच्छ के अन्य गांवों के बुनकर भी ये पगड़ियां बुनते थे लेकिन भुजोड़ि के बुनकरों की पगड़ियां ख़ास होती थीं जिन्हें रबारी समुदाय के पुरुष शादी के बाद पहनते थे। ये उनकी पारंपरिक वेशभूषा का हिस्सा हुआ करती थी। पगड़ियां आज भी गांव में कभी कभी बुनी जाती हैं लेकिन इसमें उन पारंपरिक पगड़ियों जैसी बात नहीं होती ।

18वीं शताब्दी में कपास के उत्पादन की वजह से गुजरात का वंकार समुदाय बहुत फला फूला। बाद में अंगरेज़ों ने भारतीय कपड़ों पर बहुत कर लगाकर इस व्यवसाय पर कब्ज़ा कर लिया। अंगरेज़ कारख़ानों में बनने वाले सस्ते धागे और कपड़े भारत को निर्यात भी करने लगे थे। इससे कच्छ के बुनकरों पर बुरा असर पड़ा क्योंकि हाथ के बने कपड़ों की मांग बहुत कम हो गई और इस पेशे से जुड़े लोग बेरोज़गार भी हो गए। सन 1920 के दशक में महात्मा गांधी के खादी आंदोलन ने हथकरधा और खादी की बुनाई को प्रोत्साहित किया। खादी आंदोलन की वजह से वंकार समुदाय के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा करने में मदद मिली।

भुजोड़ी बुनाई की प्रक्रिया

पारंपरिक रुप से कच्छी बुनाई पंजा (सीधे फ्रेम वाला करघा) करघे पर की जाती थी। बाद में गड्ढ़े वाले करघे इस्तेमाल होने लगे। भुजोड़ि बुनाई का काम बुनकरों के घरों में पारंपरिक गड्ढ़े वाले करघों पर होता है। बुनकर अमूमन धागों को नीले और अलीज़रीन जैसे प्राकृतिक रंगों में रंगते हैं। इससे कई रंगों के घागे तैयार हो जाते हैं। भुजोड़ि बुनाई में पारंपरिक रुप से सफ़ेद, नीले, कत्थई, हरे और काले रंगों का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा सिलेटी और गुलाबी रंगों का भी इस्तेमाल देखने को मिलता है। ऊन के धागे को गेहूं के आटे के पेस्ट में रंगा जाता है जिससे वह मज़बूत हो जाता है। इसके बाद ही करघे पर इसे चढ़ाकर बुनाई की जाती है।

भुजोड़ि बुनाई की प्रक्रिया में अतिरिक्त ताने की तकनीक का प्रयोग किया जाता है। ये काफ़ी पेचीदा और मेहनत वाली प्रक्रिया है। इसमें बहुत सावधानी से धागों को और अतिरिक्त ताने को लेकर रुपांकन बनाये जाते हैं। इस तकनीक की ख़ासियत यह है कि इससे जो रुपांकन बनता है वो बेहद स्पष्ट होता है और लगता है मानो सादे कपड़े के बैकग्राउंड पर कढ़ाई की गई हो।

भुजोड़ि बुनाई करते हुए वंकार हितेश दयालाल 
भुजोड़ि बुनाई करते हुए वंकार हितेश दयालाल 

बुनाई की ज़्यातादर प्रक्रिया में महिलाओं की बड़ी भूमिका होती है। बुनाई में पारंपरिक चरखे का प्रयोग होता है। भुजोड़ि शॉल या साड़ी का आधार अमूमन सादा अथवा धारियों और चेक वाला होता है। इसमें अतिरिक्त ताने की वजह से कई तरह के रंगों की झलक भी मिलती है। बुनकर ज़्यादातर ऊन लुधियाना से मंगवाते हैं हालंकि स्थानीय बकरी, ऊंट और काले तथा सफेद भेड़ों का ऊन आज भी थोड़ा बहुत इस्तेमाल किया जा रहा है। रेशम बैंगलोर से, एक्रलिक लुधियाना से और कपास पश्चिम बंगाल से मंगवाया जाता है।

भुजोड़ि बुनकर अपने घरों की दीवारों को हाथ की बनी शॉलों और शीशे की कढ़ाई वाले कपड़े से सजाते हैं। हालंकि बुनकरों ने ऊन, कॉटन और सिल्क जैसे अलग अलग कपड़े के साथ भी प्रयोग किये हैं लेकिन उनकी अपने क्लासिक रुपांकनों की वजह से भुजोड़ि बुनाई की अपनी ख़ास पहचान और विशेषता होती है।

भुजोड़ि के रुपांकन

भुजोड़ि बुनाई में ज्यामितीय रुपांकनों की कई क़िस्में दिखाई पड़ती है। कारीगरों के अनुसार ये ज्यामितीय रुपांकन क़िलों और गुजरात के पाटन में रानी की वाव जैसे वास्तुकला से प्रेरित हैं।

रानी की वाव, पाटण
रानी की वाव, पाटण

कच्छ शैली के पैटर्न अलग ही होते थे। ये क्रॉस बीटिंग तकनीक की बुनाई होती थी जिसमें मच्छहार और लठ जैसे रुपांकन होते थे।

पोपटी- एक सादे त्रिकोणीय रुपांकन को पोपटी कहते हैं। इसका अक्सर प्रयोग किया जाता है और जटिल रुपांकन बनाने में इसे तरह तरह से दोहराया जाता है।

चौमुख- पोपटी रुपांकन के चार त्रिकोणों को मिलाकर जो रुपांकन बनता है उसे चौमुख कहते हैं।

पंचको- दो अलग अलग दिशाओं में त्रिकोणों को मध्य में मिलाकर जो रुपांकन बनता है उसे पंचको कहते हैं।

वाखियों, सटकनी, हथी या धोलकी जैसे अन्य रुपांकन भुजोड़ि में ग्राम जीवन को सजीव कर देते हैं।

भुजोड़ि दुपट्टा पर पोपट्टी मोटिफ
भुजोड़ि दुपट्टा पर पोपट्टी मोटिफ|वंकार हितेश

25 मार्च सन 1954 में श्री भुजोड़ी कॉटन एंड वूल हैंडलूम कोऑपरेटिव लिमिटेड की स्थापना हुई थी। यहां की बनी भुजोड़ि शॉल देश विदेश में सप्लाई होती थीं। इस संस्था को कई राज्य और राष्ट्र स्तरीय पुरस्कार भी मिले थे। भुजोड़ि बुनकरों ने अपने हुनर को और बेहतर कर तरह तरह की बुनाई की। सन 1961 में रुपांकनों और डिज़ाइनों में प्रयोग किए गए। कच्छ के बुनकरों ने स्थानीय अपरिष्कृत ऊन के साथ मेरिनो (भेड़ की एक जाति) ऊन को मिलाना शुरु किया। मेरिनो ऊन राजस्थान खादी बोर्ड ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से मंगवाता था। इससे पहले बुनाई की तकनीक और फिर बुनाई वाले कपड़े का अपरिष्कृत ग्रंथन ही बदल गया। सन 1980 के दशक में एक्रेलिक ऊन आया और इसमें मेरिनो, एक्रेलिक और कुछ कपड़ा मिलाकर उत्पाद बाज़ारों में बिकने लगे थे। सन 2000 के आते आते भुजोड़ी गांव सैलानियों और खुदरा बाजारों में मशहूर हो गया।

भुजोड़ि बुनाई का पुनरजीवन

दुर्भाग्य से 2001 में, कच्छ में आये भयंकर भूकंप की वजह से भुजोड़ि और कच्छ के अन्य स्थानों में बुनकरी बुरी तरह प्रभावित हुई। ज़मीन मालिकों, भेड़ पालकों, बुनकरों, रंगरेज़ों और रबारी लमुदाय की महिलाओं के पुराने संबंध थम से गए थे। इसी वजह से भुजोड़ि बुनकरों के लिये बनाई गयीं कोऑपरेटिव संस्थाएं भी बंद हो गईं।

कला रक्षा विद्यालय जैसे संस्थानों ने सन 2005 में बुनाई को फिर जिंदा किया। कला रक्षा विद्यालय एक डिज़ायन संस्था थी जिसने भुजोड़ि के कारीगरों के लिये एक साल का कोर्स शुरु किया था। इस कोर्स की वजह से रुपांकनों में समरुपता और लय के साथ नये नये आइडिया लेकर युवा सामने आए। “काला कॉटन” स्वदेशी और बारिश के पानी में बनाये गये कॉटन की एक ऐसी क़िस्म थी जो खमीर संस्था ने शुरू की। खमीर संस्था ने कच्छ में हाथ से बुनाई के काम को दोबारा ज़िंदा करने में भी बहुत बड़ा योगदान किया।

एक सितंबर सन 2016 में भुजोड़ि बुनकरों ने श्री भुजोड़ि कॉटन एंड वूल हैंडलूम कोऑपरेटिव लिमिटेड को फिर खड़ा कर दिया। भुजोड़ि में उद्धमियों ने भुजोड़ि साड़ियों और दुपट्टों की मांग पैदा कर दी। कई एजोंसियों और सरकारी संस्थानों की मदद से डिज़ाइनरों ने नयी पीढ़ि को आकर्षित करने के लिये हाथ के बुने दुपट्टे और स्कार्फ़ बनाने शुरु कर दिया।

भूकंप के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने भुजोड़ि में हस्तकला उद्योग में नये सिरे से जान फूंकने के प्रयास किये। सरकारों ने बुनकरों के लिये प्रदर्शनियां और मेले आयोजित किये तथा प्रमुख डिज़ाइनरों की भी मदद ली।

भुजोड़ि के पुराने गांव में आज क़रीब 200 बुनकर हैं। ये लोग क़ालीन, शॉल, स्टोल और यहां तक कि समकालीन शैली में मेज़ पर बर्तन रखने वाले छोटे छोटे मेज़पोश भी बनाते हैं। पारंपरिक ऊन के अलावा कोसा (टसर) सिल्क और कपड़े का भी इस्तेमाल हो रहा है।

भुजोड़ि शॉल
भुजोड़ि शॉल

जैसे कि अकसर होता है पारंपारिक शब्दावली भी समय के साथ बदल जाती है, वैसे ही भुजोड़ि के बुनकरों को गर्व के साथ डिज़ाइनर भी कहा जा सकता है। पारंपारिक पैटर्न में आधुनिकता का पुट देकर इसे प्रासंगिक बनाया गया है। अब बिस्तर की चादरों, तकियों ग़िलाफ़ों और पर्दों पर भी बुनकरी की कला को देखा जा सकता है। समकालीन डिज़ाइन की वजह से मेलों और नुमाइशों के ज़रिये इन उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में भी मांग हो रही है हालंकि स्थानीय बाज़ारों में इसे अभी उतना महत्व नहीं मिल पा रहा है। कारीगरों को उनकी मेहनत और हुनर के अनुसार दाम नहीं मिलता है। भुजोड़ि में बनने वाले उत्पादों में मेहनत के अलावा महंगा कच्चा माल भी लगता है।

भुजोड़ि बुनाई दशकों तक संघर्ष करने के बाद अब जाकर कहीं उबर पाई है। ये कला रबारी जैसे ख़ानाबदोश समुदाये से लेकर शहरों के आधुनिक घरों तक की शोभा बढ़ा रही है।

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