जब श्री हरिमंदिर साहिब में बिजली की हुई शुरूआत



आज श्री हरिमंदिर साहिब में दीवाली, बैसाखी या गुरु पर्व पर की जाने वाली रोशनी चकाचौंध कर देने वाली होती है और इसकी एक झलक के लिए लोग देश-विदेश से यहां आते हैं। लेकिन कम ही लोगों को शायद इस बात की जानकारी होगी कि करीब 120 वर्ष पहले यहां रौशनी करने के लिये लोगों को उस समय कैसी-कैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा होगा। इसके अलावा ये सच्चाई भी बहुत कम लोग जानते होंगे कि अमृतसर शहर में इंजनों से बिजली सप्लाई के लिए तारों की फिटिंग का काम सबसे पहले श्री दरबार साहिब में शुरू हुआ था लेकिन इसके विरोध की वजह से बिजली सारे शहर के बाद ही श्री हरिमंदिर साहिब में पहुंचती थी।

श्री हरिमंदिर साहिब में बिजली आने के पहले आठों पहर देसी घी की ज्योत जलाई जाती थी और श्री हरिमंदिर साहिब के अंदर एवं परिक्रमा में रौशनी के लिए मोम की बत्तियां जलाई जाती थीं। ‘रिपोर्ट’ की किताब में श्री दरबार साहिब’ के अनुसार पुजा के समय श्री गुरू ग्रंथ साहिब में दो सेवादार दोनों तरफ चांदी की दो तश्तरियों में मोम बत्तियां जलाकर खड़े रहते थे ताकि ग्रंथी सिंह हुक्मनामा पढ़ सकें।

‘श्री हरिमंदर साहिब दा सुनहरी इतिहास’ पुस्तक के अनुसार अमृतसर गुरूद्वारा प्रबंधन में सुधार और गुरूद्वारों को महंतों के कब्ज़े से आज़़ाद करवाने के लिये 1873 में श्री गुरू सिंह सभा बनाई गई थी। सभा के 23वें वार्षिक सम्मेलन में 26 जनवरी 1896 को श्री हरिमंदिर साहिब में बिजली की सप्लाई के लिए एक प्रस्ताव पेश किया गया। स. सुंदर सिंह मजीठिया (शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी के पहले अध्यक्ष-2 दिसम्बर 1920 -13 अगस्त 1921) ने सम्मेलन में बताया कि श्री हरिमंदिर साहिब सुंदरता के मामले में बैकुंठ का प्रतिबिम्ब है और यहां बिजली आने से श्री हरिमंदिर साहिब की महिमा और सुंदरता और बढ़ेगी। इसके अलावा बिजली आने से से तीर्थ यात्रियों को और सुविधा होगी। उन्होंने कहा कि श्री दरबार साहिब में रोशनी की कमी के कारण देर शाम या रात को यहां आने वाले बुजुर्ग और अन्य लोगों को अक्सर दिक्कत होती हैं।

उनके सुझाव के बाद श्री हरिमंदिर साहिब में अंग्रेज़ सरकार द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारी कर्नल ज्वाला सिंह (गाँव बंढाला, जिला अमृतसर) और खालसा हाई स्कूल गुजरांवाला के मास्टर नारायण सिंह ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति दे दी। इसके बाद सरदार बहादुर अर्जन सिंह (मानद मजिस्ट्रेट गांव चाहल) की अध्यक्षता में 11 सदस्यीय कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने इस कार्य के लिए बाबा सर खेम सिंह बेदी, राय बहादुर सरदार सुजान सिंह रावलपिंडी और अटारी के सरदार बलवंत सिंह से सहायता प्राप्त करने के बाद कस्बों और गांवों से दान शुरू कर दिया। कमेटी ने इस कार्य में वित्तीय सहायता के लिए स. ज्वाला सिंह और स. सुंदर सिंह मजीठिया के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल को खालसा दीवान अमृतसर के संरक्षक और फरीदकोट के महाराजा बिक्रम सिंह के पास भेजा।  15 अप्रैल 1897 को श्री अकाल तख्त साहिब के सामने एक दीवान में राजा बिक्रम सिंह ने श्री दरबार साहिब के अंदर बिजली की व्यवस्था करने के लिए 25 हज़ार रुपये दान की घोषणा की। दान की घोषणा का उल्लेखश्री दरबार साहिब की ‘बिजली 46-सी’ रिकॉर्ड फाइल में 22 जुलाई 1931 को लिखे पत्र में मिलता है। पत्र में लिखा है कि महाराजा फरीदकोट के दान राशि से ही बिजली पैदा करने वाला इंजन, बिजली के तार और तारों की फिटिंग के लिए खंभे और अन्य आवश्यक उपकरण खरीदे गए। इसके अलावा श्री दरबार साहिब के रिकॉर्ड में एक अन्य पत्र (नंबर 386/ 31) से यह पुष्टि हो जाती है कि बिजली पैदा करने वाला इंजन महाराजा फरीदकोट द्वारा ही भेंट किया गया था।

बिजली की तारों की फिटिंग के लिए सरोवर के किनारों पर मौजूद खंभे।
बिजली की तारों की फिटिंग के लिए सरोवर के किनारों पर मौजूद खंभे।|आशीष कोछड़

25 अप्रैल 1897 को श्री अकाल तख्त साहिब में आयोजित एक बैठक में राजा फरीदकोट द्वारा भेजे गए तीन दरबारियों ने अपनी ओर से घोषणा की कि महारानी विक्टोरिया के इंगलैंड की महारानी के तौर पर निर्विघ्न 60 वर्षीय राज्य की स्मृति में श्री हरिमंदिर साहिब के चारों ओर बिजली शुरू की जाएगी।22 जून 1897 को अमृतसर में मनाए गए डायमंड जुबली समारोह में राजा बिक्रम सिंह के पुत्र कंवर गजिंदर सिंह शामिल हुए थे। इस अवसर पर शहर के रईस राय ढोलन दास ने जनरेटर मंगवाकर श्री दरबार साहिब परिक्रमा और पुल पर बिजली से रोशनी करवाई। इसकी जानकारीमिलने पर राजा बिक्रम सिंह ने अमृतसर का दौरा किया और एक सार्वजनिक बैठक में गुरु के लंगर के लिए एक नई इमारत और बिजली शुरू करने के लिए

एक लाख रुपये और दान करने की घोषणा की। उसी समय उन्होंने श्री अकाल तख्त साहिब की उपस्थिति में घोषणा की कि जब तक गुरु रामदास जी केदरबार में बिजली नहीं आ जाती, तब तक वे अपने महलों में भी रौशनी नहीं करेंगे।

महाराजा फरीदकोट की ओर से की गई इस घोषणा को लेकर विरोध भी शुरू हो गया और श्री हरमंदिर साहिब के तीन ग्रंथी सिंहों ने इस योजना को रोकने के लिए रोशनी कमेटी के सचिव स. सुंदर सिंह मजीठिया को एक नोटिस जारी किया। इस संबंध में सबसे पहले 29 जुलाई 1897 को लाहौर सिंह सभा द्वारा श्री दरबार साहिब में बिजली शुरू करने का विरोध किया गया था। लाहौर से प्रकाशित ‘खालसा’ अखबार के 6 अगस्त 1897 के अंक में संपादक ने लिखा कि श्री दरबार साहिब में रोशनी की व्यवस्था करने से कोई फायदा नही होगा और सिखों को बिजली के बजाय गुरु शबद की रोशनी की अधिक आवश्यकता है। श्री हरमंदिर साहिब के तीन ग्रन्थी सिंहों; भाई हरनाम सिंह, भाई भगत सिंह तथा भाई प्रताप सिंह ने खालसा अखबार लाहौर में 27 अगस्त 1897 को एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें बिजली शुरू करने के प्रस्ताव पर खुलकर हमला बोला गया

3 सितंबर के अंक में स. तेजा सिंह ने लिखा कि दरबार साहिब में पूर्वी परंपरा के अनुसार घी की रोशनी करना सबसे बेहतर है। इसी अंक में बिजली के प्रबंधन की शुरूआत का विरोध करते हुए ग्रन्थी सिंहों ने लिखा कि श्री हरिमंदिर साहिब की इमारत पूर्वी है जबकि बिजली की रोशनी पश्चिमी है और यह प्राचीन परंपरा के विरुद्ध है। इसके अलावा बिजली व्यवस्था के शुरू होने से जो मासिक खर्च आएगा, उसे कौन पूरा करेगा? 8 अक्तूबर के अंक में तख्त श्री हजूर साहिब ने लिखा कि श्री हरिमंदिर साहिब के अंदर बिजली की रोशनी करना परंपरा के खिलाफ है, क्योंकि दरबार साहिब की इमारत पूर्वी है और बिजली की रोशनी पश्चिमी है। विरोध करने वाले श्री हजूर साहिब के ग्रंथी सिंहों ने यह भी कहा कि बिजली की रोशनी हरिमंदिर साहिब में नहीं होनी चाहिए। उनका कहना था कि ध्यान की रोशनी के मुकाबले कोई अन्य रोशनी पवित्र नहीं हो सकती। कुछ ने यह भी कहा कि श्री हरिमंदिर साहिब आजायब घर नहीं कि लोगों से वाहवाही लूटी जाए। कुछ ने बहुत से उदाहरण देते हुए यह भी कहा कि बिजली तीर्थ भवन के लिए हानिकारक साबित होगी।‘श्री हरिमंदिर साहिब दा सुनहरी इतिहास’ पुस्तक के अनुसार स्थानीय कमेटी श्री दरबार साहिब के कार्रवाई रजिस्टर न. 1929-30 के मता न. 552 के अनुसार एक सितम्बर 1929 को गुरूद्वारा शहीद गंज बाबा दीप सिंह, रामसर तथा बिबेकसर में बिजली सप्लाई शुरू करने की मंजूरी देने के बाद अप्रैल 1930 में श्री हरिमंदिर साहिब के अंदर भी बिजली के तारों की फिटिंग करके रोशनी कर दी गई। बिजली पैदा करने वाला इंजन, जो लकड़ी व कोयले से चलता था को श्री दरबार साहिब के पुराने दफ्तर से सटी गली में लगाया गया था।

 सन् 1930 के दषक की तस्वीर, जिस में बिजली की तारों की फिटिंग के लिए लगाए खंभे देखे जा सकते हैं।
सन् 1930 के दषक की तस्वीर, जिस में बिजली की तारों की फिटिंग के लिए लगाए खंभे देखे जा सकते हैं। |आशीष कोछड़

श्री दरबार साहिब से संबंधित दस्तावेज़ों तथा पुस्तकों में दर्ज है कि एस.जी.पी.सी. (शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी) तथा श्री दरबार साहिब की स्थानीय कमेटी के अस्तित्त्व में आने से पहले श्री दरबार साहिब के अन्दर रोशनी के प्रबंध के लिए एक ‘रोशनी सब-कमेटी’ बनाई गई। उस कमेटी के खाते में बिजली पर होने वाले माहवार खर्च के लिए राजा बिक्रम सिंह हर माह 50 रु. पंजाब एंड सिंध बैंक में जमा करवाते थे। उनसे मिले 25 हज़ार रुपए से बिजली पैदा करने के लिए लकड़ी व कोयले से चलने वाला इंजन, बिजली की तारें और तारों की फिटिंग के लिए खंभे व अन्य सामान खरीदे गये। तारों की फिटिंग के लिए श्री हरिमंदिर साहिब के सरोवर के चारों तरफ तथा परिक्रमा में आठ खंबे लगाए गए, जिनमें से चार खंभे; एक दर्शनी ड्योढ़ी तथा श्री अकाल तख्त साहिब के मध्य, दो उत्तरी तथा दक्षिण दिशा वाली ड्योढ़ियों के सामने तथा एक अठसठि तीर्थ के नज़दीक ड्योढ़ी के सामने लगाया गया था। परिक्रमा चैढ़ी करने के लिए चार खंभे उतार दिए गए थे, जबकि शेष चार आज भी सरोवर के किनारांे पर मौजूद हैं। जिन पर बहुत खूबसूरत मीनाकारी की गई है।

श्री दरबार साहिब में की जाने वाली अद्भुत रोषनी के दृश्य।
श्री दरबार साहिब में की जाने वाली अद्भुत रोषनी के दृश्य। |आशीष कोछड़

आज जब देश-विदेश से तीर्थयात्री और सैलानी दीपावली या गुरुपर्वों के अवसर पर श्री दरबार साहिब में आलौकिक रोशनी का दीदार करने पहुंचते हैं, तो श्री हरिमंदिर साहिब के चारों ओर बिजली के बल्बों की लड़ियों तथा रंग-बिरंगे लाखों छोटे-बड़े बल्बों को एक साथ जगमगाते देखकर उनकी खुशी और आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहता। हर कोई इस दिलकश नज़ारे को देखने और अपने कैमरों में कैद करने के लिए लालायित रहता है। इस नज़़ारे की तस्वीरें देश-विदेश के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, टीवी चैनलों तथा वेब साइट आदि में दिखाई पड़ती हैं। इसके अलावा दीवाली और गुरुपर्व के अवसरों पर रोशनी से जगमगाते श्री दरबार साहिब की तस्वीर वाले ग्रीटिंग कार्ड से लोग एक दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं, लेकिन इन संदेशों और समाचार पत्रों में कभी उन शख्सियतों का जिक्र सामने नहीं हुआ जिन्होंने श्री दरबार साहिब में रोशनी के के लिए एक बड़ा संघर्ष किया था।

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