दौलत बेग ओल्डी- भारत की सबसे ऊंची उड़ान पट्टी



एक तरफ़ जहां सारा विश्व कोविड-19 की महामारी से जूझ रहा है वहीं हाल ही में लद्दाख में,वास्तविक नियंत्रण (Line of Actual Control) पर गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच झड़प हुई। झड़प की वजह वो सड़क है जो भारतीय सेना बना रही है। ये सड़क गलवान घाटी से होते हुए दौलत बेग ओल्डी नामक जगह की तरफ़ जाती है। दौलत बेग ओल्डी उत्तरी दिशा में बहुत अंदर एक भारतीय सैन्य चौकी है और साथ ही ये भारत की सबसे ऊंची उड़ान पट्टी भी है।

गलवान घाटी चीन द्वारा ग़ैरक़ानूनी ढ़ंग से अधिकृत अक्साई चिन के पूर्व में उत्तर-पूर्वी लद्दाख में स्थित है। गलवान घाटी के दक्षिण की तरफ़ प्रसिद्ध पोंगोंग झील या पोंगोंग त्सो है जिसका लद्दाखी भाषा में मतलब होता है भूमि में गड्ढा । यहां आमिर ख़ान की हिट बॉलीविड मूवी थ्री इडियट्स के कुछ दृश्यों की शूटिंग हुई थी और तभी से ये मशहूर पर्यटक स्थल हो गया। झील का 35 प्रतिशत हिस्सा भारत का है और बाक़ी चीन का। झील का पानी पीने योग्य नहीं है क्योंकि ये खारा है। काराकोरम दर्रे में उत्तरी गलवान घाटी से क़रीब सौ कि.मी. के फ़ासले पर दौलत बेग ओल्डी है।

दौलत बेग ओल्दी भारत के नक्शे में 
दौलत बेग ओल्दी भारत के नक्शे में |अंकुष राय

दौलत बेग ओल्डी काराकोरम पर्वत श्रंखला का हिस्सा है। दूसरी शताब्दी में काराकोरम कुषाण शासक कनिष्क के साम्राज्य में आता था। तुर्की भाषा में काराकोरम का अर्थ काला पर्वत या काली बजरी होता है। काराकोरम पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान से लेकर पूर्वी लद्दाख तक फैला हुआ है। काराकोरम पर्वत श्रंखला में के-2 विश्व की दूसरी सबसे ऊंची पर्वत चोटी है जो समुद्र तल से 8,600 मीटर ऊंची है। दौलत बेग ओल्दी से 12 कि.मी. दूर काराकोरम दर्रा हज़ारों सालों तक भारत और चीन के प्रांत शिनजियांग के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग रह चुका है।

दौलत बेग ओल्डी की उत्पत्ति?

तुर्की भाषा में दौलत बेग ओल्डी का शाब्दिक अर्थ है ‘ऐसी जगह जहां महान और अमीर व्यक्ति की मौत हुई हो। ’ फ़ारसी में बेग का मतलब लॉर्ड या कमांडर होता है। दौलत बेग का संबंध चीन के शिंजियांग प्रांत में स्थित यारकन्द के शासक सुल्तान सईद ख़ान से है। 16वीं शताब्दी में शिंजियांग प्रांत कई साम्राज्यों में बंटा हुआ था जिन्हें ख़ानैत कहा जाता था और जिसके शासक ख़ान होते थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण ख़ानैत था यारकन्द जिसकी राजधानी चीन में यारकन्द शहर में थी। कहा जाता है कि सुल्तान सईद ख़ान सन 1530 के आरंभ में इस्लाम फ़ैलाने के नाम पर, लद्दाख़ और कश्मीर के हिस्सों पर कब्ज़ा करने के इरादे से एक सैनिक अभियान पर निकला था। तब उत्तर भारत में मुग़ल साम्राज्य नया नया आया था।

यारकन्द में सुल्तान सईद ख़ान और उसके ख़ानदान के सदस्यों का मक़बरा
यारकन्द में सुल्तान सईद ख़ान और उसके ख़ानदान के सदस्यों का मक़बरा|विकिपीडिया कॉमंस

सुल्तान सईद ख़ान ने सन 1531 में पतझड़ के मौसम में अपने जनरल हैदर और कुछ हज़ार सैनिकों के साथ अभियान शुरु किया था लेकिन काराकोरम पार करते समय बहुत ऊंचाई की वजह से उसकी तबियत ख़राब हो गई। काराकोरम पर्वत श्रंखला 6100 मीटर ऊंची है, इसकी के-2 चोटी( गोडविन आस्टिन 8611 मीटर्स) विश्व की दूसरी सबसे बड़ी चोटी है। बहरहाल, कहा जाता है कि उसकी तबियत बाद में ठीक हो गई और वह अभियान पर फिर निकल पड़ा। सुल्तान ने बालतिस्तान (आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में है) जीता और उसका कमांडर हैदर कश्मीर रवाना हो गया। बालतिस्तान में सुल्तान ने देखा कि वहां मुसलमानों की आबादी पहले से ही है। लेकिन उसने मारकाट की और क्षेत्रों पर कब्ज़ा किया क्योंकि वे शिया मुसलमान थे। श्रीनगर में सुल्तान और उसके कमांडर की मुलाक़ात हुई। उसने कमांडर से तिब्बत को जीतने का आदेश दिया और ख़ुद अपनी राजधानी यारकंद रवाना हो गया।

1533 ई. में कश्मीर में सुल्तान सईद ख़ान के सेनापति हैदर द्वारा जारी चांदी के सिक्के
1533 ई. में कश्मीर में सुल्तान सईद ख़ान के सेनापति हैदर द्वारा जारी चांदी के सिक्के|विकिपीडिया कॉमंस

सन 1533 में वापसी के समय सुल्तान एक बार फिर ऊंचाई की वजह से बीमार पड़ गया और उसकी काराकोरम में उसी स्थान पर मौत हो गई। उस जगह का नाम दौलत बेग ओल्डी रख दिया गया। नये शासक ने हैदर को वापस बुलाकर उसे निर्वासित कर दिया। हैदर बाद में मुग़ल बादशाह हुमांयू की सेवा में चला गया और तारीख़-ए-रशीदी लिखी। कहा जाता है कि हैदर ने हुमांयू के भाई कामरान को हराया था जिसे बाबर ने अफ़ग़ानिस्तान में कंधार की देख-भाल का ज़िम्मा सौंपा था।

मुग़ल बादशाह अकबर ने सन 1586 में कश्मीर पर कब्ज़ा कर लिया। औरंगज़ेब की मौत के बाद मुग़ल सल्तनत बिखरने लगी और कश्मीर घाटी अफ़ग़ानों और सिख साम्राज्य के हाथों में चली गई। अंत में ये जम्मू-कश्मीर रियासत के अधीन हो गई।

गलवान घाटी का नाम कैसे पड़ा

गलवान घाटी में गलवान नदी है जो 80 कि.मी. लंबी है। ये सिंधू नदी की उपनदी है जो लद्दाख़ में सियाचिन में शयोक नदी में मिल जाती है। गलवान नदी का नाम ग़ुलाम रसूल गलवान के नाम पर है जो लद्दाख़ी था और लेह में रहता था। सन 1890 में लॉर्ड डनमोर ने उसकी सेवाएं ली थीं। गलवान टट्टू पर बैठा कर लोगों को पहाड़ों पर चढ़वाता था। सन 1899 में अंगरेज़ों का एक खोजी दल यहां आया था जो लद्दाख़ के क्षेत्रों का दौरा कर रहा था। गलवान भी इसी दल के साथ था।

दिलचस्प बात ये है कि गलवान का पिता कारा गलवान एक डकैत था। कश्मीरी भाषा में कारा गलवान का मतलब काला डकैत होता है। कारा गलवान ने कश्मीर के महाराजा के शयनकक्ष में डाका डाला था और उसे इस जुर्म में फांसी पर लटका दिया गया था। गलवान लोग घोड़े और टट्टुओं की चोरी करते थे और चोरी चपाटी के लिये कुख्यात थे। गलवान का जन्म सन 1878 में हुआ था और उसके पिता का नाम इब्राहीम था। ग़ुलाम रसूल गलवान ने “सरवेंट्स ऑफ़ साहब” नाम से अपनी आत्मकथा भी लिखी थी जिससे, उस समय की जानकारी मिलती है जब लोग क़ाफ़िले बना कर चलते थे।

ग़ुलाम रसूल गलवान
ग़ुलाम रसूल गलवान |विकिपीडिया कॉमंस

गलवान की आत्मकथा 1925 में उसके निधन के दो साल बाद प्रकाशित हुई थी। आत्मकथा का संपादन ‘साहब’ की पत्नी ने किया था जिन्हें गलवान, ख़ुद को गोरा आदमी बनाने का श्रेय दिया करता था। दरअसल श्रीमती और श्री बैरट ने ही बड़ी मेहनत से ग़ुलाम रसूल की कहानी का संपादन कर इसे आत्मकथा की शक्ल दी थी। ग़ुलाम रसूल गलवान को लद्दाख़ का अकसाकल अथवा ब्रिटिश संयुक्त आयुक्त का प्रमुख सहायक बना दिया गया था। व्यापार और तिब्बत, भारत तथा तुर्किस्तान से आने वाले काफ़िलों पर संयुकत आयुक्त का नियंत्रण रहता था।

रसूल गलवान की आत्मकथा
रसूल गलवान की आत्मकथा|अंकुष राय 

दौलत बेग ओल्डी और 1962 का भारत-चीन युद्ध

सन 1947 में जब जम्मू-कश्मीर रियासत का भारत में विलय हो गया तब गलवान और दौलत बेग ओल्डी भारत के हिस्से बन गए। लेकिन लद्दाख़ की सीमा को लेकर चीन को एतराज़ था जो विवाद में तब्दील हो गया। घाटी में परिस्थितियां विषम थी इसलिये वहां भारतीय सेना की कोई मौजूदगी नहीं थी। इसे देखते हुए चीन ने सन 1950 के दशक में अक्साई चिन से लेकर गलवान घाटी के अंदर तक सैनिक चौकियां बना दी।

सन 1962 में जुलाई के क़रीब भारत नें गलवान घाटी में एक चौकी बनाई। गश्त लगाने के लिये दौलत बेग ओल्डी में पांचवीं जाट बटालियन के 60 जवानों को तैनात किया गया जिसका नेतृत्व मेजर श्रीकांत हसबनीस के हाथों में था। इन साठ भारतीय जवानों को एक हज़ार चीनी सैनिकों ने घेर लिया और युद्ध जैसे हालात बन गए। आख़िरकार अक्टूबर में भारत और चीन के बीच युद्ध छिड़ गया। चीन ने चौकी पर कब्ज़ा करने की कोशिश की और इसे लेकर भीषण लड़ाई शुरु हो गई। भारतीय जवान शाम साढ़े छह बजे तक लड़ते रहे और फिर उनका गोला बारुद ख़त्म हो गया। इन 60 सैनिकों में से 38 शहीद हो गए और मेजर श्रीकांत सहित बाक़ी सैनिकों को चीन ने युद्धबंदी बना लिया।

मेजर श्रीकांत सात महीने तक युद्धबंदी रहे। बाद में एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उन्हें यातनाएं तो नहीं दी गईं लेकिन बहुत कम खाना दिया जाता था और उन्हें साम्यवाद के भाषण दिये जाते थे। बाद में उन्हें रिहा कर दिया गया। वापस लौटने पर उन्हें पदोन्नत कर लेफ़्टिनेंट कर्नल बनाया और फिर वह सेवानिवृत्त हो गए। सन 1962 में दौलत बेग ओल्डी खाली छोड़ दिया गया क्योंकि इसकी रक्षा करना संभव नहीं था लेकिन तब चीन ने भी इस पर दावा नहीं किया था।

पांच दशकों तक वीरान रहने के बाद भारतीय सेना ने सन 2008 में दौलत बेग ओल्डी उड़ान पट्टी पर ऑपरेशन शुरु किया। ऐसा इसलिये किया गया ताकि पूर्वी सियाचिन ग्लेशियर में उत्तरी लद्दाख़ में स्थिति मज़बूत हो सके। सन 2013 में भारतीय वायुसेना ने अपना सी-130जे सुपर हरक्यूलिस हवाई जहाज़ दौलत बेग ओल्डी उड़ान पट्टी पर उतारा। इसके पहले सन 1965 में यहां पहली बार विमान उतरा था। इससे चीन सचेत हो गया और फिर सन 2013 में दौलत बेग ओल्डी में झड़प हुई।

दौलत बेग ओल्दी उड़ान पट्टी
दौलत बेग ओल्दी उड़ान पट्टी |विकिपीडिया कॉमंस

15 अप्रेल सन 2013 को चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की प्लाटून साइज़ की एक बटालियन ने अक्साई चिन-लद्दाख़ लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रौल (LAC) के पास उत्तरी दौलत बेग ओल्डी से 30 कि.मी. दूर राकी नुला में एक शिविर लगा दिया। चीन की इस कार्रवाई का जवाब देते हुए भारतीय सेना ने भी 300 मीटर (980 फुट) दूर अपना शिविर लगा दिया। इस मसले पर भारत और चीन के बीच तीन हफ़्ते वार्ता चलती रही और इस दौरान चीनी ट्रकों और हेलिकॉप्टरों का आना जाना लगा रहा। बहरहाल, विवाद का समाधान हो गया जिसके बाद दोनों पक्षों ने वहां से अपनी सेनाएं हटा लीं।

लेकिन अब दौलत बेग ओल्डी एक बार फिर ख़बरों में आ गया है।

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