भारत का सबसे बड़ा सोने का सिक्का



सन 1980 दशक के अंतिम दिनों में भारत सरकार की चिंता तब बढ़ गई जब उसे पता चला कि स्विटज़रलैंड में ऐतिहासिक धरोहर और राष्ट्रीय ख़ज़ाने की एक अनमोल चीज़ की नीलामी होने जा रही है। नीलामी ऐसे सिक्के की होने जा रही थी जो न सिर्फ खरे सोने का बना था बल्कि सबसे बड़ा सिक्का था। 12 किलो ग्राम वज़नी इस सिक्के की ढ़लाई मुग़ल बादशाह जहांगीर के समय हुई थी। उपलब्ध दस्तावेज़ों के अनुसार जहांगीर ने ये 1000 मोहर का सिक्का ईरानी राजदूत जमील बेग को दिया था। ये सिक्का नीलामी में कैसे पहुंच गया, ये पता करने में समय लगा।

जहांगीर की सोने की मोहर सारे विश्व में चर्चा का विषय बन गई थी। विडंबना ये है कि इस सिक्के को नीलामी के लिये रखने वाला और कोई नहीं बल्कि मुग़लों का पुराना जागीरदार और हैदराबाद का अंतिम निज़ाम मुक्करम जाह था जो दीवालिया हो गया था।

मुग़ल अपनी अकूत संपत्ति, दौलत और शान-ओ-शोक़त के लिये जाने जाते थे। जितने हीरे-पन्ने, ताज और ज़ेवर उनके पास थे, दुनिया में किसी के पास नहीं थे। उनके पास इतनी दौलत आर्थिक ख़ुशहाली और उनके बड़े साम्राज्य की वजह से आई थी। तभी इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं है कि जहांगीर और शाहजहां के समय में सोने के क़ीमती सिक्कों की ढ़लाई एक आम बात थी। मुग़ल मोहर अथवा सोने के सिक्के अलग अलग क़ीमतों के होते थे।

जहांगीर के शासनकाल में 100, 200, 500 और यहां तक की 1000 मूल्य के सिक्के बनते थे। कम मूल्य के सिक्कों का इस्तेमाल जहां रोज़मर्रा की चीज़ें ख़रीदने के लिये होता था वहीं अधिक मूल्य के सिक्के उन महत्वपूर्ण अधिकारियों को दिये जाते थे जिन्होंने शाही सेना में ख़ास योगदान किया हो। इतिहास में सोने के 1000 मोहर का उल्लेख मिलता है। जहांगीर ने भी अपनी आत्मकथा तुज़्क-ए-जहांगीरी में लिखा है कि उन्होंने 1000 का सिक्का ईरान के राजदूत जमील बेग को तोहफ़े में दिया था।

जहांगीर के समय के, ख़ूबसूरती से बनाए गए, सोने के 12 किलो ग्राम के इस सिक्के से बड़ा सिक्का कभी बना ही नहीं था। इस सिक्के का व्यास 21 सें.मी. है और इसे डिज़ाइन करने में काफ़ी कारीगरी लगी होगी। सिक्के के बीच में बादशाह का नाम और ख़िताब अंकित है। इसके आसपास दो पंक्तियां लिखी हुई हैं जो इस तरह हैं-

बा-हुक्म शाह जहांगीर याफ़्त सद ज़ेवर

बनाम नूरजहां बादशाह बेगम ज़र

( जहांगीर के हुक्म से, मुग़ल दरबार की ख़ातून-ए-अव्वल बेगम नूरजहां का नाम लिखे जाने से इस सोने की ख़ूबसूरती में सौ गुना इज़ाफ़ा हो गया है।)

सन 1987 तक माना जाता रहा था कि ये सिक्का अब मौजूद नहीं है लेकिन जब स्विटज़रलैंड से नीलामी की ख़बर आई तो लोगों में उत्सुकता पैदा हो गई। ये सिक्का स्विटज़रलैंड कैसे पहुंचा, जब इस बात की जांच पड़ताल की गई तो ये कहानी सामने निकलकर आई।

ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार एक हज़ार मूल्य का सोने का सिक्का जहांगीर ने नवाब ग़ाज़ीउद्दीन ख़ां सिद्दीक़ी बहादुर, फ़ीरोज़ जंग-प्रथम को तोहफ़े में दिया था। इनके पुत्र निज़ाम-उल-मुल्क ने आसफ़ जाही राजवंश की स्थापना की थी। दो शताब्दियों से ज़्यादा समय तक ये सिक्का निज़ाम की एक पीढ़ि से दूसरी पीढ़ि के हाथों में जाता रहा और आख़िरकार ये मुकर्रम जाह के पास पहुंच गया जो 8वें निज़ाम थे। स्विटज़रलैंड की राजधानी बर्न में भारतीय वाणिज्य दूतावास ने जब नीलामी रोकने की कोशिश की तो मुकर्रम जाह के वकीलों ने दलील दी कि सन 1947 के पहले जो प्राचीन वस्तुएं भारत से बाहर ले जाई चुकी हैं, उन पर सन 1947 के बाद में बना क़ानून लागू नहीं हो सकता।। मुकर्रम जाह की मां दुर्रु शेहवार ये सिक्का सन 1947 के पहले लंदन लेकर चली गईं थीं। बहरहाल, सिक्के की नीलामी हुई और इसे एक अज्ञात व्यक्ति ने एक करोड़ डालर में ख़रीद लिया।

आज, जहाँगीर 1000 मोहर का सिक्का वापस तिजोरी और संख्यात्मक दुनिया में चला गया है, जब यह फिर से देखा जाएगा।

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