इब्न बतूता की नज़रों से भारत 



तुग़लक के दरबार में समोसा बहुत पसंद किया जाता था, पूरे उत्तर भारत में उड़द की दाल और लोबिया बहुत लोकप्रिय था तथा भारत के लोग भोजन के साथ आम का अचार ज़रुर खाते थे। ये जानकारी भले ही सुनने या पढ़ने में मामूली लगे लेकिन प्रसिद्ध यात्री और लेखक मोहम्मद इब्न बतूता द्वारा एकत्र रोज़मर्रा की इन छोटी छोटी बातों से हमें मध्याकालीन भारत के बारे में जानकारियां मिलती हैं जिन्हें पढ़ना बहुत दिलचस्प है।

मोहम्मद इब्न बतूता (1304-1377) मोरक़ेक़ो का यायावर और लेखक थे जिन्होंने ह्वेन त्सांग (602-664) और मार्को पोलो (1254-1324) की तरह जोख़िम उठाकर नये नये स्थानों की यात्राएं की और उनके बारे में लिखा।

इब्न बतूता की यात्रा का अंग्रेजी अनुवाद
इब्न बतूता की यात्रा का अंग्रेजी अनुवाद|अमेज़न इंडिया

इब्न बतूता का जन्म मोरक़्क़ो के तेंगियर्स में सन 1304 में हुआ था। कहा जाता है कि वह 21 साल की उम्र में घर छोड़कर विश्व भ्रमण पर निकल पड़े थे। स्वदेश लौटने के पहले उन्होंने उत्तरी अफ़्रीका, पूर्वी अफ़्रीका के प्रायद्वीप हॉर्न ऑफ अफ़्रीका (अफ़्रीका का सींग), पश्चिम अफ़्रीका, मध्य पूर्व, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, चीन और भारत की यात्राएं कीं। उन्होंने ‘तोहफ़ातन-नुज़्ज़र फ़ी ग़रा’इब अल-अमसरवा अजाइब अल असफ़र’, जिसका मतलब है ये तोहफ़ा उन लोगों के लिये जो शहरों के अजूबों के बारे में सोचते हैं और रोमांचक यात्रा करते हैं। ये किताब बतूता का सफ़रनामा है।

समरकंद शहर
समरकंद शहर|विकिमीडिया कॉमन्स

मध्य एशिया और बुख़ारा तथा समरक़ंद की यात्रा करने के बाद इब्न बतूता ने मोहम्मद बिन तुग़लक़ के दरबार की तरफ़ रुख़ किया। उस समय तुग़लक इस्लामिक दुनिया का सबसे दौलतमंद आदमी माना जाता था। कहा जाता है कि इब्न बतूता 12 सितंबर सन 1333 को सिंधु नदी पारकर दिल्ली पहुंचे थे।

इब्न बतूता के दस्तावेज़ों के अनुसार उनका और उसके साथियों का एक वज़ीर ने स्वागत किया क्योंकि तब मोहम्मद बिन तुग़लक कन्नौज में था। तुग़लक जब इन लोगों से मिला तो मिलकर इतना प्रभावित हुआ कि उसने इब्न बतूता को वेतन के रुप में सालाना बारह हज़ार दीनारों के साथ दिल्ली के मुंसिफ़(जज) के पद पर नियुक्ति की पेशकश की । हालांकि इब्न बतूता जल्द ही शहर से चले गए लेकिन वह उस समय के भारत के जीवन का दिलचस्प वर्णन कर गए।

मुहम्मद बिन तुगलक के दीनार
मुहम्मद बिन तुगलक के दीनार|कॉइन इंडिया 

इब्न बतूता के यात्रा वृतांत से हमें पता चलता है कि भारत में उस समय संदेशवाहक-व्यवस्था होती थी। कहा जाता है इस व्यवस्था के तहत हर चार मील पर एक संदेशवाहक-घोड़ा और हर एक मील पर एक संदेशवाहक व्यक्ति तैनात होता था। इस व्यक्ति को एक बक्सा दिया जाता था जिसे लेकर वह एक मील तक दौड़ता हुआ दूसरे संदेशवाहक को थमाता था जो इसे आगले संदेशवाहक तक ले जाता था।

इब्न बतूता ने जोगियों का भी उल्लेख किया है जो सड़कों पर अपने जादूगरी के हुनर दिखाते थे। इसके अलावा इब्न बतूता ने सती प्रथा का भी ज़िक्र किया है। इब्न बतूता के अनुसार उस समय शाही राजधानी में पान और तांबूल की सप्लाई होती थी जो ग्वालियर के पास चंदेरी से मंगवाया जाता था। चंदेरी जो अब साड़ियों के लिये मशहूर है।

पेड़ों और फलों का उनका वर्णन बहुत दिलचस्प है। इब्न बतूता को कटहल बहुत पसंद आया था और उन्होंने इसे “हिंदुस्तान का सबसे बेहतरीन फल” कहा था।

इब्न बतूता को आम ने भी बहुत आश्चर्य-चकित कर दिया था। उन्होंने लिखा ,“आम एक बड़े डैमस्क प्रून फल के बराबर होता है। ये जब हरा होता है और पका नहीं होता, तब जो कच्चे आम पेड़ से गिरते हैं उन्हें लोग नमक लगाकर रख देते हैं जैसे हम नींबू रखते हैं। इसी तरह ये लोग कच्ची अदरक और मिर्च को भी नमक लगाकर रखते हैं और भोजन के साथ इन्हें खाते हैं।”

“इब्न बतूता रोज़मर्रा के जीवन का विवरण लिखते थे। उन्होंने लिखा है कि आम और अदरक का अचार भोजन के साथ खाया जाता था । उन्होंने कई तरह की दालों और घी में बने मुर्ग़े का भी उल्लेख किया है। वह लिखते हैं, “शाही भोजन की शुरुआत गोल चपाती से होती है। इसके बाद भुना हुआ गोश्त, समोसा, और फिर चावल के साथ मुर्ग़ा परोसा जाता है। अंत में हलवा या बादाम की खीर खाई जाती है।“

इब्न बतूता के अनुसार मोहम्मद बिन तुग़लक के मिज़ाज में सनकीपन था और उसे बहुत जल्द ग़ुस्सा आ जाता था।

इब्न बतूता ने ये भी लिखा है कि दिल्ली बेहद ख़ूबसूरत शहर हुआ करता था लेकिन तुग़लक ने दिल्ली की पूरी आबादी को तुग़लकाबाद में बसाने का फ़ैसला ले लिया । तुग़लक ने अंधे लोगों और भेड़ों तक को नहीं बख़्शा वह उन्हें भी तुग़लकाबाद ले गया था।

“ सुल्तान बेहिचक ख़ूनख़राबा करता था....वह छोटी-बड़ी ग़लतियों पर बड़ी बड़ी सज़ाएं देता था, कोई व्यक्ति पढ़ा-लिखा हो, धार्मिक हो या फिर विद्वान हो, उसकी वह ज़रा भी इज़्ज़त नहीं करता था। हर दिन दीवान-ए-आम में जंज़ीरों में बंधे सैकड़ों लोगो को पेश किया जाता है और फिर या तो उन्हें मार दिया जाता है या फिर उन्हें यातनाएं दी जाती या मारा-पीटा जाता हैं।“

दौलताबाद का किला
दौलताबाद का किला|विकिमीडिया कॉमन्स

इब्न बतूता के हाथ तुग़लक का दरबार छोड़ने का मौक़ा अचानक ही लग गया। चीन के राजा ने अपने लोगों का एक बड़ा काफ़िला दिल्ली भेजा था। तुग़लक ने भी क़ीमती तोहफ़ों के साथ इतना ही बड़ा काफ़िला चीन भेजने का फ़ैसला किया और इब्न बतूता को चीन में राजदूत नियुक्त कर दिया। लेकिन रास्ते में डाकुओं ने काफ़िले को लूट लिया और इब्न बतूता किसी तरह जान बचाकर भाग निकले।

इसके बाद इब्न बतूता ने दक्षिण की यात्रा करने का फ़ैसला किया। उन्होंने देवगिरी के भव्य क़िले का ज़िक्र किया है जिसका तुग़लक ने नाम बदलकर दौलताबाद कर दिया था। इब्न बतूता के अनुसार क़िले की दीवारें बहुत बड़ी थीं जो तीन मील तक फैली हुई थीं। इब्न बतूता ने उस क्षेत्र में रहने वाले मऱाठों का भी उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है, “मराठा लोग चावल और तिल के तेल में बनी हरी सब्ज़ियां खाते हैं। वे सब्ज़ियों को अच्छी तरह धोते भी हैं।“

दक्कन से इब्न बतूता दक्षिण में मालाबार गए जिसका उन्होने विस्तार से वर्णन किया है। “पूरा रास्ते पर पेड़ों का साया है और हर आधा मील पर लकड़ी का एक घर है जिसमें आने जाने वाले लोगों के लियेर सायबान बने हुए हैं। हर सायबान में एक कुंआ है जिससे लोग पानी निकालकर पीते हैं...किसी के आने पर उसके लिए भोजन बनाया जाता है और उसे पेय पदार्थ दिया जाता है। खाना केले के पत्ते पर परोसा जाता है और मेहमान जो खाना छोड़ देता है उसे कुत्तों के लिये डाल दिया जाता है।”

इब्न बतूता ने कालीकट और कोल्लम बंदरगाहों के ज़रिये मालाबार में व्यापारिक गतिविधियों का भी उल्लेख किया है। काली मिर्च ख़रीदने के लिये इन बंदरगाहों पर चीन और फ़ारस(ईरान)से जहाज़ आते थे। उन्होंने दौलतमंद व्यापारियों के बारे में भी लिखा है। इसके अलावा उन्होंने केरल के मुसलमानों के ख़ास भोजन “रसोई” का भी ज़िक्र किया है जो चावल, गोश्त और नारियल के दूध से बनता था।

इब्न बतूता चीन जाने से पहले तीन महीने कालीकट (कोझीकोड) में ठहरे। एक समर्पित यायावर की तरह इब्न बतूता, रास्ते में, मालद्वीप में भी रुके जिसे उन्होंने दुनिया के अजूबों में से एक बताया। इब्न बतूता का भारत से सम्बंधित यात्रा वृतांत यहीं समाप्त होता है।

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